
19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण के महान प्रवर्तक एवं संदेशवाहक राजा राममोहन राय थे। उन्हें सुधार आन्दोलन का अग्रदूत और आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। 19वीं शताब्दी के नवजागरण तथा सुधार अन्दोलन में उनकी भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट है।
उनका जन्म 1772 ई. में बंगाल में हुगली जिले के राधानगर गाँव के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। नौ वर्ष की उम्र में उन्हें अरबी-फारसी की पढ़ाई के लिए पटन भेजा गया। पटना में तीन वर्ष के अध्ययन के बाद वे बनारस गये जहाँ उन्होंने चार वर्ष तक संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की।
राजा राम लोहन राय किशोरावस्था से ही क्रांतिकारी विचारों के थे। उन्होंने 15 वर्ष की उम्र में ही मूर्तिपूजा का विरोध किया और इस विषय पर एक छोटी पुस्तक लिखकर मूर्ति पूजा पर कारारी चोट की। इस प्रश्न को लेकर उन्हें अपने पिता से मतभेद हो गया और वे घर छोड़कर कई वर्षों तक इधर-उधर भटकते रहे। इस यात्रा के दौरान वे कई सन्यासियों और विद्वानों के सम्पर्क में आये। इसी समय उन्होंने अँग्रेजी, फ्रेंच, हीब्रू तथा ग्रीक भाषा का अध्ययन किया तथा उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई धर्म का भी गहरा अध्ययन किया।
1800 ई. के आसपास उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी की नौकरी स्वीकार की और 1814 तक विभिन्न पदों पर नौकरी की। 1814 में अवकाश ग्रहण करने के बाद वे स्थायी तौर पर कलकत्ता में रहने लगे और इसके बाद उन्होंने अपनी अर्जित सम्पत्ति और जीवन को जनता की सेवा में समर्पित कर दिया।
राजा राम मोहन राय की धार्मिक विचारधारा वेदों एवं उपनिषदों से प्रभावित थी तथा वे ऐकेश्वरवाद के प्रबल समर्थक थे। अपने धार्मिक विचारों के प्रचार के लिए उन्होंने 1814 में 'आत्मीय समाज' और 1828 ई. में 'ब्रह्म समाज' की स्थापना की। उनके अथक प्रयत्नों से 1829 में सती प्रथा का अन्त हुआ। 1831 ई. में वे मुगल सम्राट के प्रतिनिधि एवं समर्थक के रूप में इंगलैंड गये। वहीं 27 सितम्बर, 1833 को उनका देहान्त हुआ। मुगल सम्राट ने उन्हें राजा की पदवी से विभूषित किया।
धर्म-सुधार एवं सामाजिक सुधार में राजा राम मोहन राय का योगदान राजा राममोहन राय बहुमुखी प्रतिभा तथा गहरी सूझबूझ के व्यक्ति थे। उनकी व्यापक दृष्टि ने भारतीय जीवन के सभी क्षेत्रों में सुधार लाने की कोशिश की, पर वे एक धर्म-सुधारक एवं समाज-सुधारक के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुए। आधुनिक भारत के निर्माण में उनके योगदान का मूल्यांकन निम्नलिखित दृष्टियों से किया जा सकता है-
धार्मिक चिंतन में राजा राममोहन राय की गहरी रूचि एवं आस्था थी। उन्होंने संसार के प्रमुख धर्मों का गहराई से अध्ययन किया था तथा उनकी धर्मों की मलिक एकता में गहरा विश्वास था। वे ऐकेश्वरवाद के समर्थक एवं प्रचारक थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1828 ई. में बह्म समाज की स्थापना की। उन्होंने ब्रह्म समाज में जो पूजा-पद्धति शुरू की उसमें निराकार ईश्वर की पूजा की जाती थी और उसमें किसी दूसरे धर्म की आलोचना करने की मनाही थी।
राजा राममोहन राय वेदान्त के आधार पर ऐकेश्वरवाद का प्रचार करना चाहते थे। उनका यह विश्वास था कि सभी धर्मों में जो सत्य एवं पवित्र है उसे ग्रहण किया जाय तथा जो बनावटी एवं पाखंड है, उसका त्याग किया जाय। वे ईश्वर की पूजा किसी मूर्ति अथवा चित्र के माध्यम से करने के विरोधी थे !
