राजा राममोहन राय भारतीय समाज में प्रचलित कुरीतियों से बड़े दुःखी रहते थे और उनको दूर करना चाहते थे। अपने उद्देश्य पूर्तिके लिए अथार्त धर्म और समाज के दोष में सुधार के लिए उन्होंने 20 अगस्त 1898 में एक संस्था" ब्रह्म सभा की स्थापना की जिसकोबाद मे नाम बदलकर "ब्रह्म समाज" कर दिया। इस समाज के कार्यक्रम में हिन्दू, मुस्लिम और इसाई तीनों धर्मों के अच्छे गुणों कासमावेश किया गया।
राजा राम मोहन राय के प्रभावशाली नेतृत्व में ब्राह्म समाज ने चतुर्मुखी उन्नति की। उन्होंने जिस आन्दोलन का पुत्रणा किया उनका उत्त उसकी मृत्यु के बाद भी न हो सका। उनके अपने कामों को पूरा करने का भार श्री देवेन्द्रनाथ टेगोर तथा केशवचन्द्र सेन ने किया। इनलोगों से ब्रह्म समाज को नियमबध कर उसे पुनजीवित किया तथा राजा साहब के विचारों का उत्साह से प्रचार किया। लेकिन दुर्भाग्यवश, इसी समय केशवचन्द्र सेन रतथा अन्य ब्रहम समाजियों में मतभेद हो गया। जिसके फलस्वरूप मौलिक ब्रह्म समाज से अलग होकर केशवचन्द्र सेन से एक नवीन ब्रह्म समाज की स्थापना की। केशवचन्द्र सेन की इस संस्था ने समाज सुधार के कार्यों को बहुत आगे बढ़ाया। इस संघ की अनेक शाखाएँ बंगाल से बाहर कायम हुई। वास्तव में, राजा राममोहन राय स्थापित ब्रह्म समाज भारतीय समाज-सुधार-आन्दोलन का आधा साबित हुआ। इस इसी का अनुसरण करते हुए देश के अन्य आगों में और कई संस्थाएँ कायम हुई।
हिन्दू समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करना।
सभी धर्मों का आपसी मेल मिलाप हो।
इसाइयों के धर्म का भारत में बढ़ता प्रभाव को रोकना।
एकेश्वरवाद में आसका आस्था और उसके सर्वशक्तिमान होने विश्वास।
सभी को पूजा का अधिकार हो।
सच्चे हृदय से प्रार्थना करना।
आत्मा के अजर-अमर होने में विश्वास करना।
सभी धर्मों के प्रति की आदर भावना
मोक्ष की प्राप्ति के लिए पाप का त्याग एवं प्रयाशिचत करना आवश्यक है।
ईश्वर एक है। वह संसार का स्रष्टा पालक और रक्षक है; उसकी शक्ति, प्रेम, न्याय और पवित्रता असिमित है।
जीवात्मा अमर है; उसमें उन्नति करने की असीज़ क्षमता है और वह अपने कार्यों के लिए भगवान के सामने उत्तरदायी है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रार्थना, भगवान का आश्रय और उसके अस्तित्व की अनुभूति आवश्यक है।
किसी भी बनाई हुई वस्तु को ईश्वर समझकर नहीं पूजना चाहिए और न की किसी पुस्तक या पुरुष को निर्वाह अथवा मोक्ष का एकमात्र साधन मानना चाहिए।
अस्पृश्यता का विनाश होना आवश्यक है।
बाल विवाह पर रोक लगाना परम आवश्यक है।
विधवा - विवाह का प्रचार 4. बाल - हत्या अपराध है।
एकेश्वरवाद ,आत्मा की अमरता, स्त्रि शिक्षा, विधवा विवाह, स्त्रि का उत्तराधिकार , अंतरजातिय विवाह, सर्वधर्म का समर्थन, अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन
समाजिक कुरितियों का विरोध जैसे - सती प्रथा, बाल विवाह, दुविवाह, कन्याओं की हत्या, इत्यादि का विरोध।
धार्मिक बुराइयों का विरोध पर्दा प्रथा, छुआ - छुत, जति एय मूर्ति पूजा का विरोध: पुरोहितवाद का विरोध, कर्मकाण्ड, आडम्बर विरोध अविश्वास का
ब्रहन समाज ने बाल विवाह, कन्या व वर का क्रय विक्रय, कन्या वध, सती प्रथा आदि का विरोध किया, विधवा विवाह का समर्थन किया। छुआ-छूत, अस्पृश्यता, जाति पाँति आदि के विरुद्ध बीड़ा उठाया।
पाखण्ड, आडम्बर, पुरोदिववाद, कर्मकांड का विरोधा मूर्ति-पूजा, अनेकेश्वरवाद के विरुद्ध आवाज उठाई, मानव धर्म ची थी की दुहाई दी। इस विश्वास का प्रसार किया कि आत्मा एक है।
हिन्दू कॉलेज, रुइंगलिश स्कूल आदि शिक्षा की संस्थाओं दुवारा भारतीय को पाश्चात्य विज्ञान का अध्ययन करवाया। और स्त्रियों के लिए भी "बैथून कॉलेज" तथा अन्य शिक्षणालयों की स्थापना की। आज भी अनेक स्थानों पर ब्रह्म समाज के स्कूल आदि चल रहे हैं
इस तरह हम देखते है की राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज ने हिंदू कानून में सुधार करने के लिए आवाज उठाई मुद्रणालयों पर लगे प्रतिबंध का विरोध किया राजाराम मोहन राय एवं अन्य ब्रह्म समाजियों ने भारतीय में नई चेतना जागृति की और देश को राष्ट्रीयता के विकास-पथ पर बढ़ाया।
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