कैंटेन व्यापार व्यवस्था

16वीं शताब्दी के प्रारंभ में पुर्तगालियों के दक्षिणी चीनी समुद्र तट पर पहुंचने के बाद से ही चीनी और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का प्रचलन हो गया था । 17 वीं शताब्दी के मध्य से 18वीं शताब्दी के दौर में इन समुद्री व्यापार में कई उतार-चढ़ाव आए । 17 वीं शताब्दी में अमेरिका को छोड़कर प्रायः सभी देशों से व्यापार कर रहे थे किंतु चीन में विदेशी व्यापार पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए कैंटेन बंदरगाह को छोड़कर बाकी सारे बंदरगाहों को विदेशियों के लिए बंद कर दिया गया।

1757 ईसवी में कैंटेन व्यवस्था की स्थापना हुई, जो अफीम युद्ध तक चीन और पश्चिमी देशों के बीच व्यापारिक संबंध का एकमात्र मान्य स्वरूप बनी रही ।
कैंटन व्यवस्था से आशय उन तमाम व्यापारिक प्रबंधों से है जो 1757 और 1842 के बीच पश्चिमी देशों के लिए उपलब्ध थे। विदेशी व्यापारियों ने कैंटन में व्यापारिक प्रतिष्ठान बनाकर रखे, जिन्हें गोदामों के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता था इन्हें "फैक्ट्री' या कारखाना कहा जाता था। वे लोग साल के अधिकांश समय मकाओ में रहते थे, लेकिन हर साल जब उनके देश से उनके जहाज आते तो ये व्यापारी पर्ल नदी के मुहाने से जहाज से कैंटन चले जाते थे, जहाँ वे अगस्त से मार्च तक के व्यापार के समय तक रहते थे। उन्हें अपने साथ अपने परिवारों को लाने की अनुमति नहीं थीं और वे व्यापार के ठिकाने के अंदर ही आ जा सकते थे।

कँटन में, पश्चिमी व्यापारियों के सभी व्यापारिक लेन-देन "को हाँग" के माध्यम से होते थे। "को हाँग" जाने-माने स्थानीय सौदागरों की एक श्रेणी थी, जिसके व्यापार पर एकाधिकार को छिंग सरकार की मान्यता मिली हुई थी। इस सरकारी मान्यता के बदले में, हाँग सौदागर व्यापार के तमाम प्रबंधों को देखते थे, विदेशी व्यापारियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराते थे और उनके अच्छे व्यवहार की जमानत देते थे। वे सामूहिक रूप से शाही सरकार के अधिकारियों के प्रति जिम्मेदार थे, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण थेलियांगगुवांग ( जिसमे कैंटन या गुआंगजोउ आता था ) का वाइसराय और समुद्री सीमा शुल्क का अधीक्षक ( जिसे "होप्पो' कहा जाता था) इनका काम कैंटन के व्यापार से राजस्व इकट्ठा करके उसे बीजिंग स्थित शाही सरकार के पास जमा कराना था।

पश्चिमी व्यापारियों को किसी भी कारण से सीधे शाही अधिकारियों से संपर्क करने की छूट नहीं थी, लेकिन वे अपनी तमाम शिकायतों, निवेदनों आदि को हाँग सौदागरों के जरिए संबंधित अधिकारी तक पहुँचा सकते थे। हाँग सौदागरों के अलावा अगर वे और किसी चीनी के साथ सीधे कोई आदान-प्रदान करते थे, तो वे लोग थे जो उन्हें आवश्यक सेवाएं प्रदान करते थे - जैसे उनके घरेलू नौकर, भाषाविद् (दुभाषिए और रक्षक), और सबसे महत्वपूर्ण "कम्प्रराडोर' (Compradore) लोग, जो चीनी ही होते थे और जिनका काम विदेशी कंपनियों के लिए व्यापार का स्थानीय पहलू संभालना था ।

19वीं शताब्दी की शुरुआत में, ब्रिटिश व्यापारियों ने इन प्रतिबंधों से चिढ़ना शुरू कर दिया था। 1834 में ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार को समाप्त करने और चीन में निजी व्यापारियों के आगमन के साथ शिकायतें और अधिक बढ़ गईं। उसी समय, ब्रिटिश "देश व्यापार" चाय और रेशम की ब्रिटिश खरीद के भुगतान के साधन के रूप में भारत से चीन में अफीम के अवैध आयात पर केंद्रित था। चीन द्वारा अफीम के व्यापार को रोकने का प्रयास , जिसने सामाजिक और आर्थिक व्यवधान पैदा किया था, का पहला परिणाम हुआब्रिटेन और चीन के बीच अफीम युद्ध (1839-42)। इस संघर्ष में ब्रिटेन की जीत ने चीनियों को कैंटन प्रणाली को खत्म करने और इसे पांच संधि बंदरगाहों के साथ बदलने के लिए मजबूर किया, जिसमें विदेशी चीनी कानूनी अधिकार क्षेत्र के बाहर रह सकते थे और काम कर सकते थे, जिसके साथ वे प्रसन्न होते थे