हिटलर की गृह एवं विदेश नीति की विवेचना कीजिये।

हिटलर की गृह नीति

एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी को यूरोप का एक प्रतिष्ठित राज्य बनाने के लिए न केवल अपनी विदेशनीति का कुशलतापूर्वक संयोजन किया अपितु गृहनीति को भी इस प्रकार अपनाया कि देश की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ साथ ही साथ जर्मनीवासियों में अभूतपूर्व 'राष्ट्रीयता' का उदय हुआ ।
हिटलर की गृहनीति को निम्नलिखित तथ्यों में आबंटित कर समझा जा सकता है-


1. आर्थिक सुधार

हिटलर ने जर्मनी की आर्थिक सुदृढ़ता के लिए लगभग उन्हीं मार्गों का अनुसरण किया था जिन्हें इटली में मुसोलिनी ने अपनाया था। आर्थिक सुधार के लिए निम्नलिखित कदम उठाये गये-

A. बेकारी उन्मूलन का प्रयास

प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् जर्मनी में आर्थिक तंगी तथा महँगाई के साथ-साथ बेकारी की समस्या विकराल रूप से बढ़ी हुई थी। हजारों सैनिक कार्यमुक्त कर दिया गये थे। हिटलर ने इन्हें नाजीपार्टी का स्वयंसेवक बनाकर इनकी समस्या को बहुत हद तक दूर किया। स्वयंसेवकों को वर्दी तथा वेतन प्रदान किया जाता था।

इनके अतिरिक्त जर्मनी में अत्यधिक बंजर भूमि थी जिन्हें कृषियोग्य बनाने के लिए हिटलर ने मजदूर स्वयंसेवक सेना का गठन किया तथा इन भागों को सड़क मार्ग से शहरों से जोड़ दिया जिससे उत्पादित अनाज नगर की मंडियों तक पहुँच सके। इस प्रकार उसने बेकारी की समस्या को लगभग समाप्त कर दिया था।

B. कोयला उत्पादन

हिटलर की दृष्टि कोयला के उत्पादन पर लगी हुई थी जहाँ क्षमता से कम उत्पादन होता था। अनेक कोयला खानें उपेक्षित पड़ी थीं। हिटलर ने सुप्त कोयला खानों में उत्पादन प्रारम्भ करवाया तथा जहाँ काम हो रहा था अधिक श्रमिक लगाकार उत्पादन में वृद्धि की। इस प्रकार एक ओर कोयले के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई तथा दूसरी ओर बेकारी की समस्या भी हल हुई।

C. श्रमिकों की निश्चित कार्य अवधि

श्रमिकों की सहानुभूति पाने तथा कल-कारखानों को पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए हिटलर ने सप्ताह में कुल 40 घण्टे काम निर्धारित कर दिये।

D विवाहित स्त्रियों को काम से रोकना

हिटलर तथा नाजी दल के नेता इस विचारधारा के थे कि विवाहित स्त्रियों का काम गृहस्थी सम्हालना है अतः वे किसी कार्यालय, कारखाने आदि में काम नहीं कर सकती थीं। ऐसी कार्यरत स्त्रियों को काम से हटाकर बेरोजगारों को काम दे दिया गया। बेकारी और घटी।

E. लेबर - फ्रंट की स्थापना

आर्थिक स्थिति का सीधा संबंध उत्पादन से होता है। और उत्पादन में संतोषजनक प्रगति मिल-मालिक एवं श्रमिकों के सहयोग से संभव है अतः हिटलर ने मजदूर संघों एवं पूँजीपतियों के संगठनों को समाप्त कर लेबर फ्रंट की स्थापना की जिसमें मजदूरों एवं पूँजीपतियों के प्रतिनिधि होते थे। इनमें विवाद होने पर सरकारी कर्मचारी हस्तक्षेप करते तथा उचित मार्ग निकालते थे। इस प्रकार असंतोष समाप्त कर उत्पादन में वृद्धि संभव किया गया था।

