आधुनिक भारत के इतिहास में महात्मा गाँधी को बहुत उच्च एवं महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वे हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के सबसे बड़े सेनानी, महान् नेता तथा भारत माता के सच्चे सपूत थे। उन्होंने अपनी मेधाशक्ति, दृढ़संकल्प, कुशाग्रबुद्धि, धैर्य एवं असीम साहस से अँगरेजों के विरुद्ध भारत के संघर्ष की नाव को स्वतंत्रता की मंजिल तक पहुँचाया। उनके त्याग और बलिदान के कारण ही उन्हें राष्ट्रपिता कहा जाता है। हमारे देश के लाखों लोगों का त्याग शहीदों का लहू बेकार जाता यदि राष्ट्रीय आन्दोलन को गाँधीजी का मार्गदर्शन नहीं मिलता। गाँधीजी के मार्गदर्शन के कारण ही हमारा देश स्वतंत्र हो सका।
देश के इस महान् सपूत का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबन्दर में एक सम्पन्न वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता करमचन्द गाँधी राजकोट रियासत के दीवान थे। 1887 ई. में राजकोट से ही मैट्रिक की परीक्षा पास करने के उपरान्त ये बैरिस्ट्री पढ़ने के लिए इंगलैण्ड चले गये। बैरिस्ट्री की परीक्षा पास कर ये स्वदेश लौटे और अपनी वकालत प्रारम्भ की। 1893 ई. में एक मुकदमे के सिलसिले में इन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। अफ्रीका में उनका प्रवास उनके जीवन की एक अविस्मरणीय घटना बन कर रह गयी क्योंकि इस काल में वे घटनायें घटीं जिसने उन्हें संसार के इतिहास में अमर बना दिया। उस समय दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार रंगभेद की नीति का पालन कर रही थी।
सरकार की इस नीति के कारण वहाँ के भारतीयों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। आये दिन अँगरेजों के हाथों उन्हें अपमानित होना पड़ता था। महात्मा गाँधी ने अँगरेजों की इस नीति का घोर विरोध किया और अपने विरोध को एक आन्दोलन का रूप देने के लिए "नेटाल इण्डियन कॉंग्रेस" का संगठन किया। लोगों को संगठित करने तथा प्रचारकार्य के लिए उन्होंने कुछ अखबार का भी प्रकाशन किया। उन्होंने रंगभेद की नीति के विरुद्ध सत्याग्रह एवं अहिंसात्मक आन्दोलन चलाया। प्रथम बार किसी व्यक्ति ने निरंकुश राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध सत्याग्रह और अहिंसा जैसे अस्त्रों का प्रयोग किया था और इसमें सफलता मिली थी। राजनीतिक संघर्ष में अहिंसा और सत्याग्रह का अस्त्र गाँधीजी की अनोखी देन थी। गाँधीजी के आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा और भारतीयों को कई अमानुषिक कानूनों से मुक्ति मिली। गाँधीजी की इस विजय से उनकी ख्याति सा विश्व में फैल गयी। इसका प्रभाव भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन पर भी पड़ा। उनके आन्दोलन ने यहाँ क्रांतिकारियों को बहुत प्रेरित किया।
इस आन्दोलन के दौरान ही गाँधीजी का भारत के अन्य राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं से परिचय हुआ। गाँधीजी गोपाल कृष्ण गोखले से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु स्वीकार किया। 1912 ई. में गोखले दक्षिण अफ्रीका भी गये और गाँधीजी से उनकी आत्मीयता और बढ़ गयी।
अफ्रीका में अपनी विजय पताका फहराने के पश्चात् 1915 ई. में गाँधीजी भारत लौटे। उनके महान् कार्यों के बदले कृतज्ञ देशवासियों ने उनका शानदार स्वागत किया। यहाँ आने के बाद एक वर्ष तक मौन रहकर वे भारत की स्थिति का अध्ययन करते रहे।
गाँधीजी ने भारत में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बिहार के चम्पारण जिले से की। वहाँ के एक किसान ने इन्हें निलहे अँगरेज जमीन्दारों के अत्याचारों के बारे में बताया और किसानों को इन अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की याचना की। गाँधीजी ने अपना अचूक अस्त्र अहिंसात्मक सत्याग्रह का व्यवहार किया और किसानों को अँगरेज जमीन्दारों के शोषण से मुक्त कराया। 1918 ई. में उन्होंने गुजरात के खेड़ा नामक स्थान में भी किसानों के समर्थन में अपना आन्दोलन चलाया और सरकार को समझौता करने पर विवश किया।
