संस्कृतीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई पिछड़ी हिन्दू जाति, या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह, किसी उच्च और प्रायः 'द्विज' जाति (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) की दिशा में अपने रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, विचारधारा और जीवन-पद्धति को बदलता है। साधारणतः ऐसे परिवर्तनों के पश्चात् वह जाति, परम्परा से स्थानीय समाज द्वारा सोपान में जो स्थान उसे प्राप्त है, उससे ऊँचे स्थान का दावा करने लगती है। साधारणतः बहुत दिनों तक, बल्कि वास्तव में एक-दो पीढ़ियों तक, दावा किये जाने के बाद ही उसे स्वीकृति मिलती है। याचित और स्वीकृत प्रतिष्ठा के बीच इस प्रकार का असामंजस्य न केवल मतामत के क्षेत्र में, वरन् आपस के व्यवहार-विचार में भी दृष्टिगोचर होता है। उदाहरण के लिए मैसूर में हरिजन जातियाँ दस्तकारों (लुहारों, सुनारों आदि) से हाथ का बना खाना और पीने का पानी स्वीकार नहीं करती, जो निश्चय ही स्पृश्य जातियों में हैं और इसलिए हरिजनों से श्रेष्ठ हैं, चाहे उनका विश्वकर्मा ब्राह्मण होने का दावा भले ही न माना जाय। इसी तरह किसान और अन्य, जैसे गड़ेरिये, मार्क ब्राह्मणों (जो ब्राह्मणों में ही गिने जाते हैं) के हाथ का बना खाना और पानी स्वीकार नही करते हैं। मैसूर के लिंगायत कुर्गवासियों को 'जंगली लोग' (कादुजन) कहते थे जबकि कुर्सी अपने सच्चे क्षत्रिय, बल्कि 'आर्य' होने का दावा करते हैं।
सामान्यतः संस्कृतीकरण के साथ-साथ, और प्रायः उसके परिणामस्वरूप सम्बद्ध जाति ऊपर की ओर गतिशील होती है। परन्तु संस्कृतीकरण से सम्बद्ध गतिशीलता के परिणामस्वरूप व्यवस्था में केवल पदमूलक परिवर्तन ही होते हैं, कोई संरचनामूलक परिवर्तन नहीं। अर्थात् एक जाति अपने आस-पास की जातियों से ऊपर उठती है, और दूसरी नीचे आ जाती है। किन्तु इससे व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
संस्कृतीकरण हिन्दू जातियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जनजाति और अर्ध-जनजाति समूहों में भी होता है, जैसे पश्चिमी भारत के भीलों में, मध्य भारत के गौड़ों और उराँवों मे तथा हिमालय के पहाड़ियों में भी। इसके परिणामस्वरूप जिस जनजाति में संस्कृतीकरण होता है, वह एक जाति तथा हिन्दू होने का दावा करने लगती है। जैसे छोटानागपुर की मुण्डा जाति अपने को क्षत्रिय मानते हैं। पारम्परिक व्यवस्था में हिन्दू होने का एकमात्र उपाय किसी जाति में शामिल होना था और गतिशीलता की इकाई सामान्यतः व्यक्ति या परिवार नहीं, वरन् एक समूह होता था। संस्कृतीकरण की संकल्पना को लाने का श्रेय डॉ. एम. एन. श्रीनिवास (M. N. Srinivas) को है। इस संकल्पना द्वारा श्रीनिवास ने भारतीय जाति प्रथा की संरचना एवं संस्तरण में होने वाले परिवर्तनों को समझाने का प्रयत्न किया है। उन्होंने यह दर्शाने का प्रयत्न किया है कि आधुनिक भारत में निम्न जाति के सदस्य प्रायः ऊँची जातियों के संस्कारों एवं जीवन के ढंग (way of life) का अनुकरण कर रहे हैं और साथ ही जातीय संस्तरण में उच्च स्थान या स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं एवं इस प्रयत्न में वे सफल भी हो रहे हैं। इसके फलस्वरूप समाज में निम्न जातियों की प्रस्थिति एवं जीवन के ढंग में काफी परिवर्तन हो जाते हैं।
डॉ. एम. एन. श्रीनिवास ने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक Religion and Society among the Coorg of South India में जाति की गतिशीलता की प्रक्रिया को व्यक्त करने हेतु संस्कृतीकरण की संकल्पना का प्रयोग किया। श्रीनिवास ने लिखा है कि जाति प्रथा उस कठोर प्रणाली से काफी दूर है, जिसमें प्रत्येक घटक जाति की स्थिति को हमेशा के लिए निश्चित कर देती है। उनका मानना है कि जाति प्रथा में गतिशीलता सदैव संभव रही है और विशेषतः मध्य जातियों में एम. एन. श्रीनिवास ने प्रारंभ में संस्कृतीकरण को इस प्रकार परिभाषित किया, "एक निम्न जाति एक या दो पीढ़ियों में शाकाहारी बनकर मद्यपान छोड़कर तथा अपने कर्मकाण्ड एवं देवगण का संस्कृतीकरण कर संस्तरण की प्रणाली में अपनी स्थिति ऊँची उठाने में समर्थ हो जाती है। संक्षेप में, वह जहाँ तक संभव हो ब्राह्मणों की प्रथाओं, अनुष्ठानों एवं विश्वासों को अपना लेती है। साधारणतः निम्न जातियों के द्वारा ब्राह्मणी जीवन-प्रणाली को प्रायः अपना लिया जाता है; हालांकि सैद्धांतिक रूप से यह वर्जित था।" श्रीनिवास (M. N. Srinivas) ने अपनी इस परिभाषा में बाद में संशोधन किया और इसे पुनेः परिभाषित करते हुए लिखा, "संस्कृतीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या जनजाति अथवा कोई अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, विचारधारा और जीवन-पद्धति बदलता है।"(Sanskritization is the process by which a low Hindu Caste or tribal or other group, changes its customs, rituals, ideology and way of life in the direction of a high and frequently twice born caste.)
संस्कृतीकरण केवल निम्नजातियों तक ही सीमित नहीं रहा। उच्च जातियों में भी संस्कृतीकरण हुआ और ब्राह्मण भी इससे अछूते न रह सके। चूँकि हिन्दुओं के चार वर्णों में ब्राह्मण को उच्चतम स्थान प्राप्त है तथा वैदिक कर्मकाण्ड और सभी वेदों के मंत्रों का पाठ करने में वे सक्षम हैं। अतः दूसरों की अपेक्षा उन्हें संस्कृतीकरण के लिए 'श्रेष्ठतम' आदर्श माना गया है। किन्तु उनके जीवन पद्धति में भी परिस्थिति एवं स्थानीयता के कारण कुछ परिवर्तन हुए और उनका संस्कृतीकरण हुआ।
एक ही प्रदेश में रहने वाले सभी जातियों में स्थानीय संस्कृति के कुछ तत्व समान रूप से प्राप्त होते हैं। इस भाँति एक क्षेत्र में रहने वाले ब्राह्मण और हरिजन (अछूत) दोनों एक ही भाषा बोलेंगे, समान त्योहार मनायेंगे और कुछ सामान्य स्थानीय देवताओं और मान्यताओं को स्वीकार करते होंगे।
कुछ ब्राह्मण समूह जैसे कश्मीरी, बंगाली और सारस्वत मांसाहारी हैं, जबकि अन्य स्थानों में ब्राह्मण परम्परा से ही शाकाहारी होते हैं। कुछ ब्राह्मण समूहों की जीवन शैली में दूसरों की अपेक्षा अधिक संस्कृतीकरण होता है और यह वैदिक तथा लौकिक ब्राह्मणों के बीच अन्तर से बिल्कुल भिन्न है। विभिन्न ब्राह्मण समूहों में धन्धों की भी पर्याप्त अनेकरूपता पाई जाती है। पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में ब्राह्मणों की लौकिक स्थिति नीची है और गुजरात, बंगाल और मैसूर में बहुत से ब्राह्मणों के समूहों को कर्मकाण्ड की दृष्टि से नीचा समझा जाता है। केवल लौकिक कसौटी पर किसी ब्राह्मण का स्थान भले ही नीचा हो, फिर भी वह ब्राह्मण है और इस कारण कर्मकाण्ड और पवित्रता-सम्बन्धी सन्दर्भों में सम्मान का अधिकारी है। लखपती गुजराती बनिया कभी उस रसोई घर में नहीं जा सकता जहाँ ब्राह्मण रसोईया काम करता हो, क्योंकि इससे ब्राह्मण और रसोई दोनों ही अपवित्र हो जायेंगे। केवल सन्दर्भ के कारण ही नहीं वरन् धर्म के कारण भी ब्राह्मणों को श्रेष्ठ एवं विशिष्ट माना गया है।
एक विद्वान के अनुसार ब्राह्मणों की संस्कृति में संस्कृतीकरण सदा ही बहुत अधिक नहीं हुआ। स्थानीय परिस्थिति के कारण कभी-कभी ब्राह्मणों को अपने जीवन शैली में परिवर्तन के लिए विवश होना पड़ा। उदाहरण के लिए जैनसारबावर क्षेत्र के ब्राह्मणों द्वारा माँस एवं मदिरा का सेवन तथा पहली स्त्रियों के साथ संसर्ग के पीछे जलवायु एवं स्थानीय परिस्थितियाँ उत्तरदायी थी। कड़ाके की सर्दी एवं उस क्षेत्र में माँस भी नहीं मिलता था। कभी-कभी क्षेत्र के दबंग जातियों के प्रभाव में आकर भी ब्राह्मणों का संस्कृतीकरण हुआ था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सनाय ब्राह्मणों की जीवन शैली में बहुत कम परिवर्तन (अल्पतम संस्कृतीकरण) हुआ।
क्षत्रियों के समान ब्राह्मणों ने भी ग्रामीण तथा नगरीय भारत में प्रभुता का सुख उठाया है। संख्या की दृष्टि से किसानों की अपेक्षा कम होने के बावजूद उन्हें कर्मकाण्डीय प्रधानता प्राप्त रही है, विशेषकर एक धर्म प्रधान समाज में। अँगरेज-पूर्व भारत में और देशी रियासतों में पाप के प्रायश्चित और पुण्य के अर्जन का एक लोकप्रिय उपाय ब्राह्मणों को भूमि, घर, सोना तथा अन्य वस्तुओं का दान करना था। यह दान राजकुमार के जन्म, विवाह, राज्याभिषेक और मृत्यु के अवसरों पर किया जाता था। ब्राह्मणों को सरकारी कर्मचारी, विद्वान, पुजारी, पुरोहित और देश के कुछ भागों में देहाती लेखापाल के रूप में भूमि प्राप्त हो जाती थी। सर्वोच्च जाति होने के कारण ब्राह्मणों को जो भारी प्रतिष्ठा प्राप्त थी, वह भूमि का स्वामित्व पाकर और भी बढ़ जाती थी। आधुनिक काल में ब्राह्मणों का राजनीतिक प्रभाव भी उल्लेखनीय है। राष्ट्रीयता के जन्म एवं विकास एवं राष्ट्रीय आन्दोलन में उनकी भूमिका की अवहेलना नहीं की जा सकती है। राष्ट्रीय आन्दोलन में उनकी पकड़ के कारण ही 1910 से 1920 ई. तक भारत के अँगरेजों के एक वर्ग ने ब्राह्मणों को ही अपना चरम शत्रु मान लिया था । "Indian Unrest" के लेखक प्रख्यात विद्वान Sir Valentine Chiroll ने भी ब्राह्मणवाद और पश्चिमी शिक्षा को ब्रिटिश शासन के लिए खतरनाक बतलाया था
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