प्रथम विश्वयुद्ध में धन-जन की अपूरणीय क्षति हुई थी। इस क्षति का सर्वाधिक प्रभाव पराजित राज्यों पर पड़ा क्योंकि युद्ध में तो उनकी आर्थिक व्यवस्था डगमगा गई। साथ ही उसे मित्रराष्ट्रों को क्षति पूर्ति के रूप में भारी धनराशि की देनदारी भी घोप दी गई।
इस महायुद्ध में मित्रराष्ट्रों को जो क्षति हुई। उसके लिए जर्मनी तथा उसके साथियों को मुख्य रूप से दोषी ठहराया गया। वे अपनी सभी क्षतिपूर्ति की वसूली जर्मनी एवं उसके साथी देशों से करना चाहते थे। इस युद्ध में अमेरिका शामिल नहीं हुआ था, उसने युद्ध में कर्ज के रूप में काफी धनराशि मित्र राष्ट्रों को दी थी। प्रारंभ में ब्रिटेन ने भी मित्रराष्ट्रों को युद्ध लड़ने के लिए कर्ज दिए थे, लेकिन जब युद्ध उग्र रूप धारण करने लगे तो ब्रिटेन के लिए भी कर्ज देना असंभव हो गया था।
युद्ध समाप्त होने के पश्चात् यूरोप के बहुत से राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के कर्जदार थे। साथ ही साथ ब्रिटेन स्वयं अमेरिका का ऋणी था। मित्रराष्ट्रों ने अपने कर्ज की मुक्ति ..के लिए जर्मनी एवं उसके साथियों से हर्जाना वसूलने की भारी रकम लाद दी थी। लेकिन, जर्मनी के सहयोगी राष्ट्रों- ऑस्ट्रिया, हंगरी और बुल्गेरिया लड़ाई में इतने निर्बल हो गए थे कि इनसे कोई हर्जाना वसूलना संभव नहीं था। इन देशों की आर्थिक व्यवस्था संभालने के लिए इन्हें ही कर्ज की आवश्यकता थी। इस स्थिति में मित्रराष्ट्रों के कर्ज का बोझ पूर्णतया जर्मनी पर ही पड़ गया।
इसी बीच 1920, में स्पा में आयोजित एक कांफ्रेन्स में मित्रराष्ट्रों ने यह तय किया कि जर्मनी से जो भी धन की वसूली की जाएगी उसमें 52% हिस्सा फ्रांस, 22% ब्रिटेन, 8% बेल्जियम, 10% इटली और शेष 8% सभी अन्य मित्रराष्ट्रों द्वारा आपस में बाँट लिए जायेंगे। जर्मनी से वसूल की जानेवाली हरजाने की मात्रा और उसे वसूल करने के ढंग का निर्णय करने के लिए पेरिस की शांति परिषद ने एक "हर्जाना कमीशन" को नियुक्त किया, जिसमें अमेरिका, इटली, ब्रिटेन और फ्रांस का एक-एक प्रतिनिधि शामिल थे। इन चार प्रमुख राज्यों के प्रतिनिधियों के अलावे अन्य मित्रराष्ट्रों के भी अन्य प्रतिनिधियों को इसमें शामिल किया गया। प्रारम्भ में जर्मनी से 1500 करोड़ रुपये हर्जाने के रूप में तत्काल जमा करने को कहा गया था, जिसे बाद में कुल 10 हजार करोड़ रुपये नियत कर दिया गया।
प्रारंभ में यह प्रयास किया गया था कि जर्मनी माल के रूप में हर्जाना अदा करें। वह अपने इंजन, कल-कारखानों की मशीनें, कोयला, लोहा और इसी प्रकार के अन्य व्यवसायिक माल देकर हर्जाने की अच्छी-खासी रकम अदा कर सकता था। जर्मनी ने इस तरह से बहुत सारा माल दिया भी परन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी के माल से फ्रांस, ब्रिटेन व अन्य देशों के बाजार भर गए। जर्मनी से मुफ्त में आया हुआ यह माल बाजार में बहुत सस्ती कीमत पर बिकने लगा। इसके मुकाबले में अपने देश का माल बिकना मुश्किल हो गया।
परिणाम यह हुआ कि पूँजीपतियों ने इस तरह माल की शक्ल में हर्जाना वसूल करने के खिलाफ आवाज उठाई और मित्रराष्ट्रों ने यह तय किया कि हर्जाना माल की शक्ल में न लेकर नगद लिया जाए। पर जर्मनी नकदी तभी दे सकता था, जब उसके निर्यात माल की मात्रा आयात माल के मुकाबले ज्यादा रहे। इसके बिना और कोई उपाय नहीं था, जिससे जर्मनी हर्जाने की इतनी भारी रकम अदा कर सके।
