1905 ई. की रूसी क्रांति के कारणों की विवेचना करें।

1905 ई. की रूसी क्रांति 1904-05 ई. के रूस-जापान युद्ध में रूस की पराजय का एक गम्भीर परिणाम था। इस युद्ध में रूस की निरन्तर पराजय की खबरों ने रूसी जनता के असंतोष को चरम सीमा पर पहुँचा दिया और अन्ततोगत्व उसका विस्फोट क्रांति के रूप में हो गया। 19वीं शताब्दी में जब यूरोप में प्रायः सभी देशों में सीमित राजतंत्र एवं जनतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हो रही थी उस समय रूस अभी भी मध्य युग में विचरण कर रहा था तथा वहाँ जार का कठोर निरंकुश शासन कायम था। रूस का जार अपने भ्रष्ट सामन्तों, अधिकारियों, पुलिस एवं विशाल सेना के बल पर वह रूस जैसे विशाल प्रदेश में एक अर्द्धविकसित एवं अर्द्धशिक्षित विशाल जनसमुदाय पर शासन कर रहा था। अब तक जितने भी कृषक या श्रमिक विद्रोह हुए थे उन्हें अपनी विशाल सेना की सहायता से जार कुचलने में सफल हुआ था। किन्तु जापान के साथ युद्ध में रूस की पराजय के कारण जनसाधारण एवं सेना में जो असंतोष उत्पन्न हुआ उसने जार की निरंकुशता की जड़ें हिला दीं। इस प्रकार यदि क्रीमिया युद्ध में रूस की हार ने 1861 ई. में दास-प्रथा की समाप्ति की भूमिका निर्मित की तो रूस-जापान युद्ध में सेना की पराजय ने 1905 ई. की क्रांति का आह्वान किया।

1905 ई. की क्रांति के कारण-


राजनीतिक कारण


1905 ई. की क्रांति के विस्फोटं का एक प्रधान कारण जार की निरंकुशता थी। इस समय तक यूरोप के प्रायः सभी देशों में निरंकुशता का स्थान सीमित राजतंत्र ने ले लिया था और अमेरिका तथा फ्रांस की क्रांति के पश्चात् यूरोप में जनतंत्र की धारा प्रवाहित हो रही थी किन्तु रूस का जार अभी भी मध्यकालीन निरंकुशता को अपनाये हुए था। वह सरकार के तीनों अंगों-व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का प्रधान था। जार अलेकजेंडर द्वितीय के सुधार अल्पकालिक सिद्ध हुए थे और उसके बाद के शासकों ने पुनः निरंकुशता को ही अपनाया था। जार की निरंकुशता एवं प्रतिक्रियावादी नीति के कारण भ्रष्ट सामन्तों एवं अधिकारियों पर कोई नियंत्रण नहीं था। चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला था।

सरकार की रूसीकरण की नीति से अल्पसंख्यक जातियाँ जैसे-यहूदी, पोल, फिन्न, मुस्लिम तथा प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग काफी नाराज थे। यहूदियों को मास्को से निकाल बाहर किया गया। जार के अत्याचार से लगभग 15 लाख यहूदी रूस से भाग खड़े हुए। इसी प्रकार दक्षिण में रहने वाले प्रोटेस्टेंट किसानों जिन्हें स्टण्डिस्ट (Stundists) कहा जाता था, रूस के कट्टर चर्च के इशारे पर रूस से बाहर भगा दिया गया।

रूस का तत्कालीन जार निकोलस द्वितीय जो 1894 ई. में गद्दी पर बैठा, हठी, भाग्यवादी और निरंकुश तथा घोर प्रतिक्रियावादी शासक था। वह अपनी पत्नी जारिना, जो इंगलैण्ड की महारानी विकटोरिया की पोती थी, के हाथों का कठपुतला था। उसके समय पुलिस तथा गुप्तचर और भी अधिक गतिशील हो गयी और वे मुस्तैदी से काम करने लगे। कारखानों, शिक्षण-संस्थाओं, क्लबों एवं नृत्यगृहों में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया गया। पुस्तकों एवं अखबारों पर कठोर नियंत्रण लगा दिया गया। विदेश यात्रा पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 1903 ई. तक लगभग 12,000 राजनीतिक मुकदमे सरकार के पास थे। राजनीतिक बंदियों को या तो साइबेरिया निर्वासित कर दिया गया या उन्हें किसी और ढंग से मरवा दिया गया।

