धर्म सुधार आंदोलन

15वीं शताब्दी के पूर्व प्राचीन धर्म में व्याप्त बुराइयों एवं कर्मकांडों के प्रति था। दरअसल चर्च ने जनमानस को विभिन्न प्रकार के क्रमकांडों से जकड़ रखा था जिसे बाद में कुछ बुद्धिजीवों द्वारा प्रकाश में लाकर उसे समाप्त किया गया इसी को हम "धर्म सुधार आंदोलन" के नाम से जानते हैं

इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य धार्मिक अनुष्ठान रीति-रिवाज और सामाजिक न्याय से होता है इसके अंतर्गत लोग अक्सर असामाजिक या अनैतिक मान्यताओं के खिलाफ और तथ्यों के द्वारा समाज को बताने का प्रयास करते हैं। धर्म सुधार आंदोलन का शुरुआत 1517 में जर्मनी में रहने वाले "मार्टिंग लूथर" के नेतृत्व में हुई थी इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ईसाई लोगों के नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन को पुन: समुनत करना तथा रोम के पोप के व्यापक धर्म संबंधित अधिकारों को नष्ट करना था।

धर्म सुधार आंदोलन के कारण

यूरोप में धर्म सुधार आंदोलन के मुख्य निम्नलिखित कारण थे -

पुनर्जागरण

पुनर्जागरण से पूर्व यूरोप पर कैथोलिक चर्च का एकमात्र साम्राज्य कायम था व्यक्ति जान्म से लेकर मरण तक चर्च से नियंत्रित रहता था चर्च का संगठन मजबूत होने से चर्च का विरोध मुश्किल था चर्च का प्रभाव इतना अधिक था कि चर्च भी जन लोगों से कर (Text) वसूल करते थे। इतना ही नहीं सम्राटों को भी पोप के सामने झुकना पड़ता था सारा साम्राज्य या समाज धर्म केंद्रित, धर्म प्रेरित और धर्म नियंत्रित था।

16वीं शताब्दी आते-आते यह अधिकार बिखरने लगा क्योंकि पुनर्जागरण ने जो चेतना पैदा की, जिसने चर्च की मान्यता धुमिल होने लगी लोग अब तर्कवादी हो गए। अब वे अपर्याप्त प्रमाण के अभाव में किसी सिद्धांत अथवा बात को स्वीकार करने के लिए तैयार न थे "छापाखाना" के आविष्कार ने जन लोगों को जागृत करने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धर्म निरपेक्ष के अध्ययन से ईसाई धर्म की बुराइयां दिखने लगी एवं बाइबल की सामान्य भाषा में अनुवाद होने से जनमानस ने धर्म के मूल को समझने लगे।

बहुत से विद्वान जो इटली गए थे इन्होंने पोप के बुराइयों को देखा तथा वह पुनः यूरोप जाकर पोप एवं धर्म में व्याप्त बुराइयों को जनता के समक्ष रखा इस प्रकार पुनर्जागरण ने धर्म सुधार आंदोलन का मार्ग प्रस्तुत किया।

धार्मिक कारण

15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में रोमन कैथोलिक चर्च के अंतर्गत अनेक दोष वह बुराइयों का समावेश हो गया था। वह अपनी असीमित शक्तियों व अधिकारों के अहंकार में अंधा होकर पथभ्रष्ट हो गया था। वह इसका दुरुपयोग करने लगा, कैथोलिक चर्च को पवित्र और धार्मिक चिंतन का केंद्र माना जाता था किंतु चर्च भ्रष्टाचार व दुराचार का केंद्र बन चुका था।

पोप का अनेक विशेषाधिकार के पद की भी खरीद-बिक्री होने लगा था जिसके कारण लाखों डॉलर पोप के पास जमा हो गया था और कोई भी व्यक्ति पैसा देकर चर्च के कानूनी प्रतिबंधों से आजाद हो जाता था इसी कारण लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। जहां योग्यता की वजह से पैसा यानी धन स्थान ले चुका था। इसी प्रकार चर्च एवं पोप के सभी अधिकारी भ्रष्ट हो चुके थे चर्च का समस्त वातावरण दूषित हो गया था।

राजनीतिक कारण

यद्यपि इस आंदोलन का शुरुआत धार्मिक आंदोलन के रूप में हुआ था तथापि इस आंदोलन के राजनीतिक स्वरूप को भी नकारा नहीं जा सकता। 16वीं शताब्दी के शुरुआत में कैथोलिक चर्च धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ राजनीतिक संस्थाओं के रूप में भी परिवर्तन हो चुका था। चर्च का अपना स्वतंत्र अस्तित्व था, जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि चर्च के पास अपार धन आने की वजह से वह राजा को भी अपने से अधीन समझने लगे थे और शासन एवं चर्च के बीच आपस में संघर्ष भी होता रहता था।