जर्मनी के साम्राज्य बिखर गए थे उसके उपनिवेश छिन्न गए थे। इस कारण उसके सभी बाजार उसके हाथों से निकल गए थे। इस दशा में अधिक मात्रा में अपने माल को विदेशों में बेचकर जर्मनी के लिए हर्जाना अदा कर सकना संभव नहीं था। अब उसके पास यही उपाय था कि टैक्स अधिक बढ़ाये, सरकारी खर्च में कभी करें और मुद्रा का प्रसार करें।
इसी बीच 1920, में स्पा में आयोजित एक कांफ्रेन्स में मित्रराष्ट्रों ने यह तय किया कि जर्मनी से जो भी धन की वसूली की जाएगी उसमें 52% हिस्सा फ्रांस, 22% ब्रिटेन, 8% बेल्जियम, 10% इटली और शेष 8% सभी अन्य मित्रराष्ट्रों द्वारा आपस में बाँट लिए जायेंगे। जर्मनी से वसूल की जानेवाली हरजाने की मात्रा और उसे वसूल करने के ढंग का निर्णय करने के लिए पेरिस की शांति परिषद ने एक "हर्जाना कमीशन" को नियुक्त किया, जिसमें अमेरिका, इटली, ब्रिटेन और फ्रांस का एक-एक प्रतिनिधि शामिल थे। इन चार प्रमुख राज्यों के प्रतिनिधियों के अलावे अन्य मित्रराष्ट्रों के भी अन्य प्रतिनिधियों को इसमें शामिल किया गया। प्रारम्भ में जर्मनी से 1500 करोड़ रुपये हर्जाने के रूप में तत्काल जमा करने को कहा गया था, जिसे बाद में कुल 10 हजार करोड़ रुपये नियत कर दिया गया।
हर्जाने की अदायगी में कठिनाई: प्रारंभ में यह प्रयास किया गया था कि जर्मनी माल के रूप में हर्जाना अदा करें। वह अपने इंजन, कल-कारखानों की मशीनें, कोयला, लोहा और इसी प्रकार के अन्य व्यवसायिक माल देकर हर्जाने की अच्छी-खासी रकम अदा कर सकता था। जर्मनी ने इस तरह से बहुत सारा माल दिया भी परन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी के माल से फ्रांस, ब्रिटेन व अन्य देशों के बाजार भर गए। जर्मनी से मुफ्त में आया हुआ यह माल बाजार में बहुत सस्ती कीमत पर बिकने लगा। इसके मुकाबले में अपने देश का माल बिकना मुश्किल हो गया।
परिणाम यह हुआ कि पूँजीपतियों ने इस तरह माल की शक्ल में हर्जाना वसूल करने के खिलाफ आवाज उठाई और मित्रराष्ट्रों ने यह तय किया कि हर्जाना माल की शक्ल में न लेकर नगद लिया जाए। पर जर्मनी नकदी तभी दे सकता था, जब उसके निर्यात माल की मात्रा आयात माल के मुकाबले ज्यादा रहे। इसके बिना और कोई उपाय नहीं था, जिससे जर्मनी हर्जाने की इतनी भारी रकम अदा कर सके।
जर्मनी के साम्राज्य बिखर गए थे उसके उपनिवेश छिन्न गए थे। इस कारण उसके सभी बाजार उसके हाथों से निकल गए थे। इस दशा में अधिक मात्रा में अपने माल को विदेशों में बेचकर जर्मनी के लिए हर्जाना अदा कर सकना संभव नहीं था। अब उसके पास यही उपाय था कि टैक्स अधिक बढ़ाये, सरकारी खर्च में कभी करें और मुद्रा का प्रसार करें।
मुद्रा के प्रसार से विदेशी विनिमय में जर्मनी के सिक्के की कीमत गिरेगी, सिक्के की कीमत गिरने से दूसरे देश में जर्मनी का माल सस्ता पड़ेगा और इस प्रकार जर्मनी के लिए यह संभव हो जाएगा, कि वह अपना माल अधिक से अधिक मात्रा में दूसरे देशों को बेच सके और उससे जो धन उसे प्राप्त हो, उसे हर्जाने की अदाएगी के लिए प्रस्तुत कर सके। जर्मनी ने इसी नीति का अनुसरण किया। जर्मन सिक्को मार्क की कीमत गिरने लगी और जर्मनो का माल अन्य देशों में सस्ते दाम पर बिकने लगा।
इसी बीच ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका में जर्मनी से आया माल अपने देश के मुकाबले सस्ते में बिकने लगा। कल-कारखानों के मालिकों को फिर शिकायत का मौका मिला और उन्होंने अपने देशों की सरकारों को इस बात के लिए विवश किया कि संरक्षण नीति का अनुसरण किया जाए और बाहर से आने वाले माल पर आयात कर लगाया जाए। इसके परिणामस्वरूप जर्मन माल विदेशी में बिकना बंद हो गया और पैदावार बढ़ाकर व माल को दूसरे देशों में बेचकर हर्जाने की अदाएगी की सब आशा नष्ट हो गई।