1903 ई. में हजारों यहूदियों को मार डाला गया। रूस में जार के विरुद्ध आन्दोलनों का कठोरतापूर्वक दमन होने के कारण क्रांतिकारियों ने विदेशों में आन्दोलन के केन्द्र स्थापित किये। अब तक अनेक राजनीतिक दलों का गठन हो चुका था और वे समाजवादी विचारों से प्रभावित होकर देश में “समाजवादी गणराज्य" की स्थापना करना चाहते थे। इस समय लेनिन, प्लेखानोव, मार्तोव, चर्नोव जैसे नेता जार के आतंक के कारण विदेशों में सक्रिय थे और वहीं से आन्दोलन का संचालन कर रहे थे।

आर्थिक कारण

रूस एक कृषिप्रधान देश था तथा कृषि लोगों की आजीविका का मुख्य साधन थी। किन्तु रूस में किसानों की हालत दयनीय थी। जार अलेक्जेंडर द्वितीय ने दास प्रथा का उन्मूलन अवश्य किया था, किन्तु वे अभी भी सामन्तों तथा राज्य के बन्धक थे। देश की अधिकांश उपजाऊ भूमि सामन्तों के कब्जे में थीं। किसानों ने सरकार से ऋण लेकर सामन्तों से जमीन खरीदा था तथा ऋणों की किश्त चुकाने का भार उनके ऊपर था। वे बीज, खाद तथा औजार आदि के लिए सामन्तों के ऊपर निर्भर थे। कृषकों के संगठन 'मीर' पर भी सामन्तों का नियंत्रण था। अपनी स्थिति से तंग आकर कृषक शहरों की ओर पलायन कर श्रमिक बन रहे थे। रूस में कृषि की व्यवस्था परम्परागत एवं पुरानी थी, जिसके कारण रूस में प्रायः अकाल एवं दुर्भिक्ष होते थे। 1891 ई. से 1901 ई. तक अनेक अकाल हुए और किसानों ने विद्रोह किये।

इधर शहरों में श्रमिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी और कई नई समस्यायें पैदा हो रही थीं। 19वीं सदी तक रूस का औद्योगीकरण तेजी से हुआ और श्रमिकों की एक बड़ी संख्या खड़ी हो गई। किन्तु श्रमिकों की स्थिति दिन-प्रतिदिन दयनीय होती गई। उनके काम करने के घन्टे निश्चित नहीं थे। उनका शोषण किया जाता था तथा उनके आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा नियमित काम की कोई व्यवस्था नहीं की गई।

दूसरी ओर यूरोप के ब्रिटेन, फ्रांस तथा जर्मनी जैसे देशों में मजदूरों की दशा में सुधार लाने के अनेक प्रयत्न हो रहे थे। इन परिस्थितियों में श्रमिकों में घोर असंतोष उत्पन्न हुआ।

सामाजिक कारण

1905 ई. के पूर्व रूस में सामाजिक असंतोष अपने चरम सीमा पर था। समाज में मुख्यतः दो वर्ग थे-सुविधा सम्पन्न कुलीन वर्ग जिसमें सामन्त, उच्च अधिकारी, उद्योगपति एवं चर्च से सम्बन्धित लोग थे तथा दूसरे वर्ग में कृषक एवं औद्योगिक श्रमिक थे जिन्हें दो वक्त की रोटी भी कठिनाई से प्राप्त होती थी। उच्च वर्ग के लोगों का जीवन विलासिता, भ्रष्टाचार एवं स्वेच्छाचारिता से परिपूर्ण था। कृषि योग भूमि का अधिकांश भाग अभी भी सामन्तों के अधिकार में था। उच्च वर्ग के लोग ही सेना तथा शासन के उच्च पदों के पर आसीन थे। इस असमानता के कारण समाज में भीषण असंतोष विद्यमान था।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में समाज में बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, साहित्यकारों एवं दार्शिनिकों का भी एक वर्ग पैदा हुआ जिसने असंतोष को वाणी दी और अपने कृत्यों से उसका प्रचार एवं प्रसार किया। जारशाही ने बुद्धिजीवियों को भी कुचलने के अनेक उपाय किये। 1884 ई. में विश्वविद्यालयों का पुनर्गठन किया गया। शिक्षा पर राजकीय नियंत्रण स्थापित किया गया। साहित्यों एवं समाचार पत्रों पर नियंत्रण और भी कठोरता से लागू हुआ। बुद्धिजीवियों की राजनीतिक गतिविधियों पर शासन और भी सतर्कता से ध्यान देने लगी।

