1929-32 की आर्थिक मंदी के कारण

आर्थिक मंदी

1929-32 इ दौरान दुनिया के अधिकतर हिस्सों में उत्पादन, आय, व्यापार और रोज़गार में भारी कमी आ गई थी, जिससे भारी संख्या में लोग भुखमरी और गरीबी का शिकार हो गये थे। इतना ही नहीं, उद्योग बंद होने से बड़े-बड़े उद्योगपति भी क़र्ज़ में डूब गए थे।

आर्थिक मंदी का अर्थ

महामंदी के कारणों और उसके प्रभावों पर चर्चा करने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि, आर्थिक मंदी का अर्थ क्या होता है? दरअसल, आर्थिक मंदी अर्थव्यवस्था का एक कुचक्र है जिसमें फंसकर आर्थिक वृद्धि रुक जाती है और देश के विकास कार्यों में बाधा आ जाती है। इस दौरान बाज़ार में वस्तुओं की भरमार होती है लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं होता है। उत्पादों की आपूर्ति अधिक व मांग कम होने से अर्थव्यवस्था असंतुलित हो जाती है।

साल 1929 की वैश्विक महामंदी के कारण

अति उत्पादन की समस्या

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका और जापान में बड़े-बड़े कल कारखाने खोले गये थे। इन कारखानों में बड़ी मात्रा में उत्पादन होता था। इनमें युद्ध के दौरान जितनी वस्तुओं का निर्माण किया जाता था, उतनी ही वस्तुओं का निर्माण युद्ध के बाद भी जारी था। जिसका परिणाम यह हुआ कि, बाजा़र में वस्तुएं भरी पड़ी थीं लेकिन उन्हें खरीदने वाला कोई नहीं था।

यह समस्या कृषि के क्षेत्र में सबसे ज़्यादा थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कृषि उपज के अति उत्पादन से अनाज की कीमतें बेहद निचले स्तर पर पहुंच गईं थी और किसानों की आय घट गई थी। अपनी आय के स्तर को बनाये रखने के लिये किसानों ने और अधिक उत्पादन करना शुरू कर दिया था। जिसके चलते ऐसी स्थिति आ गई थी कि बाज़ार में कृषि उपजों की आमद और बढ़ गई और कीमतें और भी कम हो गईं; लेकिन खरीदारों के न आने से अनाज पड़ा-पड़ा सड़ने लगा था।

अमेरिकी शेयर बाज़ार में गिरावट

23 अक्टूबर 1929 को न्यूयार्क-स्टॉक एक्सचेंज में शेयरों का मूल्य अचानक से 50 अरब डॉलर गिर गया था। अमेरिकी सरकार और पूँजीपतियों के प्रयास से स्थिति कुछ ठीक हुई लेकिन अगले महीने यानी नवंबर में फिर से शेयरों की कीमत बहुत घट गई थी। शेयर बाज़ार के इस तरह से धड़ाम होने पर बड़े-बड़े निवेशकों का दिवाला निकल गया था। इसके बाद अमेरिका में जो फैसले लिये गए उनका प्रभाव अन्य देशों पर भी बहुत गहरा पड़ा था।

क़र्ज़ की समस्या

महामंदी का दूसरा कारण युद्धकालीन क़र्ज़ था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तत्कालीन यूरोपीय राष्ट्रों ने अमेरिका से बहुत बड़ी राशि क़र्ज़ के रूप में ली थी। यहाँ तक कि, ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली देश भी अमेरिकी क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुये थे। शुरुआत में अमेरिका युद्ध में शामिल नहीं हुआ था लेकिन वह अपने मित्रराष्ट्रों को लगातार क़र्ज़ दे रहा था। पर जब अमेरिकी उद्यमियों को संकट के संकेत मिले तो उनके होश उड़ गए और अमेरिका ने साल 1929 की शरद ऋतु में यह घोषणा कर दी कि अब वह किसी भी देश को क़र्ज़ नहीं देगा। इस घोषणा का मुख्य कारण स्वयं अमेरिका में मूल्यपात (Slump) था।

वर्ष 1928 के पहले छह माह तक विदेशों में अमेरिका का क़र्जा़ एक अरब डॉलर था, जो कि साल भर के भीतर घटकर केवल चौथाई रह गया था। जो देश अमेरिकी क़र्जे़ पर अधिक निर्भर थे उन पर गहरा संकट मंडराने लगा था। साथ ही, पूरी दुनिया की क्रयशक्ति घट गई थी।

इतना ही नहीं, अमेरिका की इस घोषणा से यूरोप के बड़े-बड़े बैंक धराशायी हो गये थे; ब्रिटेन समेत कई देशों की मुद्राओं की कीमतें बुरी तरह से गिर गईं थी; लैटिन अमेरिका एवं अन्य स्थानों पर कृषि उत्पादों और कच्चे मालों की कीमतों में भी कमी आ गई थी।

उच्च कर

अमेरिकी सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था को इस महामंदी से बचाने के लिये आयातित उत्पादों पर सीमा शुल्क बढ़ाकर दो गुना कर दिया था। इस फैसले ने वैश्विक व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया था।

धन का असमान वितरण- उस दौरान अमेरिका में 3-4% लोगों के पास करीब 50 फीसदी धन था और वही अमीर लोग अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर रहे थे। धन का समान वितरण न होने से अधिकांश लोग गरीब थे।

महामंदी का विश्व पर प्रभाव

दुनिया के अधिकांश देश इस महामंदी की चपेट में आ गये थे। बात करें औद्योगिक देशों की, तो अमेरिका को इस आर्थिक महामंदी की सबसे ज़्यादा मार झेलनी पड़ी थी। अमेरिका की अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से समृद्ध हो रही थी, उतनी ही तेजी से लुढ़क भी गई थी।

मंदी के चलते अमेरिकी बैंकों ने घरेलू क़र्जे़ देना बंद कर दिया था और जो क़र्जे़ पहले दिये जा चुके थे,उनकी वसूली शुरू कर दी थी। लेकिन कीमतों में कमी के कारण किसान से लेकर उद्योगपति तक, सभी आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे और कई परिवार क़र्जे़ चुकाने में असमर्थ थे। ऐसे में उन परिवारों के मकानों और कारों समेत सभी ज़रूरी चीजें कुर्क कर ली गईं थी।

हज़ारों बैंक क़र्जे़ वसूल न कर पाने, ग्राहकों की जमा पूंजी न लौटा पाने और निवेश की गई धनराशि में लाभ न मिलने पर दिवालिया हो गये थे और उन्हें बंद कर दिया गया था। इस प्रकार अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली भी ध्वस्त हो गई थी। आंकड़ों की बात करें तो, साल 1933 तक 4000 से ज़्यादा बैंक बंद हो चुके थे और साल 1929 से 1932 के बीच करीब 1,10,000 कंपनियाँ नष्ट हो गईं थी। इतनी बड़ी संख्या में बैंक और कंपनियाँ बंद होने से तेजी से बेरोज़गारी बढ़ी और लोग काम की तलाश में दूर-दूर तक जाने लगे।

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