साम्राज्यवाद - उदय के कारण, विशेषताएं और प्रभाव

जब कोई राज्य शक्ति द्वारा अथवा अन्य उपायों से अपनी सत्ता और प्रभुता का विस्तार अपने राज्य की सीमाओं से बाहर करने लगता है तो वह राज्य साम्राज्य का रूप धारण कर लेता है उसकी यह नीती साम्राज्यवाद कहलाती है। साम्राज्यवाद वह दृष्टिकोण है जिसके अनुसार कोई महत्वाकांक्षी राष्ट्र अपनी शक्ति और गौरव को बढ़ाने के लिए अन्य देशों के प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है, यह हस्तक्षेप राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या अन्य किसी भी प्रकार से हो सकता है।

चार्ल्स ए वेयर्ड के अनुसार- "सभ्य राष्ट्रों की कमजोर एवं पिछड़े लोगों पर शासन करने की इच्छा व नीति ही साम्राज्यवाद कहलाती हैं।" प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व यूरोप की राजनीति का केंद्र साम्राज्यवाद था। साम्राज्यवाद के विकास के कई कारण थे।-

साम्राज्यवाद के उदय के कारण

औद्योगिक क्रांति

औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोप के देशों में धन का अत्यअधिक संचय हुआ। इस धन को वह यूरोप के देशों में व्यय करते हैं तो उन्हें लाभ की संभावना बहुत कम थी जबकि पिछड़े हुए देशों में उन्हें अत्यधिक लाभ की संभावना थी। इसका मुख्य कारण वहाँ श्रम (मजदूरी) सस्ता तथा लोगो की बहुसंख्य आदि थीं, इसी कारण से लोगों में इन देशों में अपनी पूंजी लगाने की होड़ प्रारंभ हुई।

कच्चे माल की आवश्यकता

साम्राज्यवाद का एक प्रमुख कारण औद्योगिक देशों द्वारा कच्चे माल की आवश्यकता थी। जैसे कपास, रबर, टीन, झूट, लोहा आदि इसी कारण इन देशों ने ऐसे उपनिवेश पर अधिकार करने का प्रयास करने लगे जहाँ पर्याप्त कच्चा माल आसानी से प्राप्त हो जाए।

बाजार की आवश्यकता

औद्योगिक देशों को अपने निर्मित माल की बिक्री के लिए बड़े बाजार की जरूरत थी। ऐसे में बाजारों की खोज के तहत उपनिवेश स्थापित किए गए एवं उपनिवेशिक स्थानों पर मनमाने ढंग से माल की बिक्री के लिए उपनेवशिक साम्राज्य की आवश्यकता महसूस हुई और वे मनमाने ढंग से एकाअधिकार करना शुरू किया और मनमाने ढंग से अपना माल बेचने लगे।

यातायात और संचार के साधन का विकास

18 वीं- 19 वीं शताब्दियों में यातायात तथा संचार के साधनों का अत्यधिक विकास हुआ। सड़कों, रेलों से एक दूसरे क्षेत्र की को जोड़ा गया। रेल, डाक-तार व्यवस्था, टेलीग्राफ, समुद्री जहाजों के प्रयोग से उपनिवेशों पर नियंत्रण करना आसान हो गया। वाष्प चलित बड़े जहाज बनने लगे जिसकी मदद से ज्यादा भार के सामानों को दूर देशों से लाना आसान हो गया।

टेलीग्राफ और तार के द्वारा सुदूर देशों से घर बैठे ही व्यापारिक सौदे किए जाने लगे। इसने शासन वर्ग व व्यापारी वर्ग की अनेक समस्याओं का समाधन कर दिया यूरोप की साम्राज्यवादी शक्तियों ने इन सबका पर्याप्त मात्रा में लाभ उठाया।

जनसंख्या में वृद्धि

19 वीं सदी में यूरोप में बढ़ती हुई जनसंख्या ने औद्योगिक देशों को चिंता में डाल दिया इस बढ़ती आबादी से रोजगार और आवास की समस्या पैदा हुई। इस समस्या का एक ही उपाय था कि यूरोपिय देश अपने लोगों को बसाने के लिए उपनिवेशों की स्थापना करें। उपनिवेश इन्हें रोजगार और आवास दोनों ही सुविधा उपलब्ध करा सकते थे।