2. आर्थिक आत्मनिर्भरता


किसी भी राष्ट्र के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता लोगों का उपयोग बंजर भूमि को कृषियोग्य बनाने में, फैक्टरी में अधिक श्रमिकों द्वारा उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है। जर्मनी की आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए बेकार' अधिक उत्पादन, कोयले के नये खानों में खनन कार्य आरम्भ करा कर अधिक कोयला उत्पादन आदि ऐसे विधियाँ थीं कि जर्मनी में माल बहुतायत से बनने लगा और उसका निर्यात भी शुरू हो गया। इसके अतिरिक्त जो वस्तुएँ विदेशों से आती थीं उनका उत्पादन जर्मनी में होने लगा। घरेलू उत्पादन बढ़ाने तथा खपत में मितव्यययितापूर्वक प्रयोग पर कड़ी निगरानी रखी गयी।

साथ ही साथ जर्मन वैज्ञानिकों का आह्वान किया गया कि वे ऐसी तकनीक एवं रसायन उन्नत करें जिससे खाद्यान्न का अपार भण्डार सुरक्षित कर लिया जाय तथा युद्धोपयोगी वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में उत्पादित कर ली जायें वस्तुतः आर्थिक आत्मनिर्भरता के पीछे हिटलर की दृष्टि उस भावी युद्ध पर लगी थी जिसके द्वारा वर्साय की संधि के अपमान का वह बदला ले सके।

3. धार्मिक विचार

पीप को स्पष्ट कर दिया गया कि पादरी लोग राजनीति में भाग नहीं ले सकते। वे अपने को अपने कार्यक्षेत्र तक ही सीमित रखें। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सरकारी नौकरियाँ दी जा सकती हैं। धर्म सम्बन्धी हिटलर की अन्य कोई रुचि नहीं

थी।

4. यहूदी निष्कासन

नाजीवादी गृहनीति का एक मुद्दा जर्मनी को यहूदियों से मुक्त करना था। प्रथमं विश्वयुद्ध के समय तक जर्मनी का समस्त व्यापार एवं अर्थतंत्र लगभग यहूदियों के हाथ में था जिससे जर्मनीवासियों का शोषण होता था। चूँकि हिटलर को आर्य होने का अभिमान था और यहूदी सेमेटिक प्रजाति के थे अतः यहूदियों की वृत्ति, स्वभाव एवं प्रजाति के कारण हिटलर जर्मनी को उनसे मुक्त करना चाहता था। उसने ऐसे अनेक कदम उठाये जिससे यहूदियों ने जर्मनी से पलायन करना शुरू कर दिया।

5. शिक्षा नीति

गृहनीति में शिक्षा नीति का महत्त्व है। हिटलर ने शिक्षा में नाजीवाद दर्शन को पढ़ाये जाने की अनिवार्यता निश्चित कर दी। शिक्षा का सीधा सम्बन्ध युवा पीढ़ी से होता है और युवा पीढ़ी यदि नाजीवादी विचारधारा से प्रभावित होगी तो आगे आने वाले दिनों में नाजीवाद के प्रचार-प्रसार में सहायता होगी।

6. जनसंख्या शुद्धिकरण

नाजी सरकार जर्मन जाति को विशुद्ध आर्य जाति बनाना चाहती थी। युद्ध के परिणामस्वरूप वहाँ पर जनसंख्या की पर्याप्त कमी हो गयी थी अतः जनसंख्या वृद्धि का प्रचार किया जाने लगा। इस उद्देश्य से कानूनन अवैध सन्तान को अब वैध मान लिया गया। सरकार ने व्यवस्था दी कि केवल वे ही लोग सन्तान उत्पन्न करेंगे जो स्वस्थ तथा परिश्रमी हों। जो व्यक्ति किसी वंशानुगत रोग का शिकार होता था या बहुत मदिरा पीकर दुर्बल हो जाता था उसे नपुंसक कर दिया जाता था या विवाह करने की अनुमति नहीं दी जाती थी जिससे अस्वस्थ सन्तान न उत्पन्न होने पाये। स्वस्थ संतति के लिए नाजियों का यह विधान प्रजातीय राष्ट्रीयता से उत्प्रेरित था।

