ऐतिहासिक दृष्टि से 'साम्राज्यवाद' कई अभिव्यक्तियों से संबद्ध माना जाता है- जैसे 'उपनिवेशवाद', 'एकाधिकारवादी पूँजीवाद', सैन्यवाद, 'फासीवाद' और 'नव-उपनिवेशवाद' आदि। इसके बावजूद, साम्राज्यवाद का वास्तविक अर्थ स्पष्ट नहीं होता। उपनिवेशवाद आर्थिक शोषण को इंगित करता है जबकि साम्राज्यवाद आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक-सांस्कृतिक शोषण से संबद्ध है।
पूँजीवाद के एक विकसित चरण के रूप में एकाधिकार द्वारा अधिकाधिक मुनाफा कमाना एकाधिकारवादी पूँजीवाद का उद्देश्य है जबकि साम्राज्यवाद पूँजीवादी एकाधिकारवाद का ऐसा कोई स्पष्ट आधार प्रायः नहीं दिखता। साम्राज्यवाद को सुदृढ़ बनाने की दिशा में सैन्यवाद एक रणं कौशल के रूप में अपनाया जाता है। अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर लेने के बाद फासीवाद साम्राज्यवाद का रूप धारण कर लेता है तथा उसके बल पर फूलता - फलता है।
साम्राज्यवाद का मूल तत्व एक राज्य द्वारा दूसरे राज्यों पर अपनी शक्ति का विस्तार है। आधुनिक काल में 'साम्राज्यवाद' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है: पहला, आर्थिक और दूसरा, राजनीतिक, आर्थिक साम्राज्यवाद का तात्पर्य एक देश द्वारा दूसरे देश के आर्थिक शोषण तथा स्वामित्व से है। राजनीतिक साम्राज्य से एक देश द्वारा दूसरे देश के राजनीतिक शोषण का बोध होता है।
राज्यों की यह सामान्य नीति रही है कि वे किसी न किसी रूप में अपना विस्तार करें। राज्यों का अपने प्रभाव और नियन्त्रण को इस प्रकार से फैलाना ही साम्राज्यवाद कहा जाएगा। इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के नवीनतम 15वें संस्करण में इनका लक्ष्य इस प्रकार किया गया है-नह राज्य की ऐसी नीति है जिसका उद्देश्य अपने राज्य की सीमाओं से बाहर रहने वाली ऐसी जनता पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना होता है जो सामान्य रूप से ऐसे नियन्त्रण को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक है।
साम्राज्यवाद के सिद्धांतों के बारे में दो व्यक्तियों की पुस्तकें सर्वाधिक प्रचलित हैं - • जे. ए. हाब्सन : हाब्सन का जन्म 1858 में इग्लैण्ड में हुआ था। मूलतः वे एक व्यापारी थे एवं तात्कालीन उत्पादन कला का उन्हें अच्छा ज्ञान था। वे एक अच्छे पत्रकार थे, गूढ़ अर्थ शास्त्री, पूँजीवादी, सुधारवाद और शांतिवाद के एक प्रचारक तथा साम्राज्यवाद के प्रशंसक थे।
हॉब्सन अपनी प्रसिद्ध कृतियों- 'नेशनल गिल्डस एण्ड दि स्टेट' तथा 'साम्राज्यवाद' के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। हॉब्सन ने 'साम्राज्यवाद' में उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद की विस्तार से चर्चा की है। यह पुस्तक 1902 में लन्दन और न्यूयार्क से- प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की मुख्य आर्थिक और राजनैतिक विशेषताओं का बहुत अच्छा और विस्तृत वर्णन किया है।
दूसरा नाम जो साम्राज्यवाद के सिद्धांतों के लिए सर्वाधिक प्रचलित और वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए प्रसिद्ध है वह है, रूस की 1917 की समाजवादी क्रांति के जनक ब्लादिमीर इलियच लेनिन ।
औद्योगिक क्रान्ति के बाद औद्योगिक उत्पादन यूरोप के बड़े राज्यों का इतना अधिक बढ़ गया था कि यूरोप के देश उसे अपने ही देश में खपा नहीं पा रहे थे। अतः ऐसे उत्पादित सामान को नये बाजारों में बेचने की जरूरत थी। इसके अतिरिक्त रबड़, टीन, कपास, वनस्पति तेल, मैंगनीज आदि कई प्रकार के कच्चे माल की भी माँग बढ़ती जा रही थी।
उद्योगप्रधान देश ऐसे उपनिवेशों पर अधिकार करना चाहते थे जहाँ सस्ते मूल्य पर पर्याप्त कच्चा माल मिल सके। खाद्यान्नों की माँग की पर्त्ति भी इन उपनिवेशों से होती थी। यातायात एवं संचार के साधनों में परिवर्तन होने से वस्तुओं को ले जाना, ले आना सरल हो गया। यूरोप के राज्यों में पूँजी की माँग कम थी। अतः उस पर ब्याज भी कम प्राप्त होता था। लेकिन उसी पूँजी को उपनिवेशों में लगाने से अधिक लाभ मिलने की संभावना थी। इसी कारण बड़े-बड़े बैंकर, व्यापारी, मिल मालिक चाहते थे कि उपनिवेश स्थापित किया जाय ताकि लाभ अधिक प्राप्त हो सके।
