भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम के इतिहास में सन् 1919 ई. का जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड सबसे दुःखद, निन्दनीय, प्राणहर एवं रोंगटे खड़ा कर देनेवाला बर्बर अत्याचार था। यह हत्याकाण्ड भारतवासियों को ही क्या, समस्त सभ्य संसार के रोंगटे खड़ा कर देनेवाला काण्ड था। इस घटना को सुनकर सभी ईमानदार एवं विचारसम्पन्न अँगरेज भी स्तब्ध रह गये। रामगोपाल के शब्दों में "यह अकृतज्ञ शासकों की कहानी है। "
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान विद्रोहात्मक कार्रवाइयों के चलते 'भारत सुरक्षा अधिनियम पारित किया गया था। युद्ध समाप्ति के बाद यह अधिनियम अपने आप समाप्त हो जाता। परन्तु, सरकार को डर था कि रूसी क्रान्ति एवं भारतीय क्रान्तिकारी नेताओं से प्रभावित होकर कहीं भारतीय क्रांतिकारी भी सरकार के तख्ते को न उखाड़ फेंके। चूँकि युद्ध के दौरान भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए अँगरेजों ने तरह-तरह के वादे किये थे, अतः समाप्ति के बाद कांग्रेस ने उन वचनों को पूरा करने को कहा। कांग्रेस ने अपने 1918 ई. के दिल्ली अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर सरकार से यह माँग की कि "उन समस्त कानूनों, अध्यादेशों, अधिनियमों (Regulations) को समाप्त कर दिया जाय, जिनके चलते भारत का राजनीतिक समस्याओं पर स्वतन्त्रतापूर्वक वाद-विवाद करना कठिन है तथा नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें देश से निर्वासित कर दिया जाता है।" इतना ही नहीं, कांग्रेस द्वारा मॉण्टफोर्ड सुधारों का डटकर विरोध किया गया। इस परिस्थिति में अँगरेजों को राष्ट्रीय आन्दोलन की गति तीव्र होने की आशंका थी। सरकार को अफगानिस्तान की ओर से भारतीय सीमा पर गड़बड़ी होने एवं उसी ओर से रूस द्वारा भारत पर आक्रमण होने का भी भय था।
उपर्युक्त परिस्थितियों में राष्ट्रीय आन्दोलन को 'कुचलने एवं क्रान्तिकारियों का सामना करने के लिए नौकरशाही को ऐसे कानूनों की आवश्यकता थी, जो उसे असाधारण अधिकार प्रदान करे। अतः कांग्रेस की उचित माँग का उत्तर सरकार ने 'रॉलेट ऐक्ट' जैसे काले कानून के रूप में दिया, जिसका समस्त भारत में व्यापक रूप से विरोध हुआ।
'रॉलेट ऐक्ट' के प्रावधान बहुत ही कठोर और दमनात्मक थे। उसके अन्तर्गत सरकार किसी भी संदेहपूर्ण व्यक्ति को मुकदमा चलाये बिना ही नजरबन्द कर सकती थी। उस विधेयक की व्यवस्थाओं से ऐसा महसूस हुआ कि सरकार वैधानिक आन्दोलनों को भी कुचल देना चाहती है। उस विधेयक को 'काला - विधेयक' की संज्ञा देकर संपूर्ण देश में उसका व्यापक विरोध किया गया। उस विधेयक का विरोध व्यवस्थापिका के गैर-सरकारी भारतीय, निर्वाचित तथा नामजद सभी सदस्यों ने समान रूप से किया। परन्तु, सरकार अपनी बात पर अड़ी रही और जरा भी नहीं झुकी। जनता के तीव्र विरोध के बावजूद वह विधेयक पारित हो गया।
गाँधीजी 'रॉलेट ऐक्ट' की धाराओं को पढ़कर अत्यन्त दुःखी हुए और उन्होंने घोषणा की कि यदि 'रॉलेट ऐक्ट' को असली रूप दिया गया, तो वे सत्याग्रह छेड़ देंगे। परन्तु, सरकार ने गाँधीजी की धमकी की तनिक भी परवाह नहीं की। फलतः गाँधीजी ने उस कानून का विरोध करने के लिए 30 मार्च, 1919 ई. की तिथि निश्चित की। यद्यपि बाद में इस तिथि को बदलकर 6 अप्रील कर दिया गया, परन्तु पकी सूचना हर जगह न पहुँच सकी। फलतः दिल्ली में हड़ताल 30 मार्च को ही शुरू गयी।
स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में दिल्ली में एक विशाल जुलूस निकाला गया तथा पुलिस और हड़तालियों के बीच हुए संघर्ष में 8 व्यक्ति मारे गये। तत्पश्चात् निश्चित कार्यक्रम के अनुसार समस्त देश में प्रदर्शन हुआ, शोकदिवस मनाया गया तथा उपवास रखे गये। बम्बई, कलकत्ता तथा पंजाब आदि स्थानों में पुलिस और जनता के बीच डटकर संघर्ष हुए। पंजाब और दिल्ली की घटनाओं को सुनकर गाँधीजी पंजाब एवं दिल्ली की ओर रवाना हुए। परन्तु, उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार करके बम्बई भेज दिया गया। गाँधीजी की गिरफ्तारी की खबर सर्वत्र जंगल की आग की तरह फैल गयी। गिरफ्तारी के विरोध में पंजाब में दंगे हुए, परन्तु सरकार ने उसे निर्दयतापूर्वक दबा दिया। 8 अप्रील को विधानसभा में यह घोषणा की गयी कि जो लोग उस आन्दोलन में भाग ले रहे हैं, उन्हें भयंकर परिणाम भुगतने होंगे। 10 अप्रील को अमृतसर के जिलाधीश ने डॉ. सत्यपाल और डॉ. किचलू (पंजाब के प्रभावशाली कांग्रेसी नेताद्वय) को गिरफ्तार कर किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया।
