
1905 ई. का बंग-भंग आधुनिक भारतीय इतिहास की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है। इसने हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में प्राणों का संचार किया। साम्राज्यवादी लॉर्ड कर्जन का यह सबसे काला कारनामा था। इसके द्वारा लॉर्ड कर्जन ने हिन्दू मुस्लिम फूट के बीज बोने का प्रयत्न कर राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने की चेष्टा की। भारत की जनता ने उसकी इस कुचेष्टा का जमकर विरोध किया। सारे देश में बंग-भंग आन्दोलन प्रारम्भ हुआ, जिसने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा प्रदान की। हिन्दू मुसलमान, शिक्षकों, छात्रों आदि सभी ने इसके विरुद्ध आन्दोलन चलाया।
बंग-भंग आन्दोलन अंततोगत्वा बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलन में परिणत हो गया। बंगालियों ने अनुभव किया कि संवैधानिक आन्दोलन अर्थात् भाषण, प्रेस द्वारा प्रचार, निवेदन, प्रार्थना पत्र एवं सम्मेलन आदि बेकार हैं। ब्रिटिश सरकार का विरोध बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलन द्वारा किया जाना चाहिए। बहिष्कार के मूल में आर्थिक अवधारणा है। इसके दो अर्थ हैं—प्रथम, विदेशी वस्तुओं या अँगरेजी मालों का बहिष्कार कर अँगरेजों को आर्थिक नुकसान पहुँचाना। द्वितीय, स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग द्वारा स्वदेशी उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन देना।
बहिष्कार की विचारधारा कोई नयी बात नहीं थी। पूर्व में भी अँगरेजों को सबक सिखाने के लिए मैनचेस्टर के बने हुए सूती कपड़ों के बहिष्कार की बात कही गयी थी। 1905 ई. में चीनियों ने अमेरीकी वस्तुओं का बहिष्कार किया था। सम्भवतः इससे प्रभावित होकर भारतीयों ने बहिष्कार की नीति ग्रहण की। आगे चलकर गाँधी-युग में बहिष्कार या स्वदेशी वस्तुओं का व्यवहार राष्ट्रीय आन्दोलन का एक अमोघ अस्त्र बन गया। वस्तुतः राजनीति में 19वीं शताब्दी के अंतिम भाग में ही बहिष्कार या स्वदेशी वस्तुओं का आन्दोलन शुरू हो गया था।
इसके मूल में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का व्यवहार था। बहिष्कार का अर्थ न केवल मैनचेस्टर में बने हुए सूती कपड़ों का बहिष्कार, बल्कि प्रत्येक अँगरेजी वस्तु का बहिष्कार करना था। स्वदेशी का अर्थ भारतीय वस्तुओं का व्यवहार करना था। राष्ट्रीय आन्दोलन का यह एक प्रमुख आर्थिक कार्यक्रम बन गया। 1891 ई. में काँग्रेस के नागपुर अधिवेशन में पंजाब के लाला मुरलीधर ने प्रतिनिधियों पर विदेशी वस्तुओं के व्यवहार के लिए व्यंग्य किया। उन्होंने बताया कि विदेशी वस्तुओं की खपत ने भारतीय उद्योग-धन्धों को नष्ट कर दिया है। उन्होंने परतंत्र भारत की निन्दा की और भारतीय उद्योग-धन्धों के लिए संरक्षण की माँग की। इसी तरह 1893 ई. में लाहौर अधिवेशन में पं. मदन मोहन मालवीय ने बतलाया कि विदेशी कपड़े भारत को बर्बाद कर रहे हैं। 1904 ई. में बम्बई अधिवेशन में आर. पी. करदीकर ने बताया कि किस प्रकार भारत के नवजात उद्योगों को नष्ट किया जा रहा है।
