1917 ई. के क्रांति के फलस्वरूपप रूस में करेन्स्की की सरकार का पतन और लेनिन के नेतृत्त्व में बोल्शेविक सत्ता की स्थापना आधुनिक युग की एक महान घटना थी। इसके अत्यंत दूरगामी परिणाम हुए तथा विश्व इतिहास में इसे महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में विशिष्ट स्थान प्राप्त है।
सत्ताग्रहण के पूर्व क्रान्ति-काल में लेनिन ने शांति, भूमि एवं रोटी का नारा दिया था। अतः क्रांति के पश्चात् रूसी जनता एवं सेना को युद्ध की विभीषिका से मुक्त कराने के लिए तथा क्रांति को सुदृढ़ करने के लिए लेनिन ने विश्वयुद्ध से रूस को अलग करने का निश्चय किया। बोल्शेविक सरकार ने 3 मार्च 1918 ई. को जर्मनी के साथ ब्रेस्टलिटोवस्क (Brestlitovsk) की संधि की। इसके अनुसार रूस को यूरोपीय प्रदेशों के चौथाई भाग-पौलेण्ड, लिथुआनिया, स्टोनिया, लैटेविया और फिनलैण्ड के प्रदेश से अपना दावा छोड़ना पड़ा। तुर्की साम्राज्य पर से भी रूस को अपने सारे अधिकारों का परित्याग करना पड़ा।
लेनिन ने अपने दो अन्य नारे-भूमि और राटी, को पूर्ण करने की दिशा में अगला कदम उठाया। क्रांति को सुदृढ़ करने के लिए क्रांति के मुख्य भागीदारों अर्थात् किसान, श्रमिक एवं रूसी सैनिकों की आकांक्षाओं को पूर्ण करना आवश्यक था। युद्ध का अन्त कर बोल्शेविक सरकार ने जनता को शांति तो दीदी, किन्तु उसकी क्षुधा की तृप्ति करना अगला तार्किक कदम था। अतः नयी सरकार ने भूमि के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की। भूमि पर से निजी स्वामित्व को समाप्त कर उन्हें जमींदारों से छीन लिया गया और गरीब किसानों में बाँट दिया गया।
इसके साथ ही साथ निजी कारखानों का भी अधिग्रहण कर लिया गया तथा उसका प्रबन्ध श्रमिकों को सौंप दिया गया। इस प्रकार रेलवे, बैंक, खान तथा अन्य उद्योग-धन्धों पर नई सरकार का अधिकार स्थापित हो गया। बोल्शेविक सरकार के बिना कोई मुआवजा चुकाये चर्च की सम्पूर्ण सम्पति पर कब्जा कर लिया।
युद्धकाल में तथा युद्ध से पूर्व रूस की जारशाही सरकार ने देशी पूँजीपतियों तथा विदेशों से जितने ऋण लिये थे, उसे बोल्शेविक सरकार से मान्यता प्रदान नहीं की तथा चुकाने से इन्कार कर दिया। नये शासन के प्रबन्ध के लिए निष्ठावान तथा विश्वसनीय पदाधिकारियों को रखा गया, साथ ही पार्टी के सदस्यों को भी बिना उनकी योग्यता पर विचार किये शासन के उच्च पदों पर भी नियुक्त किया गया।
बोल्शेविक क्रांति यद्यपि सफल हो गयी, किन्तु नई सरकार की नीति एवं कार्यों के फलस्वरूप आन्तरिक विद्रोह एवं बाह्य आक्रमण की स्थिति पैदा हो गयी। नई सरकार की पूँजीवाद विरोधी नीति ने उसे यूरोप के पूँजीवादी राष्ट्रों की आँखों का काँटा बना दिया। अतः 1919 ई. में यूरोप के अनेक राष्ट्रों ने मिलकर रूस पर आक्रमण कर दिया।
रूस के प्रतिक्रियावादी तत्त्व, जार के समर्थक, जमीन्दारों एवं सामन्तों, पूँजीपतियों एवं पादरियों ने आक्रमणकारियों की सहायता की। रूस की नवगठित सरकार के लिए निश्चय ही यह गम्भीर संकट की घड़ी थी। किन्तु रूस के सौभाग्य से उसके शत्रु देश विश्वयुद्ध से लड़ते हुए इतने थक एवं पस्त हो गये कि वे पूरी शक्ति से रूस पर आक्रमण नहीं कर सके।
