उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के गैर-ब्राह्मण आंदोलन

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गैर-ब्राह्मण आंदोलन प्रारम्भ हुये जो बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पश्चिमी भारत एवं दक्षिणी भारत में व्यापक रूप से प्रभावी बने। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि एवं कारण इन क्षेत्रों की विशिष्ट ऐतिहासिक संरचना से सम्बद्ध थे। इन क्षेत्रों के गैर-ब्राह्मणों में अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार, इससे प्रभावित सामाजिक-आर्थिक स्थिति तथा इस शिक्षा से विकसित नवीन इतिहास दृष्टि इन आंदोलनों के मूल में निहित तथ्य थे। दूसरी ओर ब्राह्मणों ने भी शिक्षा के क्षेत्र में अपने परम्परागत एकाधिकार का प्रदर्शन कर अँग्रेजी शिक्षा में भी एकाधिकार प्राप्त कर लिया तथा नवीन औपनिवेशिक व्यवस्था के सभी क्षेत्रों वकालत, प्रशासन, शिक्षा, आदि में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। इससे गैर-ब्राह्मण वर्ग में असुरक्षा की भावना दृष्टिगत हुई जो पहले से ही ब्राह्मणवादी व्यवस्था से दुखी थे। नवीन इतिहास लेखन (साम्राज्यवादी इतिहासकारों द्वारा लिखित) ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि आर्य भी अंग्रेजों की भाँति बाहर से आये थे और उन्होंने बलात् अपनी संस्कृति तथा सामाजिक स्तरीकरण पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत के समतावादी समाज (द्रविड़ समाज आदि) पर थोप कर अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर ली थी, गैर-ब्राह्मण वर्ग को और भी त्रस्त कर दिया।

इस प्रकार गैर-ब्राह्मण वर्ग में यह भावना उत्पन्न हो गयी कि ब्राह्मण वर्ग उसी बलात् आर्यीकरण का प्रतीक है; अन्ततः गैर-ब्राह्मणों की अतीत की प्रतिक्रियावादी नीतियों का प्रतिफलन जाति-व्यवस्था में समझकर उसका घोर विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। गैर-ब्राह्मण आंदोलन के नेताओं (ज्योतिबा फुले, नायकर आदि) ने धर्मग्रन्थों की पुनर्व्याख्या तथा अपनी विस्तृत आलोचनात्मक टिप्पणियों द्वारा इस विरोध को व्यापक बनाने का उपक्रम किया। ज्योतिबा फुले ने स्पष्ट किया कि ब्राह्मणों ने निम्नजातियों को वेद इसलिये नहीं पढ़ने दिया था कि वेदों में अनार्यों पर किये गये अत्याचारों का उल्लेख है। इसी प्रकार दक्षिण भारत में पाण्डव की अपेक्षा कौरव, राम की अपेक्षा रावण पूज्य सिद्ध किये गये; शम्बूक वध आदि के द्वारा राम पर ब्राह्मणवादी होने का आरोप मंडित हुआ। इन नवीन प्रवृत्तियों के अतिरिक्त कुछ पारम्परिक कारणों ने भी गैर-ब्राह्मण आंदोलनों को गति प्रदान कर दी थी। पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में अनेक ऐसी गैर-ब्राह्मण जातियाँ थीं जो आर्थिक दृष्टि से उन्नत व समृद्ध थीं परन्तु ब्राह्मणों ने उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं दी थी, वे हेय दृष्टि से देखी जाती थीं।

अधिकांश गैर-ब्राह्मण आंदोलन आर्थिक एवं शैक्षिक दृष्टि से सशक्त परन्तु सामाजिक दृष्टि से हेय समझे जाने वाले गैर-ब्राह्मणों द्वारा ही हुये थे; इनका उद्देश्य भी अपनी जातियों को अधिकार प्रदान करने तक ही सीमित रहा था- अछूतों, हरिजनों के पक्ष में इन अधिकांश गैर-ब्राह्मण आंदोलनों ने आवाज तक न उठायी। इन आंदोलनों में ज्योतिबा फुले एवं अम्बेडकर इसके अपवाद हैं; वह भी सम्भवतः इसलिये कि वे स्वयं इस वर्ग से सम्बद्ध थे तथा उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ आर्थिक सुविधायें भी प्राप्त करनी थीं। केरल का मन्दिर प्रवेश आंदोलन भी इसी कड़ी में स्वीकार किया जा सकता है, परन्तु इस आंदोलन का चरित्र विवेच्य 'गैर-ब्राह्मण आंदोलनों' से पूर्णतः भिन्न था। ज्योतिबा फुले का 'सत्यशोधक समाज' भी उनकी मृत्यु के पश्चात् अछूतों की समस्याओं की उपेक्षा कर गया था, अम्बेडकर का आंदोलन भी राजनीतिक सुविधायें प्राप्त करने तक ही सीमित रहा था।