हिटलर की गृह विदेश नीति

हिटलर की विदेश नीति के मुख्य तीन आधार थे-




  • वर्साय संधि को ठुकरा देना।

  • समस्त जर्मन समुदाय को एकसूत्र में बाँधना।

  • जर्मन साम्राज्य का विस्तार करना तथा इसकी पूर्ति के लिए चाहे जो भी साधन अपनाना पड़े अपनाना।



इतिहासकार लिप्सन के अनुसार हिटलर ने अपनी विदेश नीति के सम्बन्ध में स्वयं एक बार कहा था - "इसकी प्राप्ति के लिए समझौता और यदि यह न हो सका तो युद्धं का आश्रय लेना विदेश नीति की ओर हमारा कदम होगा।"

1. वर्साय संधि

हिटलर का प्रथम लक्ष्य वर्साय संधि को ठुकरा देना था। इस हेतु उसने सर्वप्रथम राष्ट्रसंघ से जर्मनी की सदस्यता समाप्त कर देना ज्यादा उचित समझा। उसने अक्टूबर 1933 ई. में जर्मन प्रतिनिधियों को राष्ट्रसंघ से वापस बुला लिया और सदस्यता त्यागने की सूचना भी दे दी। वर्साय संधि के अनुसार 15 वर्ष पश्चात् अर्थात् जनवरी 1935 ई. में सार प्रान्त को जनमत द्वारा निश्चित करना था कि क्या वे जर्मनी में शामिल होना चाहेंगे। 90% मतदाताओं ने सार का जर्मनी साम्राज्य में विलय के पक्ष में मत दिया और हिटलर ने सार को जर्मनी का अंग बना लिया।

वर्साय संधि द्वारा आरोपित क्षतिपूर्ति दण्ड को उसने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि जर्मनी आक्रमक नहीं था न उसके ऊपर युद्ध का दायित्व लादा जा सकता है। वर्साय संधि की पाँचवीं धारा के अनुसार जर्मनी को 1 लाख तक सेना रखने का अधिकार था किन्तु हिटलर ने तीव्र गति से अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया तथा जर्मनी में सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी एवं सैन्य शक्ति को तेजी से बढ़ाने लगा। इस प्रकार हिटलर ने वर्साय संधि की धज्जी-धज्जी उड़ा दी और अपनी विदेश नीति का एक पक्ष पूरा किया।

2. पोलैण्ड से समझौता

पोलैण्ड जर्मनी का पड़ोसी देश है। हिटलर ने पोलैण्ड के साथ 10 वर्ष की संधि की जिसके अनुसार दोनों देश एक-दूसरे की सीमा का सम्मान करेंगे। इस समझौते से जर्मनी पोलैण्ड से अपने वे प्रदेश प्राप्त कर लेता जिसे पेरिस की शान्ति परिषद् द्वारा पोलैण्ड के अधीन कर दिया गया था। उसका दूसरा उद्देश्य उस वृहद् जर्मन साम्राज्य की स्थापना करना था जिसे पोलैण्ड एवं ऑस्ट्रिया को सम्मिलित कर बनाया जा सकता था। यह एक अपराजेय बड़ी शक्ति की कल्पना थी।

3. ब्रिटेन - जर्मन संधि

हिटलर ने उचित समय पर ब्रिटेन से मित्रता का हाथ बढ़ाया। जर्मन की फ्रांस से जन्मजात शत्रुता थी। इस बीच फ्रांस एवं रूस ने संधि कर ली • थी जिससे ब्रिटेन भीतर ही भीतर नाराज था । उचित अवसर देखकर हिटलर ने ब्रिटेन को अपने पक्ष में ले लिया और जून 1935 ई. को निश्चित हुआ कि थल और नभ सेना में जर्मनी पूरी तरक्की करे किन्तु नौसेना या नाविक शक्ति उसे ब्रिटेन से 35% कम रखनी होगी। यह संधि गुप्त रखी गयी थी।