डॉ. सत्यपाल और डॉ. किचलू की गिरफ्तारी ने जनता में सनसनी पैदा कर दी तथा जुलूस और मारपीट का दौर शुरू हो गया। अपने नेताओं की रिहाई की माँग को लेकर जब जनता का एक जुलूस मजिस्ट्रेट बंगले की ओर चला, तो फौजी सेना को बुलाकर उस पर गोलियाँ चलवायी गयीं, जिसमें दो व्यक्ति मरे और अनेक घायल हुए। क्रुद्ध भीड़ ने लौटते समय एक नेशनल बैंक में आग लगा दी तथा उसके मैनेजर को मार डाला। सरकार एवं सार्वजनिक इमारतों में भी आग लगायी गयी। इस दौर में 5 अँगरेजों को मार डाला गया तथा एक ईसाई पादरी महिला शोरऊड अघमरी अवस्था में पायी गयी।
10 अप्रील की उपर्युक्त घटना के बाद सरकार ने भी बदले की भावना से काम करने का निश्चय किया। 10 अप्रील को ही अमृतसर में फौजी शासन की घोषणा कर दी गयी। जेनरल डायर को अमतृसर का सैनिक प्रशासक नियुक्त किया गया। 12 अप्रील को सभा-सम्मेलनों पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा की गयी। स्मरण रहे कि अमतृसर की जनता ने इस घोषणा के पूर्व ही 10 अप्रील को हुई घटना के विरोध में 13 अप्रील को जालियाँवाला बाग में विशाल सभा करने का निश्चय किया था। सरकार की उपर्युक्त घोषणा की खबर लोगों तक अच्छी तरह नहीं पहुँच सकी थी।
फलतः, हजारों लोग सभा में एकत्र हो गये। जब सभा में लगभग 20 हजार व्यक्ति एकत्रित हो गये, तो जेनरल डायर ने 200 भारतीय तथा 50 अँगरेज सैनिकों को लाकर बिना कोई पूर्व सूचना दिये निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं। गोलियाँ 10 मिनट तक चलती रहीं तथा 1650 गोलियाँ चलायी गयीं जिसमें, सरकारी प्रतिवेदन के अनुसार 400 लोग मरे तथा लगभग 1137 व्यक्ति घायल हुए। इंटर कमीशन के समक्ष बयान देते हुए गिरधारी लाल ने बताया था “मैंने सैकड़ों व्यक्ति को वहीं मरते देखा। सबसे खराब बात यह थी कि गोली उस दरवाजे की तरफ से चलायी जा रही थी जिससे होकर लोग भाग रहे थे। बहुत से लोग भागती हुई भीड़ के पैरों तले कुचलते गये। खून की धारा बह रही थी मेरा अनुमान है कि उस समय वहाँ एक हजार से अधिक आहत और मृत व्यक्ति थे। इस प्रकार यह हत्याकाण्ड सम्पूर्ण संसार के रोंगटे खड़ा कर देने वाला काण्ड था।
अमृतसर की घटना से भारतीयों की आत्मा काँप उठी। इस काण्ड का हर क्षेत्र में विरोध किया गया तथा चारों ओर इसकी निन्दा की गयी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसके विरोध में 'सर' की अपनी उपाधि सरकार को लौटा दी। पंजाब हत्याकाण्ड की जब चारों ओर निन्दा की गयी, तो सरकार ने हंटर की अध्यक्षता में एक जाँच समिति नियुक्त की। समिति ने अपने प्रतिवेदन में सरकार के अत्याचारों पर पर्दा डालने की कोशिश की। उसने सरकार के कार्यों को उचित ठहराया, परन्तु सरकार द्वारा अपनाये गये साधनों को अनुचित बतलाया। कांग्रेस ने भी महात्मा गाँधी, सी. आर. दास तथा मोतीलाल नेहरू को मिलाकर एक जाँच समिति की नियुक्त की।
गाँधीजी के शब्दों में- "जैसे-जैसे जाँच बढ़ती गयी मुझे सरकार की निरंकुशता तथा उसके तानाशाही रवैयों के ऐसे-ऐसे अत्याचारों का पता चलता गया, जिनके लिए मैं बिल्कुल तैयार न था और मुझे इससे बहुत पीड़ा हुई।" हंटर समिति की जाँच के फलस्वरूप यद्यपि डायर को नौकरी से अलग कर दिया गया, लेकिन उसके द्वारा की गयी सेवाओं के लिए उसे 200 पौंड और एक सम्मान की तलवार भेंट की गयी। उसे ब्रिटिश साम्राज्य का 'शेर' कहा गया।
जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की जाँच के लिए गठित हंटर-समिति का प्रतिवेदन तथा प्रतिवेदन के आधार पर सरकार द्वारा की गयी कार्रवाइयों से यह स्पष्ट हो गया कि सरकार को भारतीयों के प्रति थोड़ी भी सहानुभति नहीं है। इस घटना के चलते गाँधीजी के मन से अँगरेजों की न्यायप्रियता के प्रति बचा खुचा विश्वास समाप्त हो गया। इस घटना ने, असहयोग आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इसके बाद राष्ट्रीय आन्दोलन का वैधानिक युग समाप्त हो गया तथा राष्ट्रीय आन्दोलन ने एक जन-आन्दोलन का रूप धारण किया।
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