सुमेरियन धर्म की विशेषताएं

मोसोपोटामिया में जिन प्रसिद्ध सभ्यताओं का विकास हुआ उसमें सुमेरियन सभ्यता का महत्वपूर्ण स्थान है। दजला और फरात की घाटी का दक्षिणी भाग से मिले श्रोतो एवं मंदिरो के अवशेषो से हमें सुमेरियनों के धार्मिक विश्वासो की जानकारी मिलती है। सुमेर की संस्कृति में धर्म और मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। मंदिरों को देवताओं का निवास स्थल माना जाता था, यह मंदिरों को उच्च स्थानों पर बनाया करते थे। पर्व एवं त्योहारों के दिन मंदिरों में ऐसे उत्सव हुआ करते थे, जो धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ राष्ट्रीय भावना भी जागृत करते थे। इन उत्सवों में संगीत का काफी महत्त्व था, इस धर्म के कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित है-

बहुदेववादी

सुमेर वासी बहुदेववादी थे। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सुमेरियन प्रारंभ में ऐकश्वरवादी थे, किंतु कलांतर में अनेक देवताओं की उपासना करने लगे। प्रथम में आकाश देव 'अन्' को प्रमुख देवता माना जाता था। जिसका प्रमुख मंदिर 'एरेक' में स्थित था। 3000 ईसा पूर्व तक अन् देवता को प्रमुखता प्रदान की जाती रही। धीरे-धीरे अन्य देवताओं को भी प्रमुखता प्रदान किया जाने लगा जैसे- वायु एवं वर्षा का देवता 'एनजिल' यह ऋग्वेदकाल के इंद्र से मिलते-जुलते हैं। प्रकाश का देवता 'शमश', चन्द्र देवता 'ईसिन' समस्त सृष्टि का पिता 'अप्सु', सबकी माता 'तीयमत', स्वर्ग की राजा 'अनु', मृत्युलोक का राजा 'एनोमिल', समुद्र का राजा 'ईर्या' आदि। इन समस्त के ऊपर एक देवता था, जिसे सुमेरियन 'इल्ल' नाम से पुकारते थे। सुमेर से प्राप्त एक त्रिमूर्ति में सन (सूर्य) सिन (चन्द्रमा) एवं वृत्त (वायु) का सम्मिलित रूप से दर्शाया गया हैं।

देवियो पर विश्वास

विभिन्न देवताओं के साथ-साथ सुमेर वासी इन देवताओं की पत्नियों के भी देवीयों के रूप में आराधना करते थे, उनका विश्वास था कि प्रत्येक देवता की पत्नी छाया सदृश उनके साथ रहती है। 'अनु' की पत्नी 'अनुता' थी, एनजिल की पत्नी 'अन्नता', ईर्या की पत्नी 'देवकिन', मादुर्क की पत्नी सिनू-वनिता इत्यादि। सुमेरवासियों की मान्यता थी कि पृथ्वी देवी देव संसद में अन् एवं एनिजिल के साथ बैठती है। इन छोटे देवताओं के रूप में पृथ्वी माता की कई रूपों में पूजा की जाती थी। इन सभी देवताओं में सबसे प्रसिद्ध 'इन्नेनी'( Inneni ) नाम की देवी थी।

देवताओं का मानवीकरण

सुमेरियनों का यह विश्वास था कि देवता मानवीय गुणों से युक्त है। देवताओं का आचार-विचार एवं व्यवहार मनुष्यों के समान है, देवता भी मानवीय दुर्बलताओं के शिकार हैं। इन देवताओं का निवास एक पर्वत माना गया था। सुमेरियनों की दृष्टि में मनुष्य एवं देवता में प्रमुख अंतर यह था कि देवता अमर थे और मनुष्य नश्वर, इसके अतिरिक्त देवता मनुष्यों से अधिक बलवान थे। सुमेरियनों के अनुसार मनुष्य अधिक से अधिक नगरों का निर्माण कर सकते थे, तथा देवता सृष्टि के निर्माता थे।

ग्रहो पर विश्वास

सुमेर वासी देवी देवताओं के अतिरिक्त ग्रह पर भी विश्वास करते थे। ये- निमिब (शनि), नाबू (बुद्ध), नरगल (मंगल), मार्दुक (बृहस्पति), ईश्तर ( शुक्र), सिन ( चन्द्रमा ) शमाश ( सुर्य ) आदि।

दानवो की कल्पना

सुमेर वासी दानवो के अस्तित्व में भी विश्वास करते थे तथा इनका मानना था कि यह दानवीय शक्तियां मनुष्य को बुरे मार्ग पर ले जाती है। और उनकी यह भी मान्यता थी कि दानवो की शक्ति देवताओं से कम होती है।