सन् 1919 ई. से गाँधीजी भारत की राजनीतियों में सक्रिय रूप से कूद पड़े। इसलिए इतिहासकारों ने 1919 से ही 'गाँधी युग" का प्रारम्भ माना है। गाँधीजी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नया दर्शन, एक नयी विचारधारा प्रदान की और इसके प्रमुख नायक बन गये। 1919 ई. में पास हुए दमनकारी काला कानून रॉलेट ऐक्ट ने गाँधीजी को अँगरेज सरकार के विरुद्ध अहिंसात्मक आन्दोलन एक बड़े पैमाने पर प्रारम्भ करने का अवसर प्रदान किया। गाँधीजी गिरफ्तार कर लिये गये। इस आन्दोलन की प्रतिक्रिया पंजाब में भी हुई। लेकिन वहाँ अप्रील 1919 ई. में अमृतसर के जालियाँवाला बाग में एक निहत्थी एवं शान्तिपूर्ण सभा पर अँगरेजों ने अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलायीं और सैकड़ों भारतीयों को मार डाला और हजारों को घायल कर दिया। अँगरेजों की इस पाशविकता से गाँधीजी बहुत दुःखी हुए और उन्होंने अपने आन्दोलन को और तीव्र करने का निश्चय किया।
प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात् अँगरेजों द्वारा तुर्की के साथ अपमानजनक व्यवहार के विरुद्ध भारत के मुसलमानों ने खलीफा को बचाने के लिए 1919 ई. में खिलाफत आन्दोलन प्रारम्भ किया। गाँधीजी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के उद्देश्य से खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया। यद्यपि खिलाफत आन्दोलन अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में निष्फल रहा, तथापि इससे देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित हुई और गाँधीजी को असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ करने की प्रेरणा मिली।
1 अगस्त 1920 ई. को गाँधीजी ने ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध उनके शासन को पंगु बनाने के उद्देश्य से असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया। इस आन्दोलन के आह्वान में उन्होंने सभी स्तर पर सरकार से असहयोग करने की अपील भारतीयों से की। उनके आह्वान पर हजारों विद्यार्थियों ने शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया बुकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया और बहुत से लोगों ने सरकारी नौकरियों पर लात मार दी। गाँधीजी ने स्वयं सरकार को अपनी उपाधिं लौटा दी। आन्दोलन पूर्ण अहिंसात्मक था तथा इसका प्रभाव देश के एक बड़े भाग में था। किन्तु उत्तरप्रदेश के चौरी-चौरा कस्बे में आन्दोलनकारियों की एक क्रोधित भीड़ ने एक थाने में आग लगा दी और 22 सिपाहियों और एक दारोगा को जला कर मार डाला। आन्दोलन में हिंसा के प्रवेश से गाँधीजी को अत्यन्त दुःख हुआ और उन्होंने आन्दोलन को स्थगित कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर राजद्रोह के अपराध में उन पर मुकदमा चलाया और छः वर्ष कैद की सजा दी। लेकिन दो वर्ष बाद ही अस्वस्थता के कारण गाँधीजी जेल से छोड़ दिये गये।
जेल से छूटने के पश्चात् गाँधीजी ने अपना समय रचनात्मक कार्यक्रमों में लगाया। अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में हरिजनोद्धार, खादी, साम्प्रदायिक सद्भावना एवं एकता, ग्रामोद्योग, मद्य-निषेध, राष्ट्रभाषा का प्रचार, आर्थिक समानता, विद्यार्थियों एवं मजदूरों का संगठन, ग्राम एवं नारी उत्थान आदि विषयों पर जोर दिया। इन कार्यक्रमों के द्वारा गाँधीजी देश में जागरण लाना चाहते थे तथा देश की गरीबी एवं पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे।
1927 ई. में देश की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन करने के उद्देश्य से भारत में साइमन कमीशन का आगमन हुआ। इस कमीशन के सभी सदस्य अँगरेज थे। इस कमीशन से न्याय की आशा करना बेकार था। अतः गाँधीजी के नेतृत्व में इस कमीशन का देशव्यापी बहिष्कार किया गया। यह कमीशन जहाँ कहीं भी गया इसका स्वागत हड़ताल, जुलूस एवं "साइमन वापस जाओ" के नारे से किया गया। इस बहिष्कार के आन्दोलन ने राष्ट्रीय जागरण के कार्य को आगे बढ़ाया।
26 जनवरी 1930 ई. को सारे देश में स्वाधीनता दिवस मनाया गया। इसी वर्ष गाँधीजी ने ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ किया। 6 अप्रैल 1930 को दंडी पहुँचकर उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ नमक-कानून को भंग किया। इसके बाद देश में जगह-जगह नमक बनाकर अँगरेजों के इस काले कानूनों को तोड़ा। जगह-जगह विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ, दुकानों पर धरना दिया तथा विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेजों का बहिष्कार किया। 60,000 लोगों के साथ गाँधीजी को जेल में ठूंस दिया गया।