हिन्दू-समाज के बुराइयों को देखकर वे हृदय से दुःखी थे तथा वे चाहते थे कि इन बुराइयों को दूर कर हिन्दू-समाज को आधुनिक बनाया जाय। खासकर सती प्रथा जैसी बुराई की क्रूरता से उनका संवेदनशील हृदय काँप उठता था और वे इस प्रचा को समाप्त कर देना चाहते थे। इस क्रूर प्रथा के विरुद्ध उन्होंने 1814 से 1829 ई. तक लगातार आन्दोलन चलाया। इस प्रयास में उन्हें कट्टरपंथी हिन्दुओं के घोर विरोध का सामना करना पड़ा, पर वे निर्भीकतापूर्वक इस आन्दोलन को चलाते रहे। उनके लगातार प्रयत्नों का फल था कि 1829 ई. में लार्ड विलियम बेंटिक ने सती-प्रथा को गैरकानूनी करार दिया। सती-प्रथा का अन्त करने से राममोहन राय आधुनिक भारत के सर्वप्रथम एवं मूर्द्धन्य सुधारक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
राम मोहन राय ने भारत में आधुनिक शिक्षा-प्रचार में गहरी रूचि ली। उनके विचार में पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के बिना आधुनिक भारत का निर्माण नहीं हो सकता था। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1816 ई. में कलकत्ता में 'हिन्दू कॉलेज' की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने 1823 ई. में लार्ड एमहर्स्ट (Amherst ) को पत्र लिखकर यह अनुरोध किया कि भारत में अँग्रेजी ढंग के स्कूल और कॉलेज खोले जायें जिनमें गणित, प्राकृतिक दर्शन, रसायनशास्त्र, शरीर-विज्ञान तथा अन्य वैज्ञानिक विषयों की शिक्षा दी जाय। वे यह भी चाहते थे कि भारतीय विद्यार्थियों को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से आधुनिक विषयों की शिक्षा दी जाय। अतः राजा राममोहन राय ने आधुनिक शिक्षा के प्रसार में योगदान देकर अपनी गतिशीलता एवं उदारता का परिचय दिया।
राजा राम मोहन राय ने अपने विचारों का प्रचार करने के लिए अँग्रेजी, बंगाली और फारसी में कई समाचारपत्रों को निकाला। बंगाली में उन्होंने "सम्वाद कौमुदी" मामक साप्ताहिक पत्र का सम्पादन किया। उन्होंने अंग्रेजी और बंगाली में "ब्राह्मैनिकल मैगजीन' (Brahmanical Magazine) निकाली तथा फारसी में “मिरातुल अखबार" नामक पत्रिका का सम्पादन किया। इस दृष्टि से वे भारतीय पत्रकारिता के अग्रदूत थे। इसके साथ ही उन्होंने समाचारपत्रों की स्वतंत्रता के लिए भी आन्दोलन चलाया। उनके आन्दोलन के कारण ही 1835 ई. में भारतीय समाचार पत्रों को थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता मिली।
राजा राममोहन राय ने 19वीं शताब्दी के नवजागरण का श्रीगणेश किया। उनके नेतृत्व में ही भारत में प्रशासनिक सुधारों के लिए भी आवाज उठायी गई। उन्होंने भारत में राजनीतिक सुधारों के लिए जनता में जागृति फैलाई। वे इंग्लैंड गये और वहाँ उन्होंने हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रवर समिति के सामने गवाही देकर भारत में प्रशासनिक सुधारों के लिए सुझाव दिये। उनके हृदय में अपने देश तथा देशवासियों के प्रति गहरी सहानुभूति थी। राजनीति के क्षेत्र में वे उदारवादी विचारों के पोषक थे।
राजा राममोहन राय आधुनिक भारत के पहले नेता थे जिन्होंने भारत के बाहर जाकर अपने आचरण तथा अपनी वक्तृता से भारत का नाम रौशन किया। लेकिन उनकी दृष्टि केवल भारतीय प्रश्नों तक ही सीमित नहीं थी। उनका दृष्टिकोण पूर्णरूप से अन्तर्राष्ट्रीय था। इसी दृष्टि से प्रेरित होकर उन्होंने सभी धर्मों के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया तथा विदेशों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को सुलझाने के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत किये जिसमें सम्बन्धित देशों की संसद से एक-एक सदस्य लेकर एक अन्तर्राष्ट्रीय काँग्रेस बनाने की योजना थी। उनके अनुसार यही काँग्रेस अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों का शांतिपूर्ण निर्णय करती।
इन तथ्यों को देखने से स्पष्ट होता है कि राजा राममोहन राय भारत में प्रवर्तक थे। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से भारत में आधुनिकता का सूत्रपात हुआ तथा नवयुग के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जागरण के चिन्ह दिखलाई पड़ने लगे। इसलिए डॉ. कालिदास नाग ने उन्हें "सृजनात्मक शक्ति से सम्पन्न राजनेता" कहा है। मैक्समूलर ने राजा राममोहन राय को मानव समाज के महान हितैषियों और संसार के महान व्यक्तियों में स्थान दिया है।
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