आर्य समाज के सिद्धान्त

धार्मिक एवं सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में उन्नीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध में आर्य समाज नामक संस्था ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्रती (1824-1883) थे। दयानन्द का जन्म गुजरात के मौर्वी राज्य के टंकारा नामक स्थान में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। पंद्रह वर्ष की अवस्था में ही मूर्तिपूजा के प्रश्न को लेकर उन्हें अपने पिता से मतभेद हो गया और घर छोड़कर सन्यासी हो गये। उन्होंने मथुरा में स्वामी विरजानन्द नामक एक अन्धे संयासी के पास रहकर कई वर्षों तक वेदों और शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया।

शिक्षा समाप्त होनो पर स्वामी विरजानन्द ने उनसे वचन लिया कि वे वैदिक धर्म में निहित तथ्य के प्रचार में अपना जीवन लगायेंगे तथा पुराणों पर आधारित धार्मिक विश्वासों का खण्डन करेंगे। इसके साथ ही वे सच्ची शिक्षा-पद्धति की स्थापना करेंगे। दयानन्द ने इस प्रतिज्ञा का अक्षरशः पालन किया। इस उद्देश्य से उन्होंने "सत्यार्थ प्रकाश", वेद भाष्य भूमिका एवं "वेद भाष्य" जैसी पुस्तकों की रचना की तथा पूरे देश में घूम-घूमकर अनेक शास्त्रार्थों में पौराणिक मत का खण्डन किया।

अपने धार्मिक एवं सामाजिक सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल, 1875 को बम्बई में आर्य समाज नामक संस्था की स्थापना कीं। इस संस्था ने धार्मिक और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में शक्तिशाली नेतृत्व किया- तथा धीरे-धीरे यह संस्था उत्तर भारत और पश्चिमी भारत में एक लोकप्रिय एवं प्रभावशाली संस्था के रूप में उभरी। आर्य समाज के सिद्धान्त निम्नलिखित थे-

  • इस संसार में ज्ञान का वास्तविक एवं परम कारण ईश्वर है।

  • ईश्वर सत्, चित, आनन्द है। वह निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायपूर्ण, परमकृपालु, अनादि-अनंत, अपरिवर्तनीय, सबका स्वामी परम पवित्र एवं शाश्वत है।

  • वेद ही ऐसा धर्म-ग्रन्थ है जिसमें सच्चा ज्ञान भरा हुआ है। इसलिये वेदों को पढ़ना, पढ़ाना उनका उच्चारण करना और उनका श्रवण करना। प्रत्येक आर्य का परम कर्तव्य है।

  • मनुष्य को सदैव सत्य के ग्रहण और असत्य के परित्याग के लिये तैयार रहना चाहिये।

  • प्रत्येक कार्य धर्म के सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर उचित एवं अनुचित का विचार करके करना चाहिये।

  • आर्य-समाज पूरी मानव जाति के शारीरिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए सचेष्ट रहेगा।

  • दूसरों के साथ व्यवहार धर्म को ध्यान में रखकर प्रेम और न्याय के आधार पर होना चाहिये।

  • प्रत्येक व्यक्ति को अविद्या के नाश और विद्या के प्रसार के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

  • प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों के कल्याण और विकास को ही अपना कल्याण और विकास मानना चाहिए।

  • व्यक्तिगत मामलों में प्रत्येक मनुष्य को आवरण की स्वतन्त्रता है पर सामाजिक मामलों में परोपकार की भावना से काम करना चाहिए