लेनिन के नेतृत्त्व में बोल्शेविक सरकार ने दृढ़ता से इन आन्तरिक एवं बाह्य शत्रुओं का सामना किया। बाह्य आक्रमणकारियों से निबटने के लिए ट्राटस्की एवं स्टालिन के नेतृत्त्व में लाल सेना (Red Army) का गठन किया गया, तथा आन्तरिक शत्रुओं का सामना करने के लिए "चेका" नामक पुलिस संगठन का जन्म हुआ। ट्राटस्की एवं स्टालिन के नेतृत्त्व में लाल सेना ने 1920 ई. तक बाह्य शत्रुओं को मार भगाया। विदेशी राष्ट्रों को रूस के विरूद्ध नाकाबन्दी को समाप्त करना पड़ा। 1922 ई. को जापान साइबेरिया से हट गया। 1924 ई. तक इटली जर्मनी एवं इंगलैण्ड ने रूस की नई सरकार को मान्यता प्रदान की।
देश के अन्दर के दुश्मनों के साथ भी बोल्शेविक सरकार बड़ी सख्ती से पेश आयी। बोल्शेविक सत्ता के विरूद्ध बगावत को बहुत क्रूरतापूर्वक दबा दिया गया। क्रांति की रक्षा के लिये नये पुलिस संगठन “चेका" ने देश में आतंक का राज्य कायम कर दिया। 1918 एवं 1922 ई. के बीच लगभग तेहर हजार व्यक्तियों की क्रांति-विरोधी होने के आरोप में फाँसी पर लटका दिया गया। लेनिन ने सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना के लिए खून की नदी बहाने से कोई परहेज न थी। नई सरकार के ये कार्य इतिहास में "लाल आंतक" (Red Terror) के नाम से विख्यात हैं।
विश्वयुद्ध में पराजय के कारण अपार धन-जन की क्षति एवं क्रांति के पश्चात् विदेशी आक्रमण तथा आन्तरिक विद्रोहों ने रूस की आर्थिक स्थिति को अत्यन्त जर्जर कर दिया था। अतः नई सरकार के समक्ष सबसे बड़ा संकट अर्थ का था। नई सरकार की राष्ट्रीयकरण की नीति का एक बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ कि खेतों एवं कारखानों में उत्पादन पहले की अपेक्षा घट गया।
नई सरकार ने इस व्यवस्था में परिवर्तन करना आवश्यक समझा। लेनिन एक यथार्थवादी एवं दूरदर्शी प्रशासक था। अतः उसने नई व्यवस्था में कुछ पूँजीवादी तत्त्वों को अपनाने की चेष्टा की। उसने अपनी नई आर्थिक नीति (New Economic Policy) को घोषणा की। इसके द्वारा आर्थिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाये गये।
पहले किसानों को उनकी आवश्यकता के अनुसार अनाज देकर बाकी अनाज ले लिया जाता था। उन्हें अनाज बेचने की आज्ञा नहीं थी। अब उन्हें आवश्यकता से अधिक बचे हुए अनाज को मंडी में बेचने की स्वतंत्रता दी गयी। इससे किसानों को अधिक उत्पादन की प्रेरणा मिली। उन्हें अब सरकार को कर देना पड़ता था।
औद्योगिक क्षेत्र में भी सरकार ने छोटे-कारखानों के प्रबन्धन एवं नियंत्रण से हाथ खींच लिया। उनका नियंत्रण अब केवल बड़े कारखानों पर ही रहा। देश में पूँजी का आमंत्रित किया गया। मुद्रा का पुनः प्रचलन किया गया।
इस नई आर्थिक नीति के परिणामस्वरूप आर्थिक अवस्था में पहले की अपेक्षा काफी सुधार हुआ। लेकिन लेनिन का यह एक अस्थाई प्रयोग था। बाद में जब सरकार की स्थिति सुदृढ़ हो गयी तो लेनिन ने मध्यम वर्ग के पूँजीपतियों एवं किसानों के उत्पादन पर पुनः अधिकार जमा लिया। नई आर्थिक नीति का काल 1921 से 1927 ई. तक था। लेनिन की यह नीति थी कि आर्थिक स्थिति में सुधार के पश्चात् पुनः साम्यवादी व्यवस्था लागू की जाय।
बोल्शेविक क्रांति के फलस्वरूप रूस के सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में भी क्रांतिकारी परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए। गरीबों, दलितों, शोषितों एवं पीड़ितों को आगे आने का अवसर प्राप्त हुआ। स्त्रियों को विशेष सम्मानजनक स्थान दिया गया। उन्हें पुरूषों के समकक्ष सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक अधिकार प्रदान किये गये। देश का घोर प्रतिक्रियावादी तत्त्व चर्च था। यह जारशाही का समर्थक तथा नई सरकार का घोर विरोधी था। अतः बोल्शेविक सरकार ने इसके विरूद्ध सख्ती से कदम उठाया और इसकी सारी सम्पति जब्त कर ली। लोगों को धार्मिक मामलों में स्वतंत्रता प्रदान की गयी।