चर्च भी न्याय संबंधी समस्याओं का निपटारा करने लगी थी और प्रत्योक चर्च का एक राजा भी हुआ करता थे, जो बिलासपूर्ण जीवन व्यतीत करने लग गए थे और राजनीतिक शक्तियां भी अपने अधीन कर रखी थी।

पूंजीवादी भावना का उदय

पूंजीवादी भावना के फल स्वरुप कैथोलिक चर्च में भयंकर आर्थिक दोष्त उत्पन्न हो गया था। चर्च के अधिकारी चर्च में मौजूद धन को अपना व्यक्तिगत अधिकार समझने लगे थे और उन्होंने विभिन्न प्रकार के कर एवं अंधविश्वास से अधिक धन अर्जित कर लिए थे। लेकिन चर्च का सिद्धांत यह था कि चर्च के धन को जनलोगों के उपयोग के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। परंतु उन्होंने इसका विपरीत किया। जिसके फलस्वरुप लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया और इस आंदोलन को प्रारंभ करने का निश्चय किया। धर्म सुधार आंदोलन इसी निश्चय का परिणाम है।

बौद्धिक जागरण

धर्म सुधार आंदोलन का प्रमुख पक्ष इतिहासकारों को जाता है क्योंकि इन्होंने अपने लेखन की माध्यम से चर्च तथा पोप के बुराइयों को जन-समाज के सामने लाएं। इरास्मस, थॉमस मूर, जॉन कालेट आदि ने अपनी रचनाओं के माध्यम से चर्च की कुरीतियों को प्रकाश में लाये।

धर्म सुधार आंदोलन के प्रति बौद्धिक जागरण के योगदान की चर्चा करते हुए इतिहासकार H.A.L फिशर ने लिखा हैं। -"16वीं शताब्दी का बौद्धिक जागरण यद्यपि प्रोटेस्टेंट आंदोलन से भिन था तथापि यह धर्म सुधार आंदोलन अथवा प्रोटेस्टेंट आंदोलन के अनेक कारणों में से एक था। नवीन जागरण ने रोमन चर्च के अनुमोदित विश्वासो, अधिकारों एवं रीति-रिवाज के प्रति लोगों को परंपरागत श्रद्धा को कम कर दिया। जनता में प्राचीन अनुशासन के प्रति प्रतिक्रिया हुई चिंतन तथा प्रतिबंध समाप्त हुए। संदेह आलोचना तथा विद्रोह की हजारों पृथक छोटे-छोटे धाराएं जो पीडिया से एकत्रित हो रही थी अकस्मात मिलकर एक विरोध रूपी नदी की भांति बहने लगी। यूरोप में एक प्रगतिशील बौद्धिक जागृति का उदय हुआ जिसने परंपरागत ज्ञान तथा पुराने दोष और अंधविश्वासों का परिहास एवं निंदा करते हुए उन्होंने चुनौती दी।"

चर्च में फूट

15वीं शताब्दी में चर्च के आंतरिक विवादों ने भी चर्च के महत्व को गिरा दिया। अब एक पोप की बजाय दो पोप की नियुक्ति की जाने लगी। एक फ्रांस द्वारा तो दूसरा इटली द्वारा इस दौरान चर्च एवं पाप की प्रतिष्ठा एवं उनके प्रति श्रद्धा कम होती चली गई। आगे चलकर और स्थिति खराब हो गई। अतः 1409 ईस्वी में संयुक्त सभा के प्रधान ने तीसरे पोप को भी नियुक्ति कर दी यह घटना पश्चिम की "महान फुट" के नाम से जाना जाता है।

तात्कालिक कारण

धर्म सुधार आंदोलन के तात्कालिक कारण खुले आम लोगों में "क्षमापत्रों" की बिक्री था। जब मार्टिंग लूथर ने 1511 में रोम की यात्रा पर गया तो उसने चर्च की व्यापक भ्रष्टाचार को देखा। इस समय पोप ने क्षमापत्र निकाला जिसके तहत लोग पैसों से वह अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए क्षमापत्र खरीदते। जिससे उन्हें सभी तरह के पाप से मुक्ति हो सकते थे क्योंकि पोप ने उन्हें विश्वास दिला दिया था कि अगर वह इस क्षमापत्र को खरीदने हैं तो उन्हें नर्क में नहीं जाना पड़ेगा। अपितु उन्हें स्वर्ग प्राप्त होगा और इस क्षमापत्रों का मूल्य निर्धारण नहीं किया गया। इसका मूल्य खरीदने वाले की हैसियत पर निर्भर करती थी।

जब इन क्षमता पत्रों की खुले आम बिक्री होने लगा तो मार्टिंग लूथर ने इस प्रथा का विरोध करने का संकल्प लिया और विटेनबर्ग चर्च की दीवारों पर 95 थीसिस चिपका दी। इन थीसिस के द्वारा उसने मुक्ति पत्र ( क्षमापत्र ) के औचिल्य की चुनौती दी और इस प्रकार उसने धर्म सुधार आंदोलन का झंडा गढ़ दिया।

धर्म सुधार आंदोलन के स्वरूप

जब पोप या चर्च ने लोगों को अपने बस में पूरी तरह जकड़ रखा था इस बीच अनेक बुद्धिजीवी लोग प्रकाश में आए क्योंकि पुनर्जागरण में एक नवीन चेतना का विकास हुआ। लोगों "मानो तब जनो के जगह अब जानो तब मानो में विश्वास रखने लगे। इसी बीच कैथोलिक चर्च भी अपने अस्तित्व के लिए चिंता करने लगे तथा नए-नए प्रकार के व्यवस्था बनाने लगे। इसी बीच उन्होंने क्षमापत्र निकला यह फैसला उन्हें भारी पड़ा। क्योंकि सब अब तर्कपूर्ण बातों में विश्वास करने लगे थे इसी बीच कई बुद्धिजीवी लोगो ने इसका विरोध करना प्रारंभ कर दिया और अनेक समूह का निर्माण किया इसी कड़ी में मार्टिंग लूथर जैसे सुधारक प्रकाश में आए। जिन्होंने लोगो को चर्च के कुरीतियों को बताया और यहीं से धर्म सुधार आंदोलन के पृष्ठभूमि तैयार हो गया।

इस आंदोलन के कुछ अग्रदूत जॉन वाइक्लिफ(1330-1384), जॉन हस(1369-1415 ), सेवोनारोला तथा इरेस्मस प्रमुख है।

जॉन वाइक्लिफ (1330-1384) : यह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक थे एडवर्ड iii के समय इसने अनेक गिरजाघर के विरोध आवाज़ उठाएं और उसने धर्म में व्याप्त कृतियों को जनमानस के बीच रखा और कहा -

  • पोप पृथ्वी पर ईश्वर के प्रतिनिधि नहीं तथा भ्रष्ट एवं विवेकहीं पादरियों द्वारा दिए जाने वाले धार्मिक उपदेश व्यर्थ हैं।

  • प्रत्योक ईसाइयों को बाइबल के अनुसार कार्य करना चाहिए ना कि चर्च और पादरी के मुताबिक।

  • उसने मांग की की चर्च की विपुल धन संपत्ति पर राज्य को अधिकार कर लेना चाहिए।

  • वह जनसाधारण भाषा में धार्मिक ग्रंथो के अनुवाद के पक्ष में था। वह अनुवाद पर जोर दिया क्योंकि कैथोलिक चर्च की भाषा लैटिन भाषा में होता था। जिससे लोग समझ नहीं पाते थे वाइक्लिफ की प्रेरणा से ही बाइबल का अंग्रेज़ी अनुवाद हुआ। यह अनुवाद से लोगों ने चर्च के दोषपूर्ण कार्यों को समझा इसी वजह से वाइक्लिफ "The Morning Of Reformation" को कहा जाता है

इस प्रकार हम देखते हैं जब लोगों ने पोप तथा चर्च के दुर्व्यवस्था तथा अन्यायपूर्ण व्यवस्था को समझा तो वे इसका विरोध करना शुरू कर दिया। तथा मार्टिन लूथर के सहयोग से विद्रोह शुरू कर दिए तत्यपश्चात धर्म में व्याप्त कृतियों में सुधार किया गया।

धर्म सुधार आंदोलन का महत्व एवं परिणाम

यूरोप के इतिहास में धर्म सुधार आंदोलन का बड़ा महत्व है। इसने सामाजिक राजनीतिक आर्थिक धार्मिक व सांस्कृतिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। यूरोप में आधुनिकीकरण को तेज देने वाले कारण में से एक था। यदि हम 1517 से 1618 के समय के अध्ययन करें तो पाते हैं की धार्मिक आंदोलन का निम्नलिखित परिणाम मिलते हैं। -

