भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेस की भूमिका

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अंग्रेज़ी तथा भारतीय भाषाओं के पत्रों ने भारतीय राजनीतिक चेतना के प्रसार-प्रचार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। 1857 के विद्रोह से लेकर भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति तक राष्ट्रीय आन्दोलन के हर चरण में भारतीय पत्रकारिता ने राजनीतिक चेतना के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया था। आधुनिक भारतीय पत्रकारिता के जनक राजा राममोहन राय की सम्बाद कौमुदी तथा अक्षय कुमार दत्त की तत्व बोधिनी पत्रिका, लोकहितवादी के पत्र हितवादी में सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की गई थी।

द्वारिकानाथ टैगोर के पत्र बैंगाल हरकारा के 1843 के अंकों में भारत में भी जनता की समस्याओं का निराकरण करने के लिए 1830 की फ्रांस की जुलाई क्रान्ति का अनुकरण करने की बात कही गई थी। स्वतंत्रता आंदोलन को सफल करने में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

उस समय पत्रकारिता को मिशन के तौर पर लिया जाता था और पत्रकारिता के माध्यम से निःस्वार्थ भाव से सेवा की जाती थी। भारत में पत्रकारिता की नींव रखने वाले अँगरेज ही थे। भारत में सबसे पहला समाचार पत्र जेम्स अगस्टस हिक्की ने वर्ष 1780 ई. में बंगाल गजट निकाला । अँगरेज होते हुए भी उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से अँगरेजी शासन की आलोचना की, जिससे परेशान गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने उन्हें प्रदत्त डाक सेवाएँ बंद कर दी और उनके पत्र प्रकाशन के अधिकार समाप्त कर दिए। उन्हें जेल में डाल दिया गया और जुर्माना लगाया गया। जेल में रहकर भी उन्होंने अपने कलम की पैनी धार को कम नहीं किया और वहीं से लिखते रहे। हिक्की ने अपना उद्देश्य घोषित किया था-अपने मन और आत्मा की स्वतंत्रता के लिए अपने शरीर को बंधन में डालने में मुझे मजा आता है।

हिक्की गजट द्वारा किए गए प्रयास के बाद भारत में कई समाचार पत्र आए जिनमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाजें उठने लगी थी। समाचार पत्रों की आवाज दबाने के लिए समय-समय पर प्रेस सेंसरशिप व अधिनियम लगाए गए लेकिन इसके बावजूद भी पत्रकारिता के उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं आया। भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1816 ई. में गंगाधर भट्टाचार्य ने बंगाल गजट का प्रकाशन किया। इसके बाद कई दैनिक, साप्ताहिक व मासिक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों की जमकर भर्त्सना की।

राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता द्वारा सामाजिक पुनर्जागरण में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ब्रामैनिकल मैगजीन के माध्यम से उन्होंने ईसाई मिशनरियों के साम्प्रदायिक षड्यंत्र का विरोध किया तो संवाद कौमुदी द्वारा उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। मीरात उल अखबार के तेजस्वी होने के कारण इसे अँग्रेज शासकों की कुदृष्टि का शिकार होना पड़ा। जेम्स बकिंघम ने वर्ष 1818 ई. में कलकत्ता कोनिकल का संपादन करते हुए अँग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की, जिससे घबराकर अँग्रेजों ने उन्हें देश निकाला दे दिया। इंगलैंड जाकर भी उन्होंने आरियेंटल हेराल्ड पत्र में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों को उजागर किया।

हिन्दी भाषा में प्रथम समाचार पत्र लाने का श्रेय पं. जुगल किशोर को जाता है। उन्होंने 1826 ई. में उदन्त मार्तण्ड पत्र निकाला और अँग्रेजों की दमनकारी नीतियों की आलोचना की। उन्हें अँग्रेजों ने प्रलोभन देने की भी कोशिश की लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए भी पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रवाद की मशाल को और तीव्र किया।

1857 की विद्रोह की ख़बरें दबाने के लिए गैगिंग एक्ट लागू किया। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के नेता अजीमुल्ला खाँ ने दिल्ली से पयामे आजादी निकाला जिसने ब्रिटिश कुशासन की जमकर आलोचना की। ब्रिटिश सरकार ने इस पत्र को बंद करने का भरसक प्रयास किया और इस अखबार की प्रति किसी के पास पाए जाने पर उसे कठोर यातनाएँ दी जाती थी। इसके बाद इण्डियन घोष, द हिन्दू, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका, द ट्रिब्यून जैसे कई समाचार पत्र सामने आए।

लोकमान्य तिलक ने पत्रकारिता के माध्यम से उग्र राष्ट्रवाद की स्थापना की। उनके समाचार पत्र मराठा और केसरी, उग्र प्रवृत्ति का जीता जागता उदाहरण हैं। गाँधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से पूरे समाज को एकजुट करने का कार्य किया और स्वाधीनता संग्राम की दिशा सुनिश्चित की। नवभारत, नवजीवन, हरिजन, हरिजन सेवक, हरिजन बंधु, यंग इंडिया, आदि समाचार पत्र गाँधीजी के विचारों के संवाहक थे।

गाँधीजी राजनीति के अलावा अन्य विषयों पर भी लिखते थे। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों को भी उजागर कर उन्हें समाप्त करने पर बल दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से प्रताप नामक पत्र निकाला जो अँग्रेजी सरकार का घोर विरोधी बन गया। अरविंद घोष ने वंदे मातरम, युगांतर, कर्मयोगी और धर्म आदि का सम्पादन किया। बाबू राव विष्णु पराड़कर ने वर्ष 1920 ई. में आज का संपादन किया जिसका उद्देश्य आजादी प्राप्त करना था।

History of India,,Indian independence movement