अब जर्मनी के पास केवल एक उपाय शेष रहा, कि वह कर्ज ले और मुद्रा का और अधिक प्रसार करें। परिणाम यह हुआ कि मार्क की कीमत लगातार गिरती गई और जर्मनी का आर्थिक जीवन बिल्कुल अस्त-व्यस्त हो गया। सिक्के की कीमत गिरने का असर किसी भी देश की आर्थिक जीवन पर बहुत बुरा पड़ता है। लोग अपने धन को अपनी बचत को बैंकों में जमा करते है। बैंक उसी रकम का देनदार होता है, जो उसके पास जमा की गई हो। यदि उसके पास किसी के एक हजार मार्क जमा है तो वह एक हजार मार्को का ही देनदार है। बैंक को इस बात से कोई वास्ता नहीं कि जब उसके पास रकम जमा कराई गई थी तो उससे कितना माल खरीदा जा सकता था और जब वह रकम वापस दे रहा है तो उससे क्या कुछ माल खरीदा जा सकता है। यही हालत बीमा कम्पनियों द्वारा दी जाने वाली रकमों, सरकारी कर्ज की रकमों और अन्य देनदारियों के बारे में समझी जा सकती है।
मुद्रा का इस प्रकार अवमूल्यन हो गया कि अब मार्क का कोई मूल्य ही नहीं रह गया। प्रारंभ में एक पौण्ड के 20 मार्क आते थे, 1920 में मार्क की कीमत गिरकर 250 मार्क पहुँच गई थी। 1922 में एक पौण्ड के बदले 34,000 मार्क खरीदे जा सकते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों को जो कुछ रुपया पाना था, वह सब मिट्टी हो गया। कीमते बेहद बढ़ गई। आम मजदूरों को जो दैनिक मजदूरी मिलती थी, उसमें तो कीमतों के बढ़ने के साथ-साथ वृद्धि भी हो सकती थी पर मध्यम श्रेणी के लोगों को जो वेतन मिलता था वे प्रायः निश्चित होते थे।
इस प्रकार मध्यम श्रेणी के नियत वेतन पाने वाले को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ा। उनकी आमदनी तो अब आम गरीब, मजदूरों के बराबर रह गई थी, पर उनका रहन-सहन ऊंचा था। उनमें बहुत बैचेनी और असंतोष था । विदेशी लोगों के लिए जर्मनी अब स्वर्ग के समान था। कोई भी व्यक्ति पौण्ड, रुपया, फ्रांक या डॉलर जेब में डालकर जर्मनी में आनन्द से जीवन बिता सकता था। मात्र कुछ रुपयों में ही सम्पूर्ण जर्मनी की यात्रा की जा सकती थी। कुछ पैसों में प्रतिदिन अच्छे से अच्छे होटल में ठहरा जा सकता था। कुछ रुपयों में ही जर्मनी में अच्छी जायदाद भी खरीदी जा सकती थी।
जर्मनी की इस दुर्दशा पर जर्मनी के लोग अधिक परेशान थे। उनके लिए यह असंभव था कि हर्जाने की अदायगी में कुछ भी दे सके। नगद कुछ भी दे सकना उनके लिए • नामुमकिन था। उनके सिक्कों की कीमत धूल में मिल गई थी, उससे किसी भी विदेशी सिक्के को खरीद सकना उसके लिए कठिन था। यही कारण था, जब हर्जाने की राशि नहीं दे सकने के कारण फ्रांस ने जर्मनी के रूर प्रदेश पर अधिकार कायम कर लिया था।
इस प्रकार उपरोक्त अध्ययनों से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् मित्रराष्ट्रों द्वारा युद्ध के लिए जर्मनी एवं उसके सहयोगियों को उत्तरदायी ठहराया गया। इसके बदले में उन्होंने क्षतिपूर्ति की माँग की, लेकिन जर्मनी के सहयोगी राष्ट्र आर्थिक रूप से पूर्णतया पंगु हो गए थे अतः उनके स्थान पर पूर्ण रूपेण जर्मनी से क्षतिपूर्ति का लक्ष्य निर्धारित किया गया। इस कारण जर्मनी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई। इसी के परिणामस्वरूप जर्मनी में हिटलर जैसे तानाशाह का उदय हुआ। उसने इस क्षतिपूर्ति को गलत बताया तथा इसके अदायगी को समाप्त कर दिया जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर द्वितीय विश्वयुद्ध की समस्या खड़ी हो गई।
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