4. राइनलैण्ड का सैनिकीकरण

हिटलर राइनलैण्ड का पुनर्सेनिकीकरण करने के लिए तत्पर था। चूँकि फ्रांस रूस ने समझौता कर लोकार्नो संधि की शर्तों की अवहेलना की थी अतः हिटलर का अधिकार होता है कि वह राइनलैण्ड का सैनिकीकरण कर दे। हिटलर ने 35 हजार जर्मन सैनिकों को भेजकर राइनलैण्ड पर अधिकार कर लिया।

5. इटली - जर्मनी सन्धि

सार वापस पा लेने के पश्चात् पश्चिमी यूरोपीय देशों में हिटलर की अब अभिरुचि नहीं रह गयी थी। वह पूर्व में बढ़ना चाहता था। इसके लिए उसे ऑस्ट्रिया पर विजय पाना आवश्यक था जो बिना इटली की सहायता के दुष्कर कार्य था । इटली एवं जर्मनी में वैचारिक मतभेद नहीं था, दोनों साम्यवाद के दुश्मन थे। इसके अतिरिक्त इटली भूमध्य सागर पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था और फ्रांस इसका प्रबल विरोधी था। फ्रांस से जर्मन की शत्रुता सभी यूरोपीय देश जानते थे। अबीसीनिया युद्ध के समय मात्र जर्मनी ने ही इटली की सहायता की थी, जबकि ब्रिटेन, फ्रांस आदि देशों ने इटली का आर्थिक बहिष्कार किया था। इन परिस्थितियों में 25 अंक्टूबर 1936 ई. को जर्मनी-इटली में समझौता हुआ जिसके अन्तर्गत -




  • जर्मनी ने अबीसिनिया पर इटली के अधिकारों को मान्यता दे दी

  • स्पेन में फ्रांको के आन्दोलन को समर्थन देना तय हुआ

  • यह तय हुआ कि रूस का विरोध करने में दोनों एकजुट रहेंगे



इस समझौते से दो अधिनायक मित्र हो गये और फ्रांको स्पेन का शासक मान लिया गया। इस प्रकार तीसरी शक्ति भी इनसे आ मिली। इटली-जर्मनी सन्धि हिटलर की योजना की एक बड़ी सफलता थी।

6. रोम-बर्लिन टोकियो धुरी

हिटलर के प्रयास ने उस जापान को भी अपना मित्र बना लिया जिसकी सेना ने रूस की विशाल सेना को पराजित किया था। जापान भी साम्यवाद विरोधी था तथा रूस का शत्रु था। अतः नवम्बर 1936 ई. में बर्लिन-टोकियो धुरी का निर्माण जर्मनी जापान संधि के द्वारा हुआ। इसमें 1937 ई. में इटली भी आ मिला। यह नयी शक्ति रोम-बर्लिन-टोकियो धुरी के नाम से विख्यात हुई।

7. ऑस्ट्रिया विजय


हिटलर ऑस्ट्रिया पर नाजी शासन का अधिकार चाहता था। उस समय ऑस्ट्रिया में शुशनिग प्रधानमंत्री था। उसे बाध्य होकर अपना पदत्याग करना पड़ा। जर्मन की सेनाओं के आक्रमण के भय से ऑस्ट्रिया का नया प्रधानमंत्री डॉ. सेइसइन्कावर्ट नियुक्त किया गया जो कट्टर नाजीवादी एवं हिटलर का भक्त था। ऑस्ट्रिया में जब नाजी सरकार बन गयी तो हिटलर अपने गृहस्थान गया तथा दिवंगत माँ-बाप को श्रद्धांजलि अर्पित की। ऑस्ट्रिया पर नाजीदल के विजय ने जर्मनी की शक्ति का उल्लेखनीय विस्तार किया।