ज्योतिबा फूले व पेरियार का आन्दोलन

ब्राह्मण वर्चस्व विरोधी आन्दोलन में ज्योतिबा फूले व पेरियार का नाम काफी गर्व के साथ लिया जाता है। ज्योतिबा फूले ने 1853 ई. में सत्य शोधक समाज का गठन कर मुख्यतः ब्राह्मणवादी हिन्दू पुनरुत्थानवाद के खिलाफ संघर्ष किया। लेकिन इस आन्दोलन ने शुरू से ही जनवादी रवैया अपनाया और साथ ही साथ, जातीय शोषण, विधवा विवाह, शराबखोरी, नौकरशाही का दमन, महाजनों की लूट, किसानों की भूमि से बेदखली, भारतीय सम्पदा की साम्राज्यवादियों द्वारा की जा रही लूट जैसे मामलों को भी उठाया। इस तरह फूले ने देशी सामन्ती प्रतिक्रियावादी आधार व इसके उपरी ढाँचा के साथ-साथ ब्रिटिश शासन पर ही हमला किया। इसी आंदोलन के द्वारा निम्न जातियों में अपने बच्चों को शिक्षित बनाने की ललक उत्पन्न हुई थी।

ज्योतिबा फुले ने 1851 ई. में एक विद्यालय शूद्रों के बच्चों के लिये तथा एक बालिका विद्यालय स्थापित किया था; कालान्तर में इसी 'सत्यशोधक आंदोलन' के नेता साहू महाराज ने दलित वर्ग के छात्रों के लिये छात्रावास एवं छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की थी। इनगैर-ब्राह्मण आंदोलनों ने स्त्रियों की दशा में सुधार हेतु उन्हें साक्षर बनाने व शिक्षित करने के महत्त्वपूर्ण प्रयास किये थे। लेकिन इसके पहले कि उनका संघर्ष बुनियादी भूमि सम्बन्धों को चुनौती देता, उनकी मौत हो गयी। उनकी मृत्यु के बाद आन्दोलन का नेतृत्व कोल्हापुर के सामन्ती महाराजा के हाथों में आ गया और इसका जनवादी सर्वव्यापी चरित्र कायम नहीं रह सका। आगे चलकर इस आन्दोलन का मूल चरित्र ही बदल गया और अब इसका लक्ष्य ब्राह्मणों की जगह क्षत्रियों/मराठों को बेहतर स्थान दिलाने तक सीमित हो गया। इस निहित स्वार्थ की प्राप्ति के लिए इसके नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौता तक किया।

सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य इन गैर-ब्राह्मण आंदोलनों में यह उद्भासित हुआ कि तमिलनाडू में सर्वथा उपेक्षित हजारों वर्ष प्राचीन गौरवमयी 'संगम साहित्य की ओर भारतीयों की दृष्टि गयी; इससे तमिल भाषा का विकास हुआ; इतिहास के नवीन स्त्रोत उजागर हुये। प्राचीन भारत के गौरवमयी इतिहास के अनेक तथ्य लोगों को ज्ञात हुये। दक्षिण भारत की सभी क्षेत्रीय भाषायें विकसित हुई।

इ.वी. रामास्वामी, जिन्हें पेरियार के नाम से जाना जाता है, शुरू में काँग्रेस पार्टी के साथ जुड़े थे। लेकिन कॉंग्रेसी नेताओं के जातिवादी पूर्वाग्रहों से उन्हें काफी घृणा हुई और उससे बाहर आकर उन्होंने 1925 में 'आत्म-सम्मान आन्दोलन की शुरुआत की। इसके पूर्व तमिलनाडु में 'जस्टिस पार्टी बन चुकी थी और 1920 के मद्रास प्रेसीडेंसी चुनाव में उसे बहुमत भी प्राप्त हो चुका था। पेरियार आमतौर पर जस्टिस पार्टी के मंच का इस्तेमाल किया करते थे, लेकिन इस पार्टी की प्रान्तीय सरकार बनने के बाद उनके रुख में परिवर्तन आया। उन्होंने इस सरकार की जन विरोधी व दलित विरोधी कार्रवाइयों की तीखी आलोचना की। नतीजतन उन्हें ब्रिटिश सरकार के दमन का शिकार बनना पड़ा। उन्होंने 1942 ई. में द्रविड़ कड़गम पार्टी का गठन किया जो आगे चलकर डी. के. और डी.एम. के. में विभाजित हो गयी। उन्होंने 15 अगस्त 1947 को शोक दिवस' के रूप में मनाने का आह्वान किया और 'आजाद भारत' के कॉंग्रेसी राज को 'ब्राह्मण राज' की संज्ञा दी।