एक ओर ब्रिटिश उद्योगपतियों और ब्रिटिश शासकों तथा दूसरी ओर भारतीय उद्योगपतियों और आम भारतवासियों के बीच बढ़ते अन्तर्विरोध के कारण भारत में स्वदेशी आन्दोलन चल पड़ा। यह राष्ट्रीय आन्दोलन का एक अभिन्न अंग बन गया। नवोदित मध्यम वर्ग इस आन्दोलन का नेता बनकर सामने आया और उसने स्वदेशी वस्तुओं का व्यवहार और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का नारा बुलन्द किया। स्वदेशी उद्योग-धन्धे तथा कला-कौशल को प्रोत्साहन दिया गया। नवोदित पूँजीपति वर्ग के समाचारपत्रों ने आर्थिक दुर्दशा के लिए देश की आर्थिक नीतियों को जिम्मेवार बताया। देश की आर्थिक दुर्दशा पर आँसू बहाकर स्वदेशी वस्तुओं के व्यवहार की अपील की गयी और ब्रिटिश शासकों से भारतीय उद्योग-धन्धों की रक्षा के लिए कानूनी कार्यवाही की माँग की गयी।
19वीं शताब्दी में बंगाल के राजनारायण बसु तथा नंदगोपाल पिंग, पंजाब के रामसिंह कूका, बम्बई के वासुदेव जोशी तथा हिन्दीभाषी क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने कार्यक्रमों के द्वारा स्वदेशी आन्दोलनों को आगे बढ़ाया।
प्रारम्भ में तो केवल मैनचेस्टर की सूती मिलों में बने कपड़ों का बहिष्कार किया गया, किन्तु बाद में हर अँगरेजी माल के बहिष्कार की नीति अपनायी गयी। नमक, चीनी, एवं विलासमयी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। भारत में पाया जानेवाला सेंधा नमक, यहाँ के देहातों में बने गुड़ या चीनी तथा अन्य देशी चीजों की माँग बढ़ गयी। किन्तु देशी सूती कपड़ों की आपूर्ति माँग की तुलना में कम हो जाती थी। अतः बम्बई और अहमदाबाद की सूती मिलों में उत्पादन बढ़ा दिया गया। बम्बई के देशी उद्योगपतियों ने स्वदेशी आन्दोलन से काफी मुनाफा कमाया। बंगाल की दस्तकारी तथा कुटीर उद्योगों एवं हस्तकरघे को पुनर्जीवित किया गया।
बंग-भंग आन्दोलन ने तो बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। अनेक समितियाँ गठित की गयीं जिसमें अधिकांश विद्यार्थी थे। कलकत्ता और पूरे बंगाल में इस तरह की समितियों का जाल बिछ गया। इनका एक ही उद्देश्य था-बहिष्कार आन्दोलन। इस आन्दोलन में सभी का सहयोग और सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयास किया गया। न केवल जमींदार, वकील, छात्र, नौजवान, किसान एवं दुकानदार, अपितु डॉक्टर, देशी सेना, ब्राह्मण, पुरोहित, नाई, धोबी आदि सभी ने बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया
लोगों की धार्मिक भावना भी उभारी गयी। प्रचार किया गया कि विदेशी नमक और चीनी को सूअर और गाय की हड्डी से साफ किया जाता है। बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलन को जारी रखने के लिए अनेक तरीके अपनाये गये। समाचारपत्र, जुलूस, लोकगीत, स्वयंसेवकों की भर्ती, विदेशी वस्तुओं का होलिका-दहन आदि अनेक साधन अपनाये गये।
बहिष्कार आन्दोलन को सफल बनाने के लिए अन्य तरीके भी अपनाये गये। बांकुड़ा के मिठाई बनाने वालों ने घोषणा की कि यदि उनमें से कोई मिठाई बनाने के लिए विदेशी चीनी का प्रयोग करेगा, तो उसे एक सौ रुपये जुर्माना देना पड़ेगा। वीरभूम में सुरी बाजार के सभी विदेशी सिगरेट खरीदकर गलियों में जला डाले गये। ब्राह्मणों ने एक सभा करके विदेशी नमक और चीनी का प्रयोग करने वालों के यहाँ पूजापाठ नहीं करने का एलान किया। दीनाजपुर में डॉक्टर, वकील, मुख्तार आदि ने वहाँ के मारवाड़ियों के लिए काम बन्द करने की धमकी दी, यदि वे विदेशी वस्तुओं का आयात करेंगे। जलपाईगुड़ी में छात्रों ने सिगरेट, क्रिकेट के बल्लों, फुटबॉल, कपड़े एवं यहाँ तक कि कर्जन के पुतले भी जलाये । विदेशी वस्त्र बेचने वाले दुकानदारों की दुकानों पर धरना दिया जाने लगा। शांतिपूर्वक धरना देने की यह शुरूआत थी, जो कालान्तर में राजनीतिक आन्दोलन का एक महत्त्वपूर्ण अस्त्र बन गया।
विदेशी माल के बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन को कुचलने के लिए सरकार ने दमनकारी नीति का सहारा लिया। घरना देने के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई की गयी। धरना देने वाले विद्यार्थियों को पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटा गया, उन्हें कोड़े लगाये गये, अर्थदण्ड दिया गया तथा कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों से निष्कासित किया गया। देहातों में जमींदारों को ब्रिटिश सरकार ने इस बात के लिए दबाव डाला कि वे बाजारों का नियंत्रण कर बहिष्कार आन्दोलन को असफल बनावें। मुसलमानों को भी धरना देने वालों के विरुद्ध प्रोत्साहित किया गया। इस प्रकार सरकार ने हर सम्भव प्रयास से बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन को कुचलना चाहा।
किन्तु ब्रिटिश सरकार की दमनात्मक कार्रवाइयों ने आन्दोलन को और भी उग्र बना दिया। उन्होंने बहिष्कार को सफल बनाने तथा उसे तीव्रतर करने के लिए चार सूत्री कार्यक्रम निश्चित किया।
बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन के निम्नलिखित परिणाम हुए-
1. आन्दोलन का दमन : बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन से ब्रिटिश सरकार को बहुत नुकसान हो रहा था। अतः इसे कुचलने के लिए सरकार ने अनेक हथकंडे अपनाये, जैसे - लाठीचार्ज, आपराधिक अभियोग, बंदी बनाना, छात्रों को कोड़ों से पीटना, उनके अभिभावकों को दंडित करना, छात्रों को शिक्षण संस्थाओं से निष्कासित करना इत्यादि
2. मुक्ति युद्ध : बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन का उद्देश्य वृहत् और व्यापक बन गया। कालान्तर में इसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लोहा लेना बन गया। अतः इसने व्यापक राष्ट्रीय आन्दोलन या मुक्ति युद्ध का रूप धारण कर लिया।
3. राष्ट्रीयता : इस आन्दोलन के फलस्वरूप लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई। उनमें राजनीतिक जागरण एवं देश-भक्ति की भावना आयो । तत्कालीन साहित्य, उपन्यास, नाटक, कहानियों एवं कविताओं में राष्ट्रीयता की पूर्ण अभिव्यक्ति हुई।
4. उग्रवाद : कुछ आन्दोलनकारियों ने यह सोचना शुरू किया कि ब्रिटिश सरकार की पाश्विक शक्ति का सामना सत्याग्रह या अहिंसात्मक साधनों से सम्भव नहीं है। बल का सामना बल से होना चाहिए। अतः उग्रपंथियों ने हिंसात्मक साधनों के प्रयोग पर जोर दिया। गुप्त क्रांतिकारी संगठनों का निर्माण किया जाने लगा। भारतीय राजनीति में उग्रवाद और आतंकवादियों का आगमन हुआ।
5. राजद्रोह : बंगाल के लोगों और सरकार के बीच जो मुठभेड़ हुई, उसका भारत के दूसरे भागों पर प्रभाव पड़ा। ब्रिटिश राज के उन्मूलन के लिए षड्यंत्र और कुचक्र का सहारा लिया जाना अनिवार्य हो गया। लोग राजद्रोही बन गये। छात्र भी हत्या की राजनीति में अन्तर्लिप्त हो गये।
