भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में सन् 1942 ई. के 'भारत छोड़ो आन्दोलन' का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस आन्दोलन ने ब्रिटिश सरकार को बहुत बड़ा धक्का पहुँचाया तथा ब्रिटिश सरकार यह स्पष्ट रूप से समझ गयी कि अब उसका भारतीय भूमि पर अधिक दिनों तक टिक सकना सम्भव नहीं है। क्योंकि आजादी के बावले और दीवाने भारतीय आजादी हासिल करने हेतु हर तरह की कुर्बानी देने को तैयार है। चूँकि यह आन्दोलन 1942 ई. के अगस्त महीने में हुआ था, अतः इस आन्दोलन को 'अगस्त क्रान्ति' की संज्ञा दी जाती है।
प्रो. के. वर्मा के शब्दों में- "यदि हम संसार की क्रान्तियों का अध्ययन करें तो हमें यह मालूम होता है कि वे एकाएक पैदा नहीं हो जातीं, उनके अधिकांश कारण पूर्ववर्ती होते हैं। देखने में तो ऐसा लगता है कि वातावरण शान्त है, लेकिन भीतर ही भीतर आग सुलगती रहती है और उपयुक्त अवसर पाकर वह विस्फोट की भाँति फूट कर क्रान्ति का रूप धारण कर लेती है।" सन् 1942 ई. की क्रान्ति के संदर्भ में उपर्युक्त कथन पूर्णतः सत्य है। इस क्रान्ति के भी कई पूर्ववर्ती कारण थे।
1. क्रिप्स मिशन की असफलता: क्रिप्स मिशन की असफलता अगस्त क्रान्ति की प्रमुख तात्कालिक कारण माना जाता है। वस्तुतः, क्रिप्स को भारत इसलिए नहीं भेजा गया था कि वह भारतीय समस्यओं का समाधान करे, बल्कि उसके द्वारा ब्रिटिश सरकार मित्रराष्ट्रों की आँखों में धूल झोंकना चाहती थी। युद्ध की विभीषिका को देखकर मित्रराष्ट्रों की सरकारें ब्रिटिश सरकार पर भारतीय समस्याओं के समाधान हेतु दबाव डाल रही थीं ताकि उन्हें युद्ध में भारत का पूर्ण सहयोग मिल सके। परन्तु जिस नाटकीय ढंग से क्रिप्स भारत छोड़ कर एकाएक चला गया
उससे अँगरेजों के नाटकीय स्वांग का पता तो चल ही गया, भारतवासी उसके व्यवहार से और भी क्षुब्ध हो उठे। देश में अँगरेजों के प्रति निराशा सर्वत्र व्याप्त हो गयी। संयोग से उस समय भारत की पूर्वी सीमा पर जापानी सेना बहुत तेजी से बढ़ रही थी। इस परिस्थिति में भारतीयों को अँगरेजों को सबक सिखाने का अच्छा मौका मिला तथा भारतवासियों ने अँगरेजों, 'भारत छोड़ो' के नारे से अगस्त क्रान्ति का प्रारम्भ किया।
2. युद्ध के कारण बढ़ते कष्ट से असन्तोष : द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भारतीयों के कष्ट बहुत बढ़ गये थे। चूँकि अँगरेज अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा हेतु भारत में जापान से लोहा लेने के लिए जी-जान से तैयारी कर रहे थे, अतः, युद्ध की तैयारी के नाम पर हजारों लोगों को घर से निकाल दिया गया तथा लोगों से युद्धकोष में जबर्दस्ती चन्दा लिया जाने लगा। फलतः लोगों में काफी असन्तोष फैल गया।
3. जापान की बढ़ती हुई शक्ति : ब्रिटिश सरकार युद्ध में जापान का सफलतापूर्वक सामना नहीं कर सकी। उसे मलाया, सिंगापुर, बर्मा आदि देशों से पीछे हटना पड़ा। तत्पश्चात् युद्ध में भारत को जापान से खतरा था। भारतवासी यह समझ रहे थे कि जापान के विरुद्ध भारत की रक्षा करने में ब्रिटेन समर्थ न हो सकेगा। साथ ही भारतवासियों को यह भी विश्वास था कि जापान भारत के विरुद्ध नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध कर रहा है। अतः यदि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की समाप्ति हो जायगी, तो युद्ध का संकट टल जायगा। 'भारत छोड़ो' आन्दोलन प्रारम्भ करने में भारतीय नेताओं को इस तथ्य से भी प्रेरणा मिली।
4. ब्रिटिश सरकार की घोषणा : देश में अँगरेजों के विरुद्ध वातावरण तो था ही; किन्तु अँगरेजों की 27 जुलाई 1942 ई. की यह घोषणा कि भारत को युद्ध का आधार बनाया जायगा और इसके लिए सभी सम्भव और आवश्यक कार्रवाई की जायगी, आग में घी साबित हुई। इससे अँगरेजों की मंशा और अधिक स्पष्ट हो गयी। कांग्रेस ऐसी परिस्थिति में भला कैसे चुप बैठ सकती थी? उसने गाँधीजी के नेतृत्व में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' आरम्भ करने का निश्चय किया।
भारत छोड़ो आन्दोलन असफल हो गया, परन्तु इसकी असफलता का मतलब यह नहीं कि इससे किसी प्रकार का लाभ ही नहीं हुआ। इस आन्दोलन से कई प्रकार के लाभ भी हुए- इस आन्दोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब भारत को बहुत दिनों तक अपने कब्जे में रखना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं है।
सरकार को यह पता चल गया कि भारतीयों में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक असन्तोष है तथा भारत में ब्रिटिश शासन को कायम रखने के लिए एक बहुत बड़ी फौज की आवश्यकता है, जिसके लिए अँगरेज सरकार असमर्थ थी।
आन्दोलन ने औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग को पूर्णरूप से मिट्टी में गाड़ दिया तथा भारतीय स्वतंत्रता की भूमिका तैयार कर दी।
क्रान्ति में भारतीय युवकों एवं छात्रों ने अपूर्व साहस एवं धैर्य का परिचय दिया तथा अब स्वतंत्रताप्राप्ति के लिए जेल जाना उनके लिए एक साधारण बात हो गयी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के शब्दों में- “आन्दोलन के कारण लोगों में सरकार का मुकाबला करने की हिम्मत और शक्ति बढ़ गयी।”
डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इस आन्दोलन की महत्ता प्रकट करते हुए कहा है- "इस विद्रोह की आग में औपनिवेशिक स्वराज्य की सारी बात जल गयी। भारत अब पूर्ण स्वतंत्रता से कुछ कम नहीं चाहने लगा। अँगरेजों का भारत छोड़ना निश्चित हो गया। इससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को बहुत बड़ा धक्का लगा।”
इसलिए पंडित नेहरू ने लिखा है- "सन् 1942 ई. में जो कुछ हुआ, उसके लिए मुझे गर्व है।'
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