धर्म-सुधार के क्षेत्र में रामकृष्ण मठ एवं मिशन के महत्व

रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने सन् 1897 ई. में अपने गुरू राम कृष्ण परमहंस के नाम को उजागर करने के लिए की थी। रामकृष्ण परमहंस (1836-1885) उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के महान साधक एवं सन्त थे। वे कलकत्ते के निकट दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के पुजारी थे। यद्यपि वे पढ़े लिखे नहीं थे, तथापि अपनी साधना और भक्ति के सहारे उन्होंने आध्यात्मिक क्षेत्र में अपूर्व सफलता प्राप्त की थी। वे काली के अनन्य भक्त थे तथा उनकी पूजा इतनी तन्मयता से करते थे कि आत्मविभोर हो जाते थे। वे सभी धर्मों को ईश्वर को पाने का अलग-अलग रास्ता मानते थे। वे काली को जगदम्बा एवं संसार की रक्षिका मानते थे। अपनी साधना के द्वारा उन्होंने अपूर्व आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त कर ली थी तथा सरल भाषा में दिये गये उपदेशों से वे अपने सुननेवालों को मंत्रमुग्ध कर लेते थे।

शीघ्र ही उनकी ख्याति पूरे देश में फैल गयी। जो भी उनके सम्पर्क में आता था, उनकी साधना, भक्ति और उनके संवेदनशील व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। कलकत्ता के बहुत से प्रतिष्ठित एवं प्रभावशाली व्यक्तियों ने उनको अपना गुरू माना। इन्हीं शिष्यों में स्वामी विवेकानन्द प्रमुख थे।

विवेकानन्द

विवेकानन्द का वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त (1862-1902) था। नरेन्द्रनाथ दत्त कलकता विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा पास करने के बाद रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आये और शीघ्र ही उनके सबसे प्रिय शिष्य बन गये। रामकृष्ण के प्रभाव में आकर नरेन्द्रनाथ दत्त ने संन्यास ग्रहण किया और वे स्वामी विवेकानन्द के नाम से मशहुर हुए। 1886 में रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद विवेकानन्द ने भारत का भ्रमण किया तथा भारतीय संस्कृति और दर्शन का गम्भीर अध्ययन किया। 1893 ई. में उनके कुछ श्रद्धालु भक्तों एवं मित्रों ने उन्हें अमेरीका के शिकागो शहर में होने वाले "पार्लियामेंट आफ रिलीजन्स" (Parliament of Religions) नामक एक धर्म-सम्मेलन में भाग लेने के लिए भेजा।

स्वामी विवेकानन्द ने इस सम्मेलन में अपनी वक्तत्व कला एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध एवं चकित कर दिया। यद्यपि उन्हें शुरू में पाँच मिनट तक ही बोलने का समय दिया गया, पर श्रोताओं ने और अधिक बोलने का बार-बार अनुरोध किया। अपने भाषण के द्वारा उन्होंने हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा सारे विश्व में स्थापित कर दी तथा यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू-धर्म विश्व के महान धर्मों में एक है। विवेकानन्द की सफलता से भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा में चार चाँद लग गये और साई मिशनरियों द्वारा हिन्दू-धर्म के विरूद्ध फैलाई गई अपवाहें खोखली साबित हुई।

भाषण के द्वारा उन्होंने हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा सारे विश्व में स्थापित कर दी तथा यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू-धर्म विश्व के महान धर्मों में एक है। विवेकानन्द की सफलता से भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा में चार चाँद लग गये और साई मिशनरियों द्वारा हिन्दू-धर्म के विरूद्ध फैलाई गई अपवाहें खोखली साबित हुई।

बहुत से अमेरीकी और यूरोपीय लोगों ने स्वामी विवेकानन्द का शिष्य बनकर हिन्दू धर्म ग्रहण किया। इस प्रकार अमेरिका और यूरोप में विजय पताका फहराते हुए विवेकानन्द भारत लौटे। यहाँ पहुँचने पर उनका अपूर्व स्वागत हुआ। वे जहाँ कहीं जाते, उनके दर्शन और भाषण सुनने के लिए हजारों की भीड़ इकट्टी हो जाती। विवेकानन्द ने अपनी लोकप्रियता के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण एवं हिन्दू धर्म के उत्थान की प्रक्रिया को गतिशील बनाया। अपने धार्मिक एवं सामाजिक विचारों को कार्यान्विन्त करने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने 1897 में "रामकृष्ण मठ मिशन' की स्थापना की।

रामकृष्ण मिशन के उद्देश्य एवं कार्य

  • इस संस्था का उद्देश्य रामकृष्ण परमहंस द्वारा दिये गये उपदेशों का प्रचार करना एवं उनके उपदेशों के आधार पर मानवता का कल्याण करना था।

  • यह संस्था विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच प्रेम और सद्भाव स्थापित करना चाहती थी, क्योंकि सभी धर्म एक शाश्वत धर्म के ही विभिन्न रूप हैं।

  • यह संस्था ऐसे लोगों को प्रशिक्षित करेगी जो जनता के भौतिक एवं आध्यात्मिक कल्याण के लिए ज्ञान-विज्ञान, कला एवं उद्योगों की शिक्षा दें। यह संस्था जनता में रामकृष्ण के धार्मिक विचार एवं वेदान्त का प्रचार करेगी।