ईसाई मिशनरियों की भूमिका

यूरोपीय ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्म प्रचार के उद्देश्य से उपनिवेशिक विस्तार को अपनाया। ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्म को समस्त लोगों में फैलाना चाहते थे इसी कारण वे उपनिवेश स्थापित किए तथा वह अपना वर्चस्व कायम किया। इसी संदर्भ में इंग्लैंड के डॉक्टर डेविड लिगस्टोन कहते हैं- जिसने अफ्रीका में जैम्बेजी और कांगो नदी क्षेत्र की खोज कर अफ्रीका में ईसाई धर्म के प्रचार प्रसार के साथ-साथ अपने देश के राजनीतिक, आर्थिक, साम्राज्य की वृद्धि के लिए प्रयत्न किया।

साम्राज्यवाद की विशेषता

साम्राज्यवाद की कुछ विशेषताएं निमलिखित हैं-

  • साम्राज्यवाद अपने राज्य की सीमाओं में वृद्धि करने में विश्वास रखता है ताकि वे अपना शासन के शक्ति प्रदान कर सकें। सीमाओं के विस्तार से लोगों के साथ अपने वर्चस्व कायम कर सके।

  • साम्राज्यवादी देश अपने हितों की रक्षा के लिए सभी प्रकार के साधनों का प्रयोग करता है।

  • साम्राज्यवाद का मुख्य उद्देश्य अपने से अधीन देशों को अपने शक्ति से उनपर शासन कर शोषण करना है।

  • साम्राज्यवाद का प्रमुख आधार सैनिक शक्ति होता हैं।

  • साम्राज्यवाद का मुख्य उद्देश्य तो आर्थिक होता है, परंतु कभी कभी सैनिक व राजनीतिक शोषण भी हो सकता हैं।

साम्राज्यवाद का प्रभाव

आर्थिक शोषण साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा प्रभाव है उदाहरण के लिए अंग्रेजो ने भारत में चाय, नील और कॉफी के बगान स्थापित किए और अपार धन संचय करने के लिए स्थानीय प्राकृतिक साधनों का दोहन किया। साही शक्ति ने अपने आयातित इंजनों को चलाने के लिए स्थानीय कोयला खदानों का शोषण किया, साथ ही नमक उत्पादन पर भी इन्हीं का अधिकार था। स्थानीय लोगों पर नमक बनाने या बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे इन्हें महंगा भारी कर वाला नमक खरीदना पड़ता था।

एक और महत्वपूर्ण कारण सांस्कृतिक वर्चस्व था जिसमें स्वदेशी संस्कृतियों और परंपराओं को दबाया जाने लगा और उपनिवेशी लोगों द्वारा भाषा, धर्म और अन्य रीती-रिवाजों को जबरन थोपा जाने लगा। उपनिवेशो को कोई स्वतंत्र नहीं थी उनका शोषण किया जाता था और उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता था।

स्वदेशी उद्योग धंधे समाप्त होने के कारण उपनिवेश गरीब और बेरोजगारी में डूब गए। कृषि का पारंपरिक विधि पूरी तरह बदल गई क्योंकि अब खाद्य फसलों की तुलना में कच्चे माल की खेती करने के लिए मजबूर किया गया। आर्थिक स्तर पर उद्योग सड़क एवं रेल जैसे ढांचागत परियोजनाओं के विकास से आवागमन को गति मिला और लोगों के बीच की दूरी समाप्त हुई।

"फूट डालो राज़ करो" की नीती से विभिन्न समुदायों से सांप्रदायिकता का विकास हुआ जो वर्तमान में भी गंभीर चुनौती बनी हुई है।

निष्कर्ष

इस प्रकार उपरोक्त अध्ययनों से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यूरोपीय देशों में औद्योगिक क्रांति के पश्चात उत्पन्न परिस्थितियों ने उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया जो आगे चलकर साम्राज्यवाद में परिवर्तित हो गया। सबसे पहले उन्होंने अफ्रीकी देशों को निशाना बनाया जिसके बाद वे एशिया पर भी अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। इस प्रकार 20 वीं शताब्दी तक यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका एवं एशिया में अपनी साम्राज्यवादी भूख को काफी हद तक शांत कर लