सन् 1942 ई. के भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ एवं असफलताओं के कारण

क्रांति का प्रारम्भ :

ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी की खबर बिजली की तरह सम्पूर्ण देश में फैल गयी। सम्पूर्ण देश में जनता स्तब्ध रह गयी। अपने प्रिय नेताओं की गिरफ्तारी तथा सरकारी दमन के चलते जनता में विद्रोह की भावना और भी जाग्रत हो उठीं। जनता अधीर हो उठी तथा सम्पूर्ण देश में जन-विप्लव प्रारम्भ हो गया। यद्यपि सभी बड़े-बड़े नेता गिरफ्तार हो गये थे, फिर भी गाँधीजी के 'करो या मरो' के सिद्धान्त ने उनका नेतृत्व किया। जगह-जगह सभाएँ हुई, हड़तालें की गयीं तथा लोगों ने सरकारी सम्पत्ति को लूटना एवं बर्बाद करना प्रारम्भ कर दिया। जगह-जगह आवागमन के साधनों को तोड़-तोड़ दिया गया। रेलवे स्टेशनों एवं पुलिस थानों को जला दिया गया। सरकारी इमारतें जला दी गयीं तथा तार के खम्भे एवं लाइनें तोड़ दी गयीं।

अहमदाबाद, मद्रास, बड़ौदा, इन्दौर तथा नागपुर के कपड़ा मिलों में हड़तालें हुई। मद्रास और बंगाल में जनता ने सशस्त्र आक्रमण शुरू कर दिया तथा बहुत से प्रान्तों में बल का भी व्यवहार किया गया। बिहार में टाटा के लोहे के कारखाने में चौदह दिनों तक हड़ताल रही। कई स्थानों में तो ऐसा लगता था कि सरकारी शासन ही समाप्त हो गया है। भारत सरकार के गृहमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़ों के आधार पर 1 महीने के अन्दर 250 रेलवे स्टेशन नष्ट कर दिये गये थे, 24 रेलगाड़ियाँ पटरियाँ से उतार दी गयी थीं तथा एक लाख रुपये के डाक टिकट नष्ट कर दिये गये थे। इस आन्दोलन में छात्रों का भी पर्याप्त सहयोग था ।

परन्तु आन्दोलन की प्रगति के साथ सरकार भी आन्दोलन को कुचल देने के लिए कटिबद्ध थी। आन्दोलन को दबाने के लिये सरकार ने हर सम्भव उपायों का सहारा लिया। प्रारम्भ में आन्दोलन को रोकने के लिए सरकार ने लाठी और गोली का सहारा लिया तथा लोगों को गिरफ्तार करना शुरू किया। परन्तु जब इससे भी आन्दोलन नहीं रुका, तो सरकार ने निर्दयतापूर्वक क्रूर उपायों का सहारा लिया। निरपराध लोगों को गोलियों से छलनी किया जाने लगा तथा छात्रों पर जघन्य अत्याचार किये गये। बड़े नगरों से लेकर छोटे गाँवों तक की जनता को आतंकित करने के लिए पुलिस और फौज ने काफी लूटमार की।

लोगों के घरों में आग लगा दी गयी तथा हवाई जहाज से मशीनगनों की गोलियाँ बरसायी गयीं। बच्चों को अपनी माताओं के सामने ही भून डाला गया। पटना में सचिवालय पर राष्ट्रीय झंडा लगाते समय ग्यारह छात्रों पर गोलियाँ चलायी गयीं, जिनमें सात की मृत्यु हो गयी। सरकारी सूचनाओं के अनुसार पुलिस और सेना को 538 बार गोलियाँ चलानी पड़ी, जिसमें 850 आदमी मारे गये और 1360 छात्र घायल हुए।

आन्दोलन का अन्त: सरकारी दमन चक्र का प्रभाव यह हुआ कि फरवरी, 1943 के बाद आन्दोलन की गति धीमी पड़ गयी । यद्यपि इसका वाह्य प्रदर्शन धीरे-धीरे समाप्त हो गया, फिर भी जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफअली आदि नेताओं ने छिपकर गुप्त रूप से आन्दोलन को चालू रखा। लेकिन ये लोग भी अधिक समय तक कार्य नहीं कर सके, क्योंकि ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद आन्दोलन मई 1944 ई. तक धीमी गति से चला और फिर दब गया।

असफलताओं के कारण

इस आन्दोलन को जिस उत्साह एवं जोश से चालू किया गया था, उसके अनुपात में वैसा फल नहीं मिला, क्योंकि इस आन्दोलन को सरकार ने अन्ततः दबा ही डाला। इसकी असफलता के निम्नलिखित कारण थे-



  • आन्दोलन प्रारम्भ होने के पहले ही सभी बड़े-बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। अतः आन्दोलन को योग्य नेतृत्व प्राप्त नहीं हो सका।

  • सरकार की दमन तथा कठोर नीति एवं अमानुषिक अत्याचारों के चलते आन्दोलन पनप नहीं सका।

  • आन्दोलन के लिए जिस तैयारी की आवश्यकता होती है, वह न थी, क्योंकि आन्दोलन एकाएक चालू हो गया था।

  • आन्दोलन अहिंसात्मक ढंग से चालू हुआ था, लेकिन बाद में इसने हिंसात्मक रूप धारण कर लिया। अतः, आन्दोलन प्रगति नहीं कर सका।

  • आन्दोलनकारियों को उन लोगों का सहयोग प्राप्त नहीं हो सका जो आन्दोलन की सफलता की कामना करते थे।

  • आन्दोलन में साम्यवादी दल ने धोखा दिया। इस दल ने सरकार से साँठ-गाँठ करके काँग्रेस-विरोधी भावना का प्रचार किया तथा जनता को सरकार की सहायता करने की प्रेरणा दी।

  • मुस्लिम लीग का रवैया आन्दोलन के विरुद्ध था।

  • सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारी प्रायः सभी सरकार के वफादार बने रहे।