अरव्विपुरम् आंदोलन' केरल के महान् धार्मिक-सामाजिक सुधारक श्री नारायण गुरु द्वारा 1888 ई. में प्रारम्भ किया गया था, इन्होंने 1888 ई. में शिवरात्रि पर्व के अवसर पर अरव्विपुरम् में शिव की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कर इस आंदोलन का सूत्रपात किया तथा व्यक्त किया कि निम्न जाति का व्यक्ति भी प्रतिमाभिषेक कर सकता है, मन्दिर में पुजारी का कार्य सम्पादित कर सकता है। वे स्वयं भी निम्न जाति के थे। यह आंदोलन 'ऐतिहासिक महत्व का घटनाक्रम' था क्योंकि तत्कालीन समय में निम्न जाति के व्यक्ति के लिये मन्दिर में प्रवेश सम्भव ही नहीं था; श्री नारायण गुरु ने मन्दिर में जाकर शिव की मूर्ति का अभिषेक कर मन्दिर.. की दीवाल पर लिखा 'जाति या नस्ल की विभाजक प्राचीरों अथवा प्रतिस्पर्धी धर्म की घृणा से रहित हम सभी यहाँ भाईचारे के साथ रहते हैं।

श्री नारायण गुरु को लाखों लोगों ने संत, दूरदर्शी समाज सुधारक के रूप में स्वीकार कर निम्न जाति के उत्थान में योग किया। - निःस्सन्देह दक्षिण भारत के इतिहास में इस आंदोलन (अरव्विपुरम् आंदोलन) का बहुत बड़ा योगदान है। इस आंदोलन ने अनेकानेक धार्मिक सामाजिक सुधारवादी आंदोलनों का पथ प्रशस्त किया था। अन्ततः मन्दिर प्रवेश आंदोलन का यह आंदोलन अग्रदूत बना। 1924 ई. में दलित वर्गों के लिये मन्दिरों के प्रवेश-द्वार खोलने की व्यापक मुहिम हुई। मन्दिर प्रवेश आंदोलन ने राष्ट्रवादी संघर्ष में सभी पक्षों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया था। नवम्बर 1936 ई. में त्रावणकोर के महाराजा ने जाति का विचार किये बिना सभी हिन्दुओं के लिये सरकारी नियन्त्रण वाले सभी मन्दिरों के द्वार खोलने की घोषणा कर दी। 1936 ई. में मद्रास ने इसका अनुसरण किया। इसी प्रकार केरल में 'नायर सेवा समाज' (मन्नथ पद्मनाभ पिल्लई द्वारा स्थापित) ने जाति शोषण (निम्न जातियों के शोषण) के विरुद्ध आंदोलन प्रारम्भ किया था।

1910 ई. के उपरान्त ज्योतिबा फुले के विचारों से प्रेरित होकर मुकुन्दराव पाटिल एवं शंकर राव जाधव ने एक ब्राह्मण विरोधी 'बहुजन समाज की स्थापना की। यह आंदोलन कालान्तर में सामाजिक एवं राजनीतिक रूप में विघटनकारी और ब्रिटिश सरकार का समर्थक बन गया था। यह आंदोलन मूलतः एक 'दलित' आंदोलन था; दलितों की बहुत संख्या के आधार पर इसे 'बहुजन' नाम प्रदान किया गया था। इस आंदोलन ने जाति प्रथा पर प्रहार कर ब्राह्मणों के विरुद्ध दलित जनों को संगठित किया था। 1910 ई. से मुकुन्द राव, पाटिल ने सत्यशोधक समाचार-पत्र 'दीन मित्र' का प्रकाशन प्रारम्भ किया था, जिसके प्रचार-प्रसार ने बहुजन समाज को महाराष्ट्र, दक्कन, विदर्भ में अपना सशक्त जनाधार बनाने में सहयोग किया।

राष्ट्रवादी आंदोलन से गैर-ब्राह्मण आंदोलनों के सम्बन्ध में यह तथ्य प्रगट होता है कि समय और स्थान की दृष्टि से इनमें पर्याप्त असमानतायें विद्यमान थीं। महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले अपनी अधिकाधिक सामाजिक प्रगतिशीलता के होते हुये भी औपनिवेशिक शासन के वास्तविक स्वरूप को समझ नहीं पाये, वे उसे सामाजिक परिवर्तन में सहायक स्वीकार करते रहे। तमिलनाडू में 'आत्मसम्मान आंदोलन' राष्ट्रीय आंदोलन का विरोधी था। इसके प्रणेता नायकर ने गैर-ब्राह्मणों के कांग्रेस के प्रति बढ़ते लगाव से भयभीत होकर 'जस्टिस पार्टी' से अपने को पृथक कर 'आत्मसम्मान आंदोलन' के रूप में गैर राजनीतिक आंदोलन से सम्बद्ध किया था। इस दृष्टि से आन्ध्र प्रदेश के आंदोलन का स्वरूप, अत्यधिक सकारात्मक माना जा सकता है

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