यूरोपीय राज्यों की जनसंख्या में वृद्धि विशेष रूप से औद्योगिक क्रान्ति के बाद हुई। यह संभव नहीं था कि हर देश बढ़ी हुई जनसंख्या को रोजगार दे सके और उनके आवास की समस्या का समाधान कर सके। इस कार्य के लिए उपनिवेश उपयुक्त थे। यहाँ बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाया जा सकता था और उन्हें रोजगार भी दिया जा सकता था। इस प्रकार आर्थिक उद्देश्यों के साथ-साथ राजनीतिक पिपासा ने साम्राज्यवाद को जन्म दिया।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कई राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ एवं लेखक, विचारक एवं अर्थशास्त्री आदि ने जन्म लिया जिन्होंने राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए औपनिवेशिक विस्तार का समर्थन किया। कई अन्वेषकों ने नये-नये मार्गों की खोज की। इससे एक-दूसरे देशों के बीच निकटता स्थापित हुई। हेनरी मार्टनर स्टेनली ने कांगो में और कार्लपिट्स ने पूर्वी अफ्रीका में कई उपयोगी वस्तुओं की जानकारी हासिल की। इनके अनुसंधानों के कारण साम्राज्य विस्तार को बल दिया।
यातायात के साधन यूरोपीय देशों की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा को प्रदीप्त करने में निश्चय ही सहायक सिद्ध हुये। अफ्रीका और एशिया में यूरोपीय उद्योगों का माल यातायात के साधनों के कारण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने लगा। रेलों के आविष्कार, मेकएडम प्रकार की सड़कें तथा भाप से चलने वाले जहाज आदि उत्पादित माल का अपेक्षित स्थान के लिये अपेक्षित समय पर निर्यात कर सकते थे। फलस्वरूप दूर-दूर के प्रदेशों पर अधिकार करना और उन पर शासन करना सरल हो गया था।
उग्र राष्ट्रवाद- राष्ट्रवाद उन्नीसवीं शती के अन्त में उग्रता में बदलने लगा, अनेक राष्ट्र केवल अपने-अपने देश के स्वार्थी को महत्त्व देने लगे। प्रत्येक राष्ट्र अपने को महान और दूसरे को हीन समझने लगा। अनेक राष्ट्र शक्ति का आधार साम्राज्य विस्तार को समझने लगे। इस प्रकार शक्ति प्राप्ति और विजय प्राप्ति की लालसा के कारण ही आधुनिक साम्राज्यवाद का उदय हुआ।
इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा जर्मनी ने सामरिक महत्त्व के अनेक प्रदेशों पर अधिकार स्थापित कर लिया। प्रथम विश्वयुद्ध के श्चात् फासिस्टवादियों के अनुसार साम्राज्यवाद का अर्थ देश का विस्तार और राष्ट्रीय ओज की अभिव्यक्ति बन गया। अनेक राजनीतिज्ञों में जैसे इंग्लैण्ड के चैम्बरलेन, रोजवरी, किचनर फ्रांस के फेरी और जर्मन सम्राट कैंसर विलियम द्वितीय ने साम्राज्यवाद को अपनी कूटनीति तथा लेखन द्वारा प्रोत्साहित किया था।
यूरोपीय देशों का एक वर्ग साम्राज्यवाद को शोषण नहीं मानता था। उनके विचारानुसार पिछड़े हुये देशों को सभ्य बनाने के लिये ही इस व्यवस्था का उदय हुआ था परन्तु यह विचार मात्र ढोंग था। साम्राज्यवादी राष्ट्रों ने अपने साम्राज्यवादी प्रयास को न्यायोचित सिद्ध करने के लिये यह प्रचार कर रखा था कि उनका लक्ष्य पिछड़ों को सभ्य बनाना है।
साम्राज्यवाद के समर्थन में प्रस्तुत किये गये 'श्वेत लोगों के बोझ' (The White Men's Burden) के विषय में यह कहा गया कि सभ्य व सुविकसित अंग्रेजों को पिछड़े हुये देशों के लोगों को प्रगतिशील, सभ्य व ज्ञानवान बनाना चाहिये। जूल्स फेरी ने कहा था कि सभ्य जातियों का परम कर्तव्य है कि वे पिछड़े हुये लोगों को सभ्य बनायें। ईसाई पादरियों के पक्ष में भी यह तर्क उपस्थित किया गया कि वे लोक सेवा से प्रेरित होकर विश्व के पिछड़े हुये प्रदेशों में जायें परन्तु यह सब दिखावा था । धर्म-प्रचारकों ने शासकों का साथ साम्राज्य विस्तार में दिया था। लन्दन की धर्म प्रचार समिति (Missionary Society) ने अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए निरन्तर प्रयत्न किये थे।
ईसाई धर्म का प्रचार और प्रसार के क्रम में पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति का भी प्रचार करने के लिए साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया गया। इंगलैण्ड के डॉक्टर डेविड लिविंगस्टन (David Livingstone) ने लगभग 20 वर्ष तक अफ्रीका में कई क्षेत्रों को ढूँढ़ते रहे। उन्होंने दासप्रथा को समाप्त करने के लिए, ईसाई धर्म के प्रचार के लिए अफ्रीका में बहुत कुछ किया।
फ्रांस के कार्डिनल लेभीगेरी (Cardinal Lavigirie) ने अलजिरिया में और ट्यूनिस में विशेष धर्मप्रचार कार्य किया। अफ्रीका में कार्यरत मिशिनरियों की एक समिति भी उसने गठित की। उसके प्रभाव के कारण ही फ्रांस ट्यूनिस पर अधिकार कर सका।
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