  • यह संस्था अपने मठों एवं आश्रमों में ऐसे सन्यासियों को शिक्षा देगी जो देश और विदेश में पूर्ण निष्ठा के साथ इन उद्देश्यों का प्रचार करें।

स्वामी विवेकानन्द ने इस संस्था के माध्यम से अपने विचारों को कार्यान्वित किया।

उनके प्रमुख धार्मिक विचार निम्नलिखित थे-

  • हिन्दू धर्म संसार का प्राचीनतम एवं श्रेष्ठतम धर्म है तथा प्राचीन भारत संसार का गुरू 'था।

  • ईश्वर निराकार है तथा वह मनुष्य की बुद्धि के परे है। फिर भी उसे समस्त संसार में, सभी जीवों में तथा सभी देवताओं में परखा जा सकता है।

  • हिन्दू धर्म में प्रचलित मूर्ति पूजा ईश्वर की उपासना का आध्यात्मिक ढंगे है। अतः मूर्तिपूजा करने में कोई हानि नहीं है।

  • हिन्दू संस्कृति संसार की प्राचीनतम संस्कृति है तथा यह पूर्णतया आध्यात्मिक तथा सुन्दर है। इसकी तुलना में पश्चिमी सभ्मता भौतिकी स्वार्थपरक और वासनापरक है।

  • संसार में जीवित रहने के लिए हिन्दू संस्कृति को क्रियाशील एवं सजग होना पड़ेगा। हिन्दुओं को पश्चिमी देशों से वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। जिससे वे सभ्यता की दौड़ में पीछे न छूट जाएँ।

  • हिन्दू धर्म में समाज-सेवा को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। गरीबों को खिलाना, अनाथ बच्चों को पालना तथा रोगियों की सेवा करना हिन्दूधर्म का प्रमुख अंग' बनना चाहिए। इन आदर्शों को क्रियान्वित करने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने अथक प्रयत्न किया। उन्होंने देश-विदेश में रामकृष्ण मिशन की शाखाएँ स्थापित कीं तथा घूम-घूमकर अपने प्रभावशाली, भाषणों से हिन्दू जाति की निद्रा एवं उन्द्रा को भंग कर जागरूक बनाया। वास्तव में उन्होंने अपने व्यक्तित्व से हिन्दू समाज को जगा कर उसे आधुनिक युग की चुनौतियों का सामना करने के लायक बनाया। तत्कालीन युवकवर्ग के वे हृदय सम्राट बन गये।

विवेकानन्द अपने दृष्टिकोण में पूर्णतया आधुनिक थे और वे हिन्दूधर्म की प्राचीन गरिमा में विश्वास करने के साथ-साथ उसे आधुनिक एवं शक्तिशाली बनाना चाहते थे। उन्होंने "प्रबुद्ध भारत" एवं "उद्बोधन" नामक दो मासिक पत्रिकाओं के द्वारा अपने विचार का प्रचार किया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन के कार्यक्रम में शिक्षा प्रसार, समाज-सेवा तथा रोगियों के इलाज को प्रमुख स्थान दिया। मिशन ने देश के विभिन्न भागों में अनेक स्कूल, कॉलेज, अस्पताल तथा दातव्य औषधालय स्थापित किए जिसका संचालन आज भी मिशन के सन्यासियों द्वारा होता है। मिशन ने अकाल महामारी एवं बाढ़ आदि प्राकृतिक विपत्तियों के समय बहुत बड़े पैमाने पर पीड़ितों की सेवा की है।

मिशन की शाखाएँ विदेशों में भी स्थापित हुई। अमेरिका के न्यूयार्क, बॉस्टन वाशिंग्टन तथा सान-फ्रांसीसकों नगरों में रामकृष्ण मिशन हिन्दूधर्म का प्रचार करता है। . वेदान्त के सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए कई वेदान्त- सोसाइटियाँ मिशन द्वारा चलाई जाती हैं। समाज सेवा एवं हिन्दूधर्म के पुरनरूत्थान के क्षेत्र में रामकृष्ण मिशन ने • महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

स्वामी विवेकानन्द भारतीय इतिहास के रंगमंच पर ऐसे समय में आये, जब उनके गतिशील नेतृत्व ने हिन्दूधर्म के सुधार एवं राष्ट्रीय जागरण में अभूतपूर्व काम किया। विवेकानन्द ने अपने गुरू के संदेश को व्यावहारिक रूप देकर उन्हें अमर कर दिया। विवेकानन्द में संगठन एवं नेतृत्व की अपूर्व प्रतिभा एवं क्षमता थी। उनके प्रभाव से देशभक्ति की भावना जोर पकड़ती गई। वे देश के युवकों को शक्तिशाली एवं क्रियाशील बनाना चाहते थे।

उनके धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के पीछे मूल उद्देश्य भारतीय संस्कृति की सोयी हुई आत्मा को जगाकर सक्रिया बनाना था। इसलिए उन्होंने एक भाषण में कहा था - "हमारे देश को आज किस चीज की जरूरत हैं? हमें ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है जिनकी मांसपेशियाँ लोहे की और जिनकी नसें फौलाद की बनी हों। हमें ऐसे नवयुवक चाहिए जो विश्व के रहस्यों का उद्घाटन कर सके।"

इस प्रकार स्वामी विवेखानन्द ने अपने ओजस्वी भाषणों एवं अपनी संगठनशक्ति के द्वारा सामाजिक एवं धार्मिक प्रक्रिया को गतिशील बनाया तथा देश के सांस्कृतिक जागरण को एक नयी दिशा दी