भारतीय स्वातंत्र्य आन्दोलन पर प्रथम विश्वयुद्ध के प्रभाव का वर्णन कीजिये।

प्रथम विश्वयुद्ध सन् 1914 ई. में आरम्भ हुआ। यह युद्ध मुख्यतः इंगलैण्ड और जर्मनी के बीच था। इस महायुद्ध के राजनीतिक परिणाम ही महत्त्वपूर्ण हुए। प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के बाद लोकतंत्र और राष्ट्रवाद को सत्य रूप में स्वीकार कर लिया गया और इस प्रकार एक नये युग का सूत्रपात हुआ।

प्रथम महायुद्ध में भारत के समस्त दलों तथा वर्गों ने अँगरेजों को पूरा समर्थन दिया। लाखों भारतीयों ने सेना में भर्ती होकर साथी देशों की ओर से विभिन्न जगहों पर लंड़ाइयाँ लड़ीं। समस्त भारतीय जनता ने तन-मन-धन से अँगरेजों की मदद की। महात्मा गाँधी, जो दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारतीय राजनीति में सक्रिय भाग लेने लगे थे, भी अँगरेजों को तन-मन-धन से युद्ध में सहयोग देने के पक्ष में रहे। भारतीयों से सहयोग दिलाने के लिए उन्होंने पूरा प्रयत्न किया। केवल आतंकवादी तथा क्रांतिकारी नेताओं ने ही अँगरेजों को युद्ध में भारतीयों द्वारा सहयोग का विरोध किया।

प्रथम महायुद्ध में भारतीयों के सहयोग देने के कारण

प्रथम महायुद्ध में भारतीयों द्वारा अँगरेजों को सहयोग दिये जाने के निम्नलिखित कारण थे : -



  • लॉर्ड हार्डिज की उदारवादी नीति से भारतीय काफी प्रभावित हुए। लॉर्ड हार्डिज ने भारतीयों के साथ प्रेम तथा सहानुभूति का वर्ताव किया। दक्षिण अफ्रीका में रहनेवाले भारतीयों के प्रति होनेवाले अत्याचारों का उन्होंने विरोध किया तथा उनके प्रति सहानुभूति दिखलायी। लॉर्ड कर्जन के बंगाल विभाजन को रद्द कर हार्डिज ने बंगाल को पुनः एक कर दिया। युद्ध में भारतीय सेनाओं को यूरोपियन सेनाओं के समान अधिकार दिलाने पर उन्होंने जो बल दिया इन्हीं सब बातों को लेकर भारतीयों में अँगरेजों के प्रति श्रद्धा बढ़ी।

  • युद्ध प्रारम्भ होते ही मित्र राष्ट्रों की ओर से लोकतन्त्रवाद तथा राष्ट्रवाद की रक्षा की घोषणा की गयी। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऐस्किवथ ने कहा था “भविष्य में भारत के प्रश्न को एक नये दृष्टिकोण से देखा जायगा।" लॉयड जॉर्ज ने यह घोषणा की थी "सभी को अपने-अपने भाग्य के निर्णय का अधिकार दिया जायगा ।" ब्रिटिश राजनेताओं के समय-समय पर दिये गये वचनों पर भारतीयों ने विश्वास किया। भारतीयों ने पश्चात् अँगरेजों द्वारा स्वशासन प्रदान किये जाने की आशा की।


अँगरेज युद्ध के समय चाहते थे कि भारत में हिन्दू मुसलमानों में एकता हो जाय, जिससे उन्हें युद्ध में पूर्णरूप से सहयोग प्राप्त हो। सन् 1916 ई. में लखनऊ-कॉंग्रेस के अधिवेशन के समय काँग्रेस तथा मुस्लिम लीग में समझौता हो गया और दोनों ने मिलकर एक मिलाजुला घोषणा-पत्र निकाला। दोनों सम्प्रदायों में मेल होने से अँगरेजों को समस्त भारतीयों द्वारा युद्ध में सहयोग प्राप्त हुआ।

भारतीयों को यह आशा थी कि युद्ध के बाद भारतीयों को स्वशासन का अधिकार प्राप्त होगा, अतः उन्होंने तन-मन-धन से संकट के समय अँगरेज़ों की सहायता की। काँग्रेस ने कुछ समय के लिए अपना आन्दोलन भी स्थगित कर दिया। उग्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक तथा एनी बेसेंट ने यूरोप के युद्ध से प्रभावित होकर तथा ऐसे समय में अच्छी सफलता की आशा में होमरूल आन्दोलन को पूरे जोरों से चलाया।

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन पर प्रथम महायुद्ध का गहरा प्रभाव पड़ा और भारतीय अब स्वराज्य का स्वप्न देखने लगे। अँगरेजों ने युद्ध में सहयोग के लिए भारतीयों की भूरि-भूरि प्रशंसा की, लेकिन उनकी माँगों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखलायी। तुर्की के विरुद्ध मेसोपोटामिया के युद्ध का पूर्ण उत्तरदायित्व भारत के शासन पर था और युद्ध का संचालन बहुत अकुशलता के साथ किया गया था। अतः अँगरेजों को बड़ी हानि हुई। इस असफलता की जाँच के लिए नियुक्त कमीशन ने इस का पूर्ण उत्तरदायित्व भारत के अँगरेजी शासन पर रखा और भारत में उत्तरदायित्वपूर्ण शासन की स्थापना की सिफारिश की। परिणामस्वरूप तत्कालीन भारत मंत्री को त्याग-पत्र देना पड़ा और उनके स्थान पर मॉण्टेग्यू भारत-मंत्री बनाये गये। इस रिपोर्ट के फलस्वरूप भारत की भावनाएँ और अधिक उग्र हो गयीं।

युद्ध के पश्चात् स्वशासन की आशा करने वाले भारत को अँगरेजों ने रॉलेट ऐक्ट जैसे काले कानून के रूप में तोहफा दिया। इस ऐक्ट के अनुसार किसी को भी संदेह की स्थिति में गिरफ्तार किया जा सकता था। परिणामस्वरूप उस ऐक्ट का भारतीयों द्वारा डटकर विरोध किया गया। उसके विरुद्ध जगह-जगह जुलूस निकाले गये तथा हड़तालें हुई। ऐसी ही एक हड़ताल के कारण जलियाँवाला बाग की दुर्घटना भी हुई। इस घटना ने भारतीयों की आँखें खोल दीं और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास ही बदल गया। जो भारतीय अँगरेजी शासन को सहयोग देते थे, उससे विमुख हो गये। इससे असहयोग का युग प्रारम्भ हुआ। सहयोगी गाँधी अब असहयोगी बन गये तथा असहयोग आन्दोलन द्वारा स्वराज्य की माँग की गयी।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीयों को दिये गये आश्वासन की पूर्ति हेतु मॉण्डफोर्ड सुधार योजना के आधार पर सन् 1919 ई. का भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया था। भारतवासियों की दृष्टि में वह योजना न केवल अपर्याप्त, असंतोषजनक एवं अनुपयुक्त थी, बल्कि निराशाजनक भी थी। फलतः भारतीयों में काफी असंतोष फैला तथा काँग्रेस द्वारा सन् 1920 ई. में असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रकार सन् 1920 ई. का असहयोग आन्दोलन प्रथम विश्वयुद्ध का ही परिणाम था।