बोल्शेविक क्रांति के फलस्वरूप राजनीति क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। जारशाही के पतन के पश्चात् जिस साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना हुई वह विश्व में सर्वथा एक नई व्यवस्था थी। अतः लेनिन एवं स्टालिन के नेतृत्त्व में केन्द्रीय कार्यपालिका समिति (Central Executive Committee) द्वारा नियुक्त एक कमीशन ने देश के लिए एक संविधान बनाया। सोवियतों की राष्ट्रीय कांग्रेस ने 10 जुलाई 1918 ई. को इसे मान्यता प्रदान की। इस नये संविधान में सर्वहारा का गहरा प्रभाव था। इसका उद्देश्य पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त करना था। इसमें श्रमिकों, किसानों एवं सैनिकों को प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया।
सीमित रूप में जनता को कुछ मौलिक अधिकार भी दिये गये। मनुष्य के काम करने के अधिकार को प्रथम बार मान्यता प्रदान की गयी। सीमित अर्थों में यदि स्थापित समाजवादी व्यवस्था को कोई खतरा नहीं हो तो लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गयी। सम्पूर्ण देश में समाजवादी प्रजातंत्रों का देश घोषित किया गया।
देश की कुछ प्रमुख जातियों को सोवियत संघ में रहने या निकल जाने का अधिकार दिया गया। देश की सर्वोच्च सत्ता सोवियतों ने कांग्रेस में निहित थी। पादरियों, जमींदारों एवं पूँजीपतियों को मताधिकार के अधिकार से वंचित कर दिया गया। सोवियत की कांग्रेस को केन्द्रीय कार्यपालिका के निर्माण को अधिकार दिया गया। संविधान में साम्यवादी पार्टी के गठन, सदस्यता एवं अधिकार तथा कार्यों की गहन व्याख्या की गयी थी। इस प्रकार नये संविधान के अन्तर्गत देश में एक नई राजनीतिक तंत्र या व्यवस्था का सृजन किया गया।
लेनिन की साम्यवादी व्यवस्था केवल रूस तक सीमित नहीं थी। वह साम्यवाद का प्रचार एवं प्रसार सारे विश्व में करना चाहता था। वह संसार के सारे पीड़ित एवं शोषित मजदूरों को एक मंच पर लाना चाहता था। इसलिए उसने "दुनिया के मजदूरों एक हो" का नारा दिया था। देश-विदेश में साम्यवाद के प्रचार एवं प्रसार के लिए लेनिन ने कॉमिण्टर्न (Commintern-The Third International) की स्थापना की जिसका केन्द्र मॉस्को में रखा गया।
1917 ई. की क्रांति के तात्कालिक एवं दूरगामी परिणामों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि आधुनिक सदी के इतिहास में उसको अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । कतिपय विद्वानों ने तो इसे 1789 ई. के फ्रांस की राज्यक्रांति से अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। उनके मतानुसार फ्रांस की क्रांति ने तो एकता, स्वतंत्रता एवं समानता (Equality, liberty and unity), लोकतंत्र एवं राष्ट्रवाद सम्बन्धी नई विचारधारा एवं भावना को जन्म दिया।
किन्तु 1917 की रूसी क्रांति ने उससे आगे बढ़कर एक नई सामाजिक व्यवस्था का आदर्श प्रस्तुत किया। साम्यवाद के रूप में उसने विश्व को एक नई विचारधारा प्रदान की जो एक समाज, नई सभ्यता एवं संस्कृति का संदेशवाहक था। फ्रांस की क्रांति के फलस्वरूप राजनीतिक सत्ता कुलीन वर्ग के हाथों से फिसलकर मध्यम वर्ग या बुर्जुआ के हाथों में आ गयी।