सामाजिक असन्तोष एवं तनाव का एक और कारण अल्पसंख्यकों एवं गैर-रूसियों पर अत्याचार था। रूस में गैर-रूसी 56% थे। इनमें यहूदी, जर्मन, पोल, फिनलैंडवासी, तथा मुस्लिम सम्प्रदाय आदि के लोग थे जिनकी अपनी भाषा, धर्म और संस्कृति थी। रूसीकरण की नीति के अन्तर्गत इनपर अमानुषिक अत्याचार किये गये। ये भी विद्रोह के लिए सु-अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।

बौद्धिक कारण

इस काल के बुद्धिजीवियों ने अपने लेखों तथा विचारों से 1905 ई. की क्रांति की बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार की। 19वीं सदी में पुश्किन, गोगोल, चेर्नस्वस्की, तुर्गनेव, टाल्सटॉय, चेखव आदि प्रसिद्ध साहित्यकार हुए जिन्होंने रूस की तत्कालीन व्यवस्था के प्रति लोगों को जागृत किया तथा असंतोष को अभिव्यक्ति प्रदान की।

विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक पर इनके विचारों का काफी प्रभाव पड़ा और इसके परिणामस्वरूप निहिलिस्ट तथा नारोनिक आन्दोलन का जन्म हुआ। क्रांतिकारी विदेशी साहित्य पर भंयकर सेंसर लागू था। परन्तु गुप्त रूप से विदेशी साहित्य का रूस में आगमन होता रहा और क्रांति का प्रचार चलता रहा। अलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या के बाद मार्क्सवादी साहित्य का रूस में तेजी से प्रचाकर हुआ और प्लेखानोव तथा लेनिन आदि ने इस सम्बन्ध में अनेक पुस्तकें लिखीं। क्रांतिकारी भावनाओं से परिपूर्ण साहित्य का प्रकाशन रूस से बाहर कर उन्हें रूस में भेजा जाने लगा। लेनिन द्वारा सम्पादित पत्र 'इस्क्रा' अर्थात् चिंगारी ने तो वास्तव में सारे रूस में क्रांति की चिंगारी फैला दी थी।

विभिन्न राजनीतिक संगठनों का उदय

19 वीं शताब्दी के अंत में रूस में परिवर्तन की माँग तीव्र होने लगी और इसके फलस्वरूप निहिलिस्ट तथा नारोनिक आन्दोलनों का जन्म हुआ। किन्तु 1881 ई. में जार की हत्या के पश्चात् रूस में प्रतिक्रियावाद और दमन का चक्र चला और अनेक क्रांतिकारी नेता मार डाले गये अथवा कैद कर लिये गये या विदेश भाग गये।

नारोनिकं नेता प्लेखानोव ने जेनेवा को अपने गतिविधियों का केन्द्र बनाया तथा वहीं रूस में मार्क्सवादी साहित्य का प्रचार-प्रसार किया तथा श्रमिकों को समाजवादी क्रांति करने का आह्वान किया। उसने जेनेवा में ही 'श्रमिक उन्मुक्ति दल (Emancipation of Labour Group)' की स्थापना की और रूसी श्रमिकों तथा अन्य क्रांतिकारियों को संगठित करने का प्रयास किया।