बली प्रथा

सुमेर वासी में बलि प्रथा भी परचलीत थी। सुमेर वासी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए या मानव कल्याणार्थ बली दी जाती थी। देवताओं के साथ-साथ दानवों को भी बलि चढ़ाई जाती थी। सर्वाधिक बली सृष्टि के देवता को चढ़ाई जाती थी।

कर्म-काण्ड

सुमेरियनो के धर्म में कर्म-काण्ड की प्रधानता थीं। उनके माताअनुसार धार्मिक अनुष्ठानों को करके बुरा व्यक्ति भी अच्छा बन सकता था। इस धर्म में ईश्वर प्राप्ति कल्पनाओं की लिए कोई स्थान नहीं था। सुमेरियन नगरों के उत्खनन मैं प्राप्त पात्रों एवं रिलिफ चित्रों से ज्ञात होता है ये लोग मंदिरों में दूध, मक्खन, रोटी एवं मदीरा चढ़ाते थे। पुजारी उनके ओर से पूजा करके देवताओं को भोग लगाता था। इस प्रकार देवताओं के समक्ष भेंट अर्पित करके सुमिरन अधिक कृषि, उत्पादन, पर्याप्त सिंचाई, जल एवं बाढ़ मुक्ति के लिए प्रार्थना करते थे।

पाप-पुण्य

सुमेर वासी का विश्वास था कि मनुष्य के कर्मों का फल इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है। देवताओं की पूजा के अभाव में मानव कल्याण संभव नहीं है, सुमेरियनो ने आठ प्रकार की पाप बताए हैं- ईश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना, झूठ बोलना, पड़ोसियों को धोखा देना, आपसी फूट फैलाना, वयभिचार करना, पड़ोसियों से दुर्व्यवहार करना, लड़ाई करना, व्यापार में बेमानी करना आदि। पाप से मुक्ति के लिए देवताओं की उपासना करना एकमात्र साधन हैं।

परलोक विषयक कल्पना

सुमेर वासियों का विश्वास था कि 'कुर' अथवा पाताल पृथ्वी के नीचे स्थित एक ऐसा अंधकारमय स्थान था जहाँ अच्छी एवं बुरी आत्माये रहती है। तथा इसमें प्रवेश हेतु मृत्यु की नदी 'वैतरणी' को पार करना होता था। इरेसकीगल तथा नेरगल पाताल लोक पर शासन करते थे। गिल्गामेश वाहाँ का न्यायाधीश थे। इसके संबंध में एक आख्यान प्राप्त हुआ है। जिसमें बताया गया है कि- स्वर्ग की रानी इन्ना को एक बार पाताल पर अधिकार करने की इच्छा हुई लेकिन वह पाताल जाकर वापस लौट नहीं पाई वरन् मृत्यु को प्राप्त हो गई। तत्पश्चात एनकी की सहायता से उसे इस आधार पर पुनर्जीवन मिला कि वह अपने स्थान पर किसी अन्य देवता को पाताल लोग भेज देंगी। इन्नाने वापस आकर अपने पति को मारकर पाताल भेज दिया। प्रथम बार किसी प्राणी के पाताल से लौटने का वर्णन है। यही कारण है कि इस आख्यान का अत्यधिक महत्त्व है।

मृतक संस्कार

सुमेरियन धर्म में मृतक संस्कार को पर्याप्त महत्त्व प्राप्त था। प्रायः मृतकों को मकान के प्रांगण ( आंगन ) अथवा कमरे में दफना दिया जाता था। नगर के बाहर भी समाधियाँ देखने को मिली है। समाधियों के साथ दैनिक उपयोग की सम्रागी भी प्राप्त हुई हैं।

देवालय एवं पुरोहित

सुमेर वासी के प्रत्योक नगर में एक बहुत बड़ा देवालय था 'जिगुरत' कहा जाता था। यह मंदिर अथवा देवालय अत्यंत विशाल होते थे तथा धन-धान्य से परिपूर्ण होते थे। इन मंदिरों में एक मुख्य पुरोहित होता था कुछ अन्य पुरोहित भी होते थे- यथा गाने वाले ,जादू जानने वाले, भविष्यवाणी करने वाले। पुरोहितों को समाज में बहुत बड़ा प्रभाव था।

इस प्रकार उपरोक्त अध्ययनो से यह स्पष्ट होता है कि सुमेरियनों द्वारा स्थापित धर्म का एकमात्र उद्देश्य सांसारिक सुखों की प्राप्ति थीं। वे धार्मिक क्रियाकलापों का आयोजन परलौकिक जीवन के लिए नहीं बल्कि पृथ्वी पर शारीरिक लाभ हेतु करते थे।