8. चेकोस्लोवाकिया का अन्त

ऑस्ट्रिया के पश्चात् हिटलर का दूसरा शिकार चेकोस्लोवाकिया था। चेकोस्लोवाकिया एक नया स्वतंत्र राज्य था तथा यूरोप में आदर्श प्रजातंत्रीय गणतंत्र के रूप में प्रतिष्ठित था। चेकोस्लोवाकिया का एक प्रदेश सुडटेन लैण्ड था जहाँ जर्मनों की आबादी लगभग 35 लाख थी। हिटलर का उद्देश्य यूरोप भर में फैली जर्मन जाति को एकसूत्र में एकत्रित करना था । अतः काफी लम्बी लड़ाई और राजनीतिक दाँव-पेंच के उपरान्त म्युनिख समझौते के अनुसार सुडटेन लैण्ड से 10 दिनों के भीतर चेक लोगों को खाली करा दिया गया तथा इस पर जर्मनी का कब्जा बिना खून-खराबा मान लिया गया।

9. मेमेल पर कब्जा

मेमेल भी सुडटेन लैण्ड की तरह जर्मनबहुल प्रान्त था जो लिथुआनिया के अधिकार में था। हिटलर के दबाव पर इस छोटे देश ने तुरन्त आत्मसमर्पण कर दिया तथा 21 मार्च 1939 ई. को हिटलर ने मेमेल पर अधिकार कर लिया।

10. जर्मन-रूस समझौता

हिटलर की विदेश नीति की दूरदर्शिता का यह समझौता चरम बिन्दु है। रूस जर्मनी का दुश्मन था आज मित्रवत मिल रहा था। वस्तुतः जर्मनी पोलैण्ड पर आक्रमण करना चाहता था किन्तु पोलैण्ड को इंगलैण्ड एवं फ्रांस की गारंटी मिल गयी थी। यदि जर्मनी अभी पोलैण्ड पर आक्रमण कर देता तो मौका देखकर रूस अवश्य जर्मनी पर आक्रमण कर देता। इस प्रकार जर्मनी को पोलैण्ड एवं रूस दो मोचौं पर युद्ध करना पड़ता। यह जर्मनी के लिए घातक हो सकता था; अतः पोलैण्ड पर युद्ध करने के पहले हिटलर रूस से सन्धि कर लेना चाहता था। 23 अगस्त 1939 ई. को जर्मनी - रूस में एक अनाक्रामक संधि हुई जिसके अनुसार तय हुआ कि वे एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करेंगे। इस संधि के अन्तर्गत गुप्त रूप से पोलैण्ड को जर्मनी एवं रूस में आपस में बाँट लेने की भी बात तय हुई थी।

11. द्वितीय विश्वयुद्ध का बीजारोपण

यूरोपीय देशों के अनेक प्रयासों एवं ब्रिटेन के लाख समझाने पर भी जर्मनी पोलैण्ड पर अपने इरादे से विरत नहीं हुआ और 1 सितम्बर 1939 ई. को बिना विधिवत् घोषणा किये एकदम सुबह जर्मनी की सेना ने पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया। तीन दिनों बाद ब्रिटेन एवं फ्रांस पोलैण्ड की सहायता के लिए पहुँच गये।

इस प्रकार दूसरे विश्वयुद्ध का बीजारोपण पोलैण्ड पर जर्मनी के आक्रमण से हो गया। इस प्रकार, हिटलर की इस नीति से कि जहाँ भी नाजी विचारधारा के और जर्मन प्रजाति के लोग हैं वह जर्मनी का एक अंग है, हिटलर के आक्रामक स्वरूप का ही परिचय मिलता है।


वस्तुतः हिटलर ने इतनी सैन्य एवं अन्य शक्तियाँ प्रस्तुत कर ली थीं कि उसके लिए युद्ध आवश्यक हो गया था