इसके पश्चात् 1895 ई. में लेनिन ने सेंट पीट्सवर्ग में 'श्रमिक उन्मुक्ति संघ (League for the Emancipation of the Working Class)' की स्थापना की और रूस के श्रमिकों को संगठित कर उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित किया। इसके परिणामस्वरूप 1896-97 ई. में रूस में अनेक हड़तालें हुई और लेनिन को निर्वासित कर दिया गया। बाद में सभी संगठनों ने मिलकर 'रूसी सामाजिक जनतंत्रवादी मजदूर दल (Russian Social Democratic Labour Party)' का गठन किया। किन्तु आगे चलकर इसमें फूट पड़ गयी और लेनिन के नेतृत्व में बहुसंख्यक दल ('बोल्शेविक दल तथा अल्पसंख्यक दल मार्तोव के नेतृत्व में 'मेंशेविक दल' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दोनों ही दल रूस में समाजवादी शासन की स्थापना चाहते थे।

19वीं सदी के अंतिम दशक में रूस में आतंकवादी दल भी सक्रिय था जो नातासन, चर्नोव आदि के नेतृत्व में क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न थे। 1896 ई. में इन्होंने 'समाजवादी क्रांतिकारी दल (Socialist Revolutionary Party)' का गठन किया। 20वीं सदी के प्रारम्भ में इस दल के नेतृत्व में कई राजनीतिक हत्याओं की सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया और ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिक विद्रोहों का संचालित किया गया। इस दल की आतंकवादी गतिविधियों ने भी असंतोष की चिंगारी को जलाये रखा तथा उसे उग्रतर बनाया।

क्रांतिकारी एवं आतंकवादी दल के विपरीत रूस में एक उदारवादी दल भी था जो सीमित राजतंत्र तथा जनतांत्रिक सुधारों का समर्थक था, परन्तु समाजवाद और आतंकवाद का घोर विरोधी था। इन लोगों ने 1902 ई. में 'मुक्तिसंघ (Union of Liberation)' नामक दल का संगठन किया। इनके विचारों ने भी रूस की जनता को काफी प्रभावित किया था।

रूस-जापान युद्ध

1904-05 ई. का रूस-जापान युद्ध 1905 ई. की क्रांति का तात्कालिक कारण था। इस युद्ध में जापान के हाथों रूस को हर जगह पराजय का मुँह देखना पड़ा। जापानी जहाजी बेड़े ने रूसी बेड़े की धज्जियाँ उड़ा दीं। रूरा के अस्त्र-शस्त्र काफी पुराने थे तथा सेना का मनोबल काफी गिरा हुआ था। शासन के प्रति रूसी जनता के मन में जो असंतोष था, वह सेना में भी प्रतिबिम्बित हो रहा था। रूस में प्रारम्भ से ही इस युद्ध के प्रति उदासीनता थी। रूसी सेना का नेतृत्व अयोग्य सेनापतियों के हाथों में था।

हजारों की संख्या में रूसी सैनिक मारे गये और वे युद्ध का मैदान छोड़कर भागने लगे। इन परिस्थितियों में जनवरी 1905 ई. में जब जापान ने पोर्ट-आर्थर पर कब्जा जमा लिया तो सारे रूस में तहलका मच-गया। क्रांति का वातावरण रूस में व्याप्त था ही, इस घटना ने सूखी लकड़ी में चिंगारी का काम किया। चारों ओर जार की निरंकुशता के विरुद्ध विरोध का स्वर उभरने लगा और 1905 ई. की क्रांति का विस्फोट हो गया।


1905 ई. की रूसी क्रांति के परिणाम


परिणाम की दृष्टि से 1905 ई. की रूसी क्रांति काफी महत्त्वपूर्ण थी। इसने न केवल रूस को वरन् सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया। इसने क्रांति को एक नया अर्थ और दिशा प्रदान की। इसके व्यापक परिणाम निम्नलिखित है-