  • धर्म सुधार आंदोलन के फल स्वरुप पूरा यूरोप समाज दो भागों में बट गया था। उत्तरी यूरोप में लूथर ने धर्म में परिवर्तन कर उसका नाम "प्रोटेस्टेंट" तथा दक्षिण और पश्चिमी यूरोप में पूर्णत: कैथोलिक बना रहा अपितु प्रोटेस्टेंट तथा कैथोलिक के बीच संघर्ष चलता रहा। 30 वर्षों तक प्रोटेस्टेंट को दबाने का प्रयास किया जाता रहा। वस्तुत: 1550 ईस्वी में असवर्ग में समझौता हुआ प्रस्ताव स्वीकृत किया गया लूथर के लूथारवादी धर्म और रोमन कैथोलिक धर्म को छोड़कर अन्य कोई धर्म नहीं बना सकता। अब पोप तथा चर्च जनता के समक्ष कार्य करने लगी।

  • धर्म सुधार आंदोलन से पोप तथा चर्च की शक्ति कम हो गई। अब शासको द्वारा चर्च के कब्जे हिस्सों पर कब्जा किया जाने लगे। इंग्लैंड,स्वीडन, हॉलैंड आदि देशों में राजतंत्र का उद्भव को देखा जा सकता है।

  • रोमन कैथोलिक चर्च ने वाणिज्य व्यापार की विरुद्ध थी। उन्हें लगता था कि उनकी विकास हमारी संकट का कारण बन सकता था और वह लोगों को अपने जाल में फंसाए रखते थे। परंतु जब प्रोटेस्टेंट ने कहा कि जो लोग धन प्राप्त करने का अवसर से लाभ नहीं उठाते है। वे ईश्वर की सेवा नहीं करते हैं। इस प्रकार प्रोटेस्टेंट के द्वारा कठोर श्रम पर जोड़ दिया गया और इसी मनोभाव ने वाणिज्य-व्यापार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  • धर्म सुधार आंदोलन के बाद शिक्षा व कानून के क्षेत्र में अधिक बल दिया जाने लगा। लोग अपने बच्चों को शिक्षा देने में अधिक दिलचस्पी लेने लगे उनको लगने लगा था अगर वह पढ़ेंगे तभी वह अपना जीवन सुखद व्यतीत करेंगे। इसके साथ-साथ न्याय में भी कई तरह का सुधार किया गया अब वह धन से अपने सजावो को माफ या काम नहीं करवा सकते थे। और उन्हें सामान्य भाषा में न्याय की बातों से परिचित होने लगे। जिससे वह सभी तरह के सजावो और गुनाहों को जाने लगे। अब पीड़ित व्यक्ति को भी अपना पक्ष रखने का आज्ञा दी जाने लगी

  • विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में भी अभूपूर्ण प्रगति हुई इसका मुख्य कारण -

    1. प्रोटेस्टेंट धर्म मनुष्य को धार्मिक नियंत्रण से मुक्त कर स्वतंत्र रूप से विचार का अवसर प्रदान किया।

    2. तर्कवाद से बौद्धिक विकास हुआ।

    3. दार्शनिकों को विचारों में परिवर्तन आया और वह भविष्य के विषय में सोचने लगे।

    भौतिकी के क्षेत्र में गिल्वर्ट ने चुंबकीय गुणधर्म के विकास एवं अध्ययन से इसने विद्युत शक्ति को अविष्कार का मार्ग प्रस्तुत किया।

मूल्यांकन

धर्म सुधार आंदोलन आधुनिकरण में बहुत बड़ा योगदान दिया। वस्तुत जब वह पोप या चर्च के अधिकारी अपने भोग विलास जीवन के लिए लोगों को मूर्ख बनाकर धन अर्जित कर रहे थे। और लोगों को अपने बस में किए हुए थे। जिसके वजह से कला, व्यापार आदि का विकास धीमी गति हो गई थी। अपितु जब लोगो ने इस दुनिया से बाहर निकाला तो एक अलग अंदाज में विकास होने लगा। क्योंकि उन्होंने बाइबल और तर्कपूर्ण बातों को मनाना चालू कर दिया था। अब वह अपने आप के कामों पर विश्वास करने लगे अब उन्हें ईश्वर की बीमारी या और कोई कार्यों में रुकावट को अपनी नई सोच से प्राकृतिक समस्या समझाने लगे तथा इसकी समाधान ढूंढने लगे।

इस प्रकार धर्म सुधार आंदोलन ने यूरोप में एक नई चेतना को जन्म दिया जिसके फल स्वरुप यूरोप ने मध्य युग से आधुनिक युग की ओर कदम बढ़ाया।