6. ब्रिटिश माल के आयात में कमी : आन्दोलन के फलस्वरूप भारत में ब्रिटिश माल की खपत बहुत कम हो गयी। बाजार की हालत बहुत खराब हो गयी। कोई भी आदमी अँगरेजी कपड़ा नहीं खरीदना चाहता था। बंग-भंग के बाद ब्रिटिश माल की खपत और भी कम हो गयी।
7. स्वदेशी वस्तुओं की खपत में वृद्धि : इस आन्दोलन के फलस्वरूप नमक, गुड़ आदि की माँग अधिक होने लगी। फलतः गृह उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन मिला। अहमदाबाद तथा बम्बई की सूती मिलों के उद्योगपतियों ने बड़ा मुनाफा कमाया।
8. राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना : बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन की जान छात्र एवं नवयुवक थे। अतः सरकार ने उन्हें इस आन्दोलन से अलग रखने के लिए कदम उठाया। सरकार ने शिक्षा विभाग का पूरा इस्तेमाल छात्रों को बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन से दूर रखने के लिए किया। शिक्षण संस्थाओं को सरकारी सहायता रोकने की चेतावनी दी गयी तथा अनेक छात्र और शिक्षक शिक्षण संस्थाओं से निकाल बाहर किये गये।
आन्दोलनकारियों ने इसका जवाब विदेशी शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार एवं स्वदेशी या राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना से दिया। राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् (National Council of Education) की स्थापना की बात कही गयी तथा राष्ट्रीय शिक्षा की आवश्यकता महसूस की गयी। परिणामस्वरूप बंगाल में अनेक राष्ट्रीय स्कूल एवं कॉलेज स्थापित किये गये। बंगाल के बाहर बम्बई, पूना, मछलीपट्टम, संयुक्त प्रदेश आदि में राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना जोर-शोर से होने लगी। 1906 में कलकत्ता में काँग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना सम्बन्धी एक प्रस्ताव पेश करते हुए हिरेन्द्रनाथ दत्त ने कहा था, "मैं सोचता हूँ कि स्वदेशी एक त्रिमुखाकृति देवी है। इसका एक मुख राजनीतिक, दूसरा आर्थिक एवं तीसरा शैक्षिक है।"
9. स्वदेशी आन्दोलन देशव्यापी हो गया : बंगाल से प्रारम्भ होकर स्वदेशी -आन्दोलन देश के एक बड़े हिस्से में फैल गया। संयुक्त प्रदेश, मध्यप्रदेश, बम्बई महाप्रान्त पंजाब एवं मद्रास प्रान्त के सभी बड़े शहरों में फैल गया। इसने आखिल भारतीय आन्दोलन का रूप धारण कर लिया और इसकी गूँज चारों दिशाओं में सुनाई पड़ने लगी। "Boycot and Swadeshi Movement assumed an all India character even towards, the end of 1905."
10. आतंक का राज : स्वदेशी आन्दोलन को दबाने के लिए सरकार ने दमनात्मक उपायों का सहारा लिया। अँगरेजों ने बंगाल एवं असम में वस्तुतः आतंक का राज कायम कर दिया था। लोगों को स्वदेशी वस्तुओं के बेचने की मनाही तथा ब्रिटिश माल बेचने के लिए बाध्य किया गया।
11. काँग्रेस में फूट : बंग-भंग से उत्पन्न परिस्थिति का एक प्रत्यक्ष परिणाम यह हुआ कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अन्दर उग्रवादियों और उदारवादियों के बीच मतभेद और विरोध तीव्र हो गया और 1907 ई. में कॉंग्रेस के दो टुकड़े हो गये। इन दोनों ने अलग-अलग रास्तों पर चलना प्रारम्भ किया और 9 वर्षों तक वे अलग-अलग चलते रहे
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