रूस पर प्रभाव

इस क्रांति में रूस के बुद्धिजीवियों, छात्रों, श्रमिकों, किसानों एवं सैनिकों ने कंधा से कंधा मिलाकर भाग लिया था और जार के निरंकुश शासन को जड़ से हिला दिया था। परिणामस्वरूप जार की निरंकुशता पर नियंत्रण के प्रतीक के रूप में रूसी संसद ड्यूमा (Duma) का गठन हुआ। रूसी किसानों को 1861 ई. के सुधारों की पूर्णाहुति के रूप में भूमि का स्वामीत्व प्राप्त हुआ और ऋण से मुक्ति मिली तथा संघ के गठन का भी अधिकार प्राप्त हुआ। इस प्रकार उन्हें सदियों पुरानी दासता से मुक्ति मिली।

दूसरी ओर भूस्वामियों को घाटा उठाना पड़ा तथा वर्तमान अर्थव्यवस्था एवं राजनीति में उनका प्रभाव घट गया। किसानों ने सशस्त्र संघर्ष का स्वाद चख लिया तथा इससे उन्हें आगे के संघर्ष के लिए प्रेरणा मिली। श्रमिकों को भी संघ बनाने का अधिकार मिला। उनके काम करने के घन्टे निश्चित कर दिये गये। रूसी प्रेस पर लगाये गये कई प्रतिबन्ध उठा दिये गये और वे अब स्वतंत्रतापूर्वक अपने विचारों को व्यक्त कर सकते थे। एक ओर भूस्वामियों के प्रभाव में ह्रास हुआ तो दूसरी ओर पूँजीपति वर्ग का प्रभाव शासन में बढ़ने लगा। उत्पादन में वृद्धि के कारण साम्राज्यवाद को प्रेरणा मिली और रूस कच्चे माल तथा बाजार की तलाश में लग गया परिणामस्वरूप बाल्कन (Balkan) क्षेत्र में रूस की दिलचस्पी और गतिविधि बढ़ गई जिसने नये अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को जन्म दिया।

1905 ई. की क्रांति आनेवाली सफल क्रांति के लिए एक 'ड्रेस रिहर्शल (Dress Rehearsal)' अर्थात् पूर्वाभ्यास के समान थी। इस क्रांति की विफलता से क्रांतिकारियों ने बहुत कुछ सीखा और भावी क्रांति के लिए नई दिशा की खोज में लग गये। लेनिन ने स्पष्ट रूप से 1905 ई. की क्रांति को 1917 ई. की क्रांति का 'पूर्वाभ्यास' कहा।

विश्व पर प्रभाव

1905 ई. की क्रांति का प्रभाव मात्र रूस तक ही सीमित नहीं रहा। इसने विश्व राजनीति को भी प्रभावित किया। 1905 ई. की रूसी क्रांति के तरीकों ने यूरोप में क्रांतिकारियों को एक नई दिशा दी और वे इसे 'रूसी तरीका (Russian Method)' के नाम से पुकारने लगे। इसी समय वियना, प्राग तथा बुडापेस्ट आदि नगरों में भी श्रमिकों एवं छात्रों ने हड़ताल किया तथा सेना और पुलिस का सामना किया। इस काल में यूरोप के अनेक देशों में श्रमिकों के भीषण विद्रोह हुए।

इस विद्रोह ने एशिया एवं अफ्रिका के अनेक पराधीन एवं अविकसित राष्ट्रों को काफी प्रभावित किया। इन देशों ने 1905 ई. की क्रांति से चोरणा ग्रहण और वहाँ स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र के पक्ष में आन्दोलनों एवं विद्रोहों की बाढ़ सी आ गयी। इस क्रांति ने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को भी व्यापक रूप से प्रभावित किया। इससे भारत में क्रांतिकारी एवं आतंकवादी आन्दोलन को बल मिला तथा देशव्यापी स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ करने की प्ररेणा मिली। 1905 ई. में चीन में राष्ट्रवादी कुओमिनतंग दल की स्थापना हुई जिसने 19वीं क्रांति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

इसी प्रकार ईरान, इण्डोनेशिया, फिलीपीन एवं मिस्र में भी इस क्रांति की गूँज सुनाई दी और वहाँ भी तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध हड़ताल, विरोध एवं प्रदर्शन का दौर प्रारम्भ हो गया।