किन्तु रूसी क्रांति ने कुलीन एवं बुर्जुआ दोनों वर्ग को नाश करके सत्ता किसानों एवं श्रमिकों को सौंप दी तथा सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व (Dictatorship of the Proletariat ) स्थापित किया। रूस में सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व इसलिए स्थापित किया गया कि गरीब एवं शोषित श्रमिकों एवं किसानों की हितों की रक्षा की जा सके, उन्हें सुखी बनाया जा सके तथा पूँजीवाद का अन्त किया जा सके।
लेनिन के नेतृत्व में एक वर्गविहीन समाज (Classless society) की स्थापना की गयी जिसमें शोषण के लिए कोई स्थान न था। रूस के श्रमिकों एवं किसानों को उनके परिश्रम से कोई नहीं वंचित कर सकता था। रूस की क्रांति के अत्यधिक महत्त्व का द्योतक है- इसके बाद राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में प्रारम्भ हुए क्रांतिकारी परिवर्तन- जिसकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं।
लेनिन ने जिस व्यवस्था की आधारशिला रखी उसे उसके उत्तराधिकारी स्टालिन तथा अन्य ने एक ठोस एवं विराट् रूप प्रदान किया। स्टालिन ने लेनिन द्वारा स्थापित सोवियत व्यवस्था के लिए दृष्टिकोण की नीति अपनायी। उसने योजनाकरण की नीति को अपना कर सम्पूर्ण सोवियत के जीवन-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तनों का श्रीगणेश किया।
देश में बड़े-बड़े कल-कारखाने तथा उद्योग-धन्धे स्थापित किये गये। कृषि के क्षेत्र में सामूहिक फार्म तथा यंत्रीकरण एवं खेती की अत्याधुनिक पद्धति को अपनाया गया। आर्थिक क्षेत्र में मात्र दस साल के अन्दर रूस ने आश्चर्यजनक प्रगति की। समाजवाद के रास्ते पर चलकर रूस तथा उसकी जनता पूँजीवादी व्यवस्था की बुराइयों सेदूर हटती चली गयी।
बेकारी की समस्या समाप्त हो गयी। एक निम्नतम आय निर्धारित कर देने से लोगों को एक निश्चित जीवन-स्तर प्राप्त हुआ। यह सोवियत रूस से समाजवादी कार्यक्रम का कमाल था कि उसका हर नागरिक सरकार की उपलब्धियों को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि मानता था और देश की प्रगति के लिए हर सम्भव प्रयत्न करने को तैयार था।
बोल्शेविक क्रांति के परिणामस्वरूप स्थापित सोवियत व्यवस्था ने सारे संसार के समक्ष एक चुनौती सी प्रस्तुत कर दी। मात्र दो दशकों के अन्दर इसने प्रमाणित कर दिया कि. यह संसार की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था थी । यह मात्र एक स्वप्न था इसके सिद्धान्त अव्यावहारिक नहीं थे। यह पूँजीवाद का एक ठोस विकल्प था। रूस की महान् उपलब्धियों से घबराकर पूँजीवादी एवं साम्राज्यवादी व्यवस्था के रक्षात्मक रूख अपना लिया।
नया रूस शोषण, अन्याय, अत्याचार एवं पूँजीवाद व्यवस्था के विरूद्ध ब्रिदोह का प्रतीक था। इस अर्थ में यह संसार का आदर्श था। रूसी समाजवाद ने यूरोप के कई अन्य राष्ट्रों को भी आकर्षित करना प्रारम्भ किया। यूरोप के विश्वविद्यालयों में बुद्धिजीवियों के बीच यह चर्चा का एक रोचक विषय था- रूसी समाजवाद । इस तथ्य से बोल्शेविक क्रांति के महत्त्व का प्रमाण मिलता है।
संसार के अन्य पराधीन एवं यूरोपीय साम्राज्यवादी राष्ट्रों द्वारा शोषित देश रूस की ओर आशाभरी नैत्रों से देखने लगे। इसलिए पराधीन राष्ट्रों को उनके स्वतंत्रता संग्राम में सहायता करने तथा यूरोप के साम्राज्यवादी देशों को सबक सिखाने के उद्देश्य से ही रूस ने "कॉमिण्टर्न इन्टनेशनल" नामक संस्था की स्थापना की थी।
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