चीन का विभाजन या चीनी तरबूज का बँटवारा

सन 1894-95 के चीन-जापान युद्ध में चीन की पराजय हुई, इस पराजय के बाद उसे एक बहुत बड़ी धनराशि हर्जाने के रूप में जापान को देनी थी, लेकिन चीन की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह 15 करोड़ डॉलर की रकम जापान को दे सकता था। अतः फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और जर्मनी ने मिलकर हर्जाना चुकाने के लिए चीन को धन उपलब्ध कराया इसके बदले में इन देशों ने चीन को अपने अपने प्रभाव क्षेत्र में बांट दिया इस विभाजन को ही चीनी खरबूजे का काटा जाना कहा जाता है।1895 ई॰ तक चीन में पश्चिमी राष्ट्रों की मुख्य दिलचस्पी वाणिज्य के लिए ही थी । व्यापारी चीन का रेशम और चाय खरीदते थे और बदले में चीन को चाँदी, अफीम, चन्दन, फर तथा अनेक प्रकार की निर्मित वस्तुएँ बेचते थे ।

लेकिन, 1895 ई॰ में यह स्थिति एकाएक बदल गयी । चीन अब ‘एशिया का मरीज’ के रूप में प्रकट हुआ और पश्चिमी राज्यों के मुँह में उसके बँटवारे के लिए पानी भर आया । अब तक चीन का विभाजन नहीं हो सका था । इसका मुख्य कारण था पाश्चात्य देशों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा ।

लेकिन, जापान की सफलता ने उन्हें नयी नीति का अवलम्बन करने की प्रेरणा दी । फलत: यूरोपीय देश अब चीन के विभिन्न क्षेत्रों पर अपना-अपना दावा पेश करने लगे और चीन को विविध प्रभाव-क्षेत्रों में बाँटने लगे । इस तरह, ‘चीनी तरबूज’ को काटने की प्रक्रिया आरम्भ हुई ।

कई कारणों से अब चीन पर पाश्चात्य देशों का शिकंजा कसता गया और वे सब नयी-नयी सुविधाओं की माँग करने लगे । इसे लेकर उनके बीच आपसी होड़ आरम्भ हो गयी, जिसे ‘सुविधाओं का युद्ध’ कहते हैं । इसका प्रभाव चीन की प्रादेशिक एकता पर बड़ा घातक सिद्ध हुआ । चीन के भू-भाग धीरे-धीरे केन्द्रीय सरकार के अधिकार से निकलने लगे और उन पर विदेशियों का आधिपत्य कायम होता गया चीन की लूट-खसोट की असली प्रक्रिया अब शुरू हुई ।

कोरिया को लेकर जो चीन-जापान युद्ध हुआ था, उसका अन्त शिमोनोस्की की सन्धि से हुआ था । इस सन्धि के कारण चीन को अत्यधिक नुकसान पहुँच रहा था । पश्चिमी राज्यों की आकांक्षा भी सीमित हो रही थी । अतएव फ्रांस, जर्मनी और रूस हम देख चुके है- हस्तक्षेप कर शिमोनोस्की सन्धि में संशोधन कराया जिससे लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन के हाथ से निकलने से बच गया । इसके अतिरिक्त, जापान को क्षतिपूर्ति भी देनी थी । इसके लिए चीन को इन्हीं तीनों देशों ने कर्ज दिया । इस प्रकार, चीन इन तीनों देशों के प्रति कृतज्ञ हो गया । किन्तु, इसका त्त्व भी उसे शीघ्र ही चुकाना पड़ा । तीनों शक्तियों ने चीन को जो लाभ पहुँचाया था, उसके एवज में वे चीन से रियायतें और सुविधाएँ माँगने लगे ।

फ्रांस का हिस्सा-चीन को जापान को जो युद्ध का हरजाना देना था उसके लिए जुलाई, 1895 में फ्रांस ने एक ऋण जारी किया जिसकी गारण्टी रूस ने ली । कर्ज के रूप में धन देने के पहले फ्रांस ने चीन से यह वादा करा लिया कि वह हैनान का द्वीप किसी अन्य राज्य को नहीं देगा । कुछ ही दिनों के अन्दर फ्रांस को चीन में अग्रलिखित सुविधाएँ प्राप्त हो गयीं ।युद्धान, क्वांगसी और क्वांगतुंग की खानों को खोदने का एकाधिकार और दक्षिणी चीन में अनाम रेलवे के विस्तार का अधिकार उसे मिला । दक्षिणी चीन में फ्रांसीसी माल पर चुंगी भी घटा दी गयी । इस प्रकार, फ्रांस ने चीन-जापान- युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद ही चीन में सुविधाओं के युद्ध का आरम्भ कर दिया । 1897-98 में फ्रांस ने और नये अधिकार और सुविधाएं प्राप्त कीं