अक्टूबर महीने में लंदन में गोलमेज सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए सरकार ने गाँधीजी को मुक्त कर दिया। परन्तु मुस्लिम लीग तथा अन्य साम्प्रदायिक तत्त्वों के कारण यह सम्मेलन असफल रहा। लंदन से गाँधीजी खाली हाथ लौटे। भारत लौटकर गाँधीजी ने पुनः सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने का निश्चय किया। गाँधीजी पुनः गिरफ्तार कर लिये गये और काँग्रेस एक अवैध संस्था घोषित कर दी गयी। 1932 ई. में ब्रिटिश शासन के साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध जेल में ही उन्होंने आमरण अनशन प्रारम्भ किया। अन्त में हरिजन नेता डॉ. अम्बेदकर की मध्यस्थता में पूना पैक्ट हुआ और हरिजनों के प्रश्न पर गाँधीजी एक सम्मानजनक समझौता करने में सफल हुए। 1939 ई. में जब द्वितीय विश्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ तो ब्रिटिश सरकार ने कॉंग्रेस से पूछे बगैर भारत को युद्ध में शामिल होने की घोषणा की। गाँधीजी ने इसका विरोध किया और युद्ध के उद्देश्यों की घोषणा की माँग की। इधर भारत पर जापानी आक्रमण का खतरा बढ़ता ही जा रहा था। अतः गाँधीजी ने अँगरेजों के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ करने के पूर्व सरकार से समझौता करने का प्रयास किया। परन्तु सरकार गाँधीजी की बातों को मानने के लिए तैयार नहीं थी । अतः 1940 ई. में उन्होंने "व्यक्तिगत सत्याग्रह" के द्वारा सरकार को झुकाने का प्रयास किया परन्तु इसका कोई उल्लेखनीय परिणाम नहीं निकला।
अतः 7 अगस्त 1942 ई. को गाँधीजी ने 'भारत छोड़ो' आन्दोलन प्रारम्भ किया। 8 अगस्त को गाँधीजी तथा देश के सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिये गये। नेताविहीन जनता भटक गयी और भारत छोड़ो आन्दोलन हिंसात्मक हो गया तथा देश के कई भागों में आगजनी, तोड़-फोड़ तथा हिंसा की घटनायें हुई। पूना के आगा खाँ पैलेस में बन्दी गाँधीजी को अपने प्रिय सचिव एवं पत्नी कस्तूरबा की मृत्यु का दुःख झेलना पड़ा। 1944 ई. में अस्वस्थता के कारण गाँधीजी जेल से मुक्त कर दिये गये।
सितम्बर 1944 ई. में गाँधीजी ने बम्बई में जिन्ना से मुलाकात की और वार्ता के द्वारा हिन्दू-मुस्लिम समस्या का हल ढूँढ़ने की कोशिश की। लेकिन जिन्ना की हठधर्मी के कारण इस समस्या का कोई हल नहीं निकला और लीग अपनी पाकिस्तान की माँग पर अड़ी रही। जुलाई 1946 ई. में संविधान सभा के निर्वाचन में कॉंग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। अपनी माँग को मनवाने के लिए 16 अगस्त को मुस्लिम लीग ने "प्रत्यक्ष कार्यवाही" (Direct Action) प्रारम्भ की और हिन्दुओं पर भयंकर आक्रमण आरम्भ हुआ। देश में दंगे बड़े पैमाने पर भड़क उठे। गाँधीजी ने दंगा पीड़ित क्षेत्रों का दौरा किया और दंगाइयों को शान्त करने की कोशिश की। वे नोवाखाली भी गये और घूम-घूम कर अपने शान्ति-संदेशों का प्रचार किया। उन्होंने बिहार के दंगा पीड़ित क्षेत्रों का भी दौरा किया। 15 अगस्त 1947 ई. को जिस दिन देश आजाद हुआ उस दिन भी गाँधीजी कलकत्ता के दंगा पीड़ित क्षेत्रों का दौरा करने में लगे हुए थे।
आजादी के बाद से जनवरी 1948 ई. तक अर्थात् अपने मृत्यु के दिनों तक गाँधीजी दंगा से पीड़ित लोगों के आँसू पोंछने में लगे रहे। अन्त में 30 जनवरी 1948 ई. को एक धर्मान्ध हिन्दू ने गाँधीजी को गोली मारकर उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार साम्प्रादायिक सौहार्द स्थापित करने के प्रयत्न में ही गाँधीजी की जान गयी। उनकी हत्या से भारत ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण विश्व दुःख के महासागर में डूब गया। क्योंकि गाँधीजी केवल भारत के ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण मानवजाति के नेता थे, मित्र थे, पथप्रदर्शक थे। उनकी मृत्यु ने आधुनिक काल के मसीहा को हमसे छीन लिया। महात्मा गाँधी भारतीय राष्ट्रीयता के प्रतीक, सत्य, अहिंसा के सच्चे उपासक थे। उन्होंने भारतीय जनता को अभय का पाठ पढ़ाया। वे गरीबों के मसीहा थे तथा साम्प्रदायिक एकता के सच्चे समर्थक थे। हरिजनोद्धार, नारी उत्थान तथा ग्राम-उत्थान के लिए उनके द्वारा किया गया कार्य स्तुत्य है। वे आधुनिक भारत के निर्मात्ता थे। इसीलिए उन्हें राष्ट्रपिता की सम्मानजनक उपाधि दी गयी। भारत की जनता अपने प्यारे नेता को बापू कहते हर्ष से फूले नहीं सनाती थी।
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