भारत में उदारवादी आन्दोलन पर एक निबंध लिखें।

उदारवादी काँग्रेसियों का आन्दोलन

सन् 1885 ई. के दिसम्बर माह में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का जन्म एक ऐसी संस्था के रूप में हुआ था, जिसे ब्रिटिश सरकार का आशीर्वाद और वरदान प्राप्त था। अँगरेज शासकों की कल्पना में कांग्रेस की स्थापना इंगलैण्ड में विरोधी दल द्वारा किये जानेवाले कार्यों के संपादन के लिए हुई थी । वस्तुतः जिन दिनों कॉंग्रेस पालने में थी, उन दिनों कॉंग्रेस के हुए अधिवेशनों में वक्ताओं द्वारा सरकार के गुणों का गान किया जाता था, अँगरेजों की न्यायप्रियता में विश्वास किया जाता था तथा सरकार के प्रति राजभक्ति प्रदर्शित की जाती थी। यही कारण था कि कॉंग्रेस को बचपन में अँगरेजों का पूरा-पूरा सहयोग प्राप्त रहा। सरकार कॉंग्रेस की स्थापना को 'ब्रिटिश सरकार की विजय और गौरव की वस्तु' समझती थी।

अँगरेजों का सिरदर्द

परन्तु यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं चली। सन् 1888 ई. से काँग्रेस भारतीय राष्ट्रवाद के विचारों और आकांक्षाओं को एक स्पष्ट और संगठनात्मक रूप देने लगी। फलतः भारत में राष्ट्रीयता की भावना बहुत तेजी से प्रगति करने लगी। इसी क्रम में काँग्रेस द्वारा जब भारत में शीघ्र ही प्रजातंत्रात्मक शासन और संसदीय प्रणाली लागू करने की माँग की गयी, तो उस माँग से अँगरेज घबरा उठे। उन्हें भय होने लगा कि जिस प्रकार पिछले तीन-चार वर्षों में काँग्रेस की प्रगति हुई है, यदि वही क्रम जारी रहा तो शीघ्र ही ब्रिटिश साम्राज्य को बहुत बुरे दिन देखने पड़ेंगे। फल यह हुआ कि जिस काँग्रेस को प्रारम्भिक तीन वर्षों में अँगरेजों का वरदान प्राप्त हुआ, उसे ही अब उनका कोपभाजन बनना पड़ा। अँगरेजों की दृष्टि में अब काँग्रेस एक 'भयानक शिशु' दिखाई पड़ने लगी तथा उनके द्वारा काँग्रेस की खुलेआम आलोचना होने लगी। लॉर्ड डफरिन ने कहा- "अब काँग्रेस का झुकाव राजद्रोह की ओर हो रहा है। यह हानिरहित साधन नहीं रहा । काँग्रेस एक ऐसा नगण्य अल्पमत है, जिसे एक शानदार और विभिन्न रूपवाले साम्राज्य के शासन की बागडोर हरगिज नहीं दी जा सकती।” अँगरेजी समाचार-पत्रों में कहा गया- “काँग्रेस छद्मवेश में एक ऐसी राजद्रोही संस्था है, जिसे न तो जनता का प्रतिनिधित्व प्राप्त है और न जिसका कोई मूल्य ही है"।

काँग्रेस के खिलाफ कार्रवाई

सन् 1889 ई. में काँग्रेस के इलाहाबाद सम्मेलन में अँगरेजों द्वारा काफी बाधाएँ पहुँचायी गयीं तथा उसमें भाग लेनेवाले प्रतिनिधियों पर काफी निगरानी रखी गयी। मुसलमानों को यह कहकर बहकाया गया कि काँग्रेस हिन्दुओं की संस्था है। सन् 1890 ई. तक सरकार स्पष्ट रूप से काँग्रेस-विरोधी बन गयी तथा उसी वर्ष सभी सरकारी अफसरों को एक आदेश द्वारा काँग्रेस से सम्पर्क रखने की मनाही कर दी गयी। सन् 1897 ई. में राजद्रोहात्मक भाषणों और कार्यवाहियों पर अंकुश लगाने हेतु भी कई कानून बनाये गये। प्रेस पर भी बहुत से प्रतिबन्ध लगा दिये गये। अँगरेजों के रुख का पता कर्जन द्वारा भारत सचिव को लिखे उस पत्र से मिलता है, जिसमें कहा गया था कि- "काँग्रेस का भवन अब शीघ्र ही ढहने को है और जब तक मैं भारत में हूँ, मेरी यही इच्छा है कि इसे शान्तिपूर्वक कब्र तक पहुँचा हूँ।"

इस प्रकार हम पाते हैं कि काँग्रेस को अपनी स्थापना : के कुछ ही दिनों के बाद सरकारी संरक्षण से हाथ धोना पड़ा। परन्तु काँग्रेस को इससे हानि के बदले लाभ ही हुआ। ज्यों-ज्यों सरकार का दमन चक्र बढ़ता गया, त्यों-त्यों कॉंग्रेस की लोकप्रियता बढ़ती गयी। काँग्रेस को अब सरकार की आलोचना करने में झिझक नहीं रही। जनता की माँगों का जोरदार समर्थन काँग्रेस द्वारा होने लगा तथा अब काँग्रेस द्वारा सामाजिक और संवैधानिक सुधारों के अतिरिक्त आर्थिक उन्नति के क्षेत्र में भी सुधार हेतु प्रस्ताव पारित किये जाने लगे।

उदारवादियों की माँगों ने जोर

सन् 1885 ई. से 1905 ई. तक काँग्रेस के माध्यम से उदारवादियों ने समय-समय पर प्रस्तावों द्वारा निम्नलिखित संवैधानिक, आर्थिक और सामाजिक सुधारों की माँग की-

  • सन् 1861 ई. के अधिनियम द्वारा स्थापित वायसराय और गवर्नरों की विधान परिषदों का विस्तार एवं उसमें निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि।

  • भारत में आई. सी. एस. परीक्षा की व्यवस्था।

  • सेना के व्यय में कटौती।

  • भारत सचिव के भारत-परिषद् की समाप्ति।

  • न्यायपालिका और कार्यपालिका का पृथक्करण।

  • समाचारपत्रों पर से प्रतिबन्ध की समाप्ति।

  • उच्च नागरिक एवं सैनिक पदों पर भारतीयों की नियुक्ति।

  • भारतीयों को सैनिक-शिक्षा

  • भूमि कर की दर में स्थायित्व एवं निश्चितता।

  • भारतीय उद्योग-धंधों का संरक्षण।

  • जमींदारों का शोषण समाप्त करने के लिए किसानों को सस्ते दर पर ऋण 12. भारत में शैल्पिक एवं औद्योगिक संस्थाओं की स्थापना।

  • स्थानीय संस्थाओं को अधिकाधिक अधिकार।

  • भारत में गरीबी के कारणों का पता लगाने एवं उन्हें दूर करने की माँग।

  • नमक पर कर में कमी।

  • विदेशों में रहने वाले भारतीयों की रक्षा।

  • भारत में आनेवाले विदेशी मालों पर कर की व्यवस्था तथा बाहर भेजे जाने वाले अनाजों पर प्रतिबन्ध।

  • खेती हेतु सिंचाई की व्यवस्था, तथा नशाबंदी ।

उदारवादियों की विशेषताएँ

इस प्रकार हम पाते हैं कि काँग्रेस ने अपने जन्मकाल के प्रारम्भिक 20 वर्षों में विभिन्न संवैधानिक, आर्थिक एवं सामाजिक सुधारों की माँग की। परन्तु इस अवधि में कॉंग्रेस पर उदारवाद का जादू चढ़ा रहा । काँग्रेस पर उदारवादियों का आधिपत्य था तथा उनकी कार्य-पद्धति 'भिक्षां देहि' की थी। उदारवादियों की निम्नलिखित विशेषताएँ थीं

  • उदारवादी, ब्रिटिश शासन के समर्थक और राजभक्त थे,

  • वे क्रमिक सुधारों में विश्वास करते थे,

  • वे भारत के हितार्थ इंगलैण्ड से स्थायी सम्बन्ध कायम करने के पक्षपाती थें,

  • उन्हें अँगरेजों की न्यायप्रियता में विश्वास था,

  • वे विद्रोह और बगावत के विरोधी थे तथा उन्हें वैधानिक तरीकों में विश्वास था,

  • राजनीतिक स्वशासन की प्राप्ति उनकी माँग थी।

अँगरेजों द्वारा कॉंग्रेस के प्रति विपरीत रुख अपनाये जाने के बावजूद काँग्रेस के अग्रण्य नेता ब्रिटिश शासक के प्रशंसक एवं राजभक्त थे, क्रमिक सुधारों एवं अँगरेजों की न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे एवं विद्रोह तथा बगावत के विरोधी थे। इसी कारण उन्हें उदारवादी कहा गया तथा उनके द्वारा चलाये गये आन्दोलन को उदारवादी आन्दोलन कहा गया। सन् 1885 ई. से 1905 ई. तक कॉंग्रेस पर उदारवादियों का आधिपत्य रहा, अतः इस युग को भारतीय राजनीति में उदारवाद का युग कहा जाता है।

उदारवादी आन्दोलन की अवनति

उपर्युक्त अवधि में भारत के राजनीतिक जीवन में पूर्णतया शान्ति रही। सरकार की प्रतिक्रियावादी एवं दमनपूर्ण नीर्ति, सन् 1892 ई. के अधिनियम में भारतीय माँगों की उपेक्षा आदि कारणों से बहुत से राष्ट्रीय नेताओं ने ऐसे विचारों को व्यक्त करना प्रारम्भ कर दिया जो क्रान्तिकारी भावनाओं से परिपूर्ण थे। तिलक का यह नारों कि "स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" तथा विपिन चन्द्र पाल का यह कथन कि- "स्वराज्य, जनता के प्रयत्न से प्राप्त करना चाहिए, सरकार के उपहार या पुरस्कार से नहीं" इन्हीं भावनाओं के द्योतक थे। सन् 1888 ई. के बाद ज्यों-ज्यों सरकार का काँग्रेस के प्रति रुख खराब होता गया तथा सरकार साम्राज्यवादी और प्रतिक्रियावादी नीति का आश्रय लेती गयी, त्यों-त्यों उदारवादियों की 'भिक्षां देहि' की नीति में लोगों की आस्था घटने लगी। 1906 ई. में भारतीय राष्ट्रीयता ने निष्क्रियता के केंचुल का परित्याग कर सक्रिय रूप धारण किया। उदारवादियों के प्रति लोगों की आस्था धीरे-धीरे कम होती गयी। इसके कारण निम्नलिखित थे-

  • सरकार के सुधारों से पर्याप्त असंतोष,

  • सरकार की प्रतिक्रियावादी नीति,

  • अकाल, महामारी तथा उसको रोकने के लिए सरकार द्वारा किये गये अपर्याप्त प्रयास

  • सरकार की आर्थिक नीति तथा देश की दयनीय स्थिति,

  • सरकारी नौकरियों में सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति,

  • लॉर्ड कर्जन की दमनकारी नीति, जिसमें भारतीयों को हर तरह से सताने तथाराष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया गया था।

जुझारू मनोवृत्ति का विकास

सन् 1905 ई. के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन ने सक्रिय राष्ट्रीयता का रूप धारण किया जिसकी आधारशिला थी- भारतीयों द्वारा अपने को संगठित कर तथा सशक्त बनाकर अँगरेज शासकों से अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए युद्ध करने की मनोवृत्ति। इस नयी विचारधारा की कार्यविधि थी-सीधी कार्रवाई

काँग्रेस में विभाजन

जुझारू मनोवृत्ति के विकास के साथ 1906 ई. में कलकत्ता में होनेवाले काँग्रेस अधिवेशन में उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच संघर्ष की आशंका उत्पन्न हुई हालाँकि दादाभाई नौरोजी के चातुर्य्य से उस समय यह संकट टल गया, किन्तु सन् 1907 ई. के सूरत अधिवेशन में दोनों दलों में संघर्ष मुखर हो गया तथा कॉंग्रेस गरम दल और नरम दल-दो दलों में विभक्त हो गयी। इस प्रकार जो उदारवादी सम्पूर्ण काँग्रेस का ही नेतृत्व करते थे वे अब केवल एक गुट का ही नेतृत्व करने लगे।

सक्रिय राष्ट्रीयता में विश्वास करने वाले लोगों में कुछ लोग आक्रामकता में विश्वास रखते थे। फलतः सक्रिय राष्ट्रीयता की दो शाखाएँ हो गयीं— उग्रवादी और अग्रघष राष्ट्रवादी (Aggressive Nationalists) । जो लोग सक्रियता में विश्वास रखते थे, उन्हें उग्रवादी कहा गया तथा जो लोग आक्रामकता में विश्वास रखते थे उन्हें अग्रघर्षी राष्ट्रवादी कहा गया। बाद में सन् 1916 ई. में एनी बेसेण्ट की मध्यस्थता एवं बीच-बचाव के कारण नरम दल और गरम दल में पुनः मेल हो गया। परन्तु, उस मेल से उदारवादियों को कोई खास राहत न मिली। मॉण्टफोर्ड योजना की स्वीकृति के प्रश्न को लेकर पुनः दोनों दलों में मतभेद हो गया तथा उदारवादियों ने कॉंग्रेस से अलग होकर एक नया दल बनाया। सन् 1919 ई. के बाद जब गाँधीजी असहयोगी गाँधी के रूप में भारतीय रंगमंच पर आये, तो उदारवादियों ने उनका विरोध किया। परन्तु उस समय भी उदारवादियों की हार हो गयी। तत्पश्चात् गाँधीजी के सबल नेतृत्व के कारण धीरे-धीरे गरम और नरम दल का झगड़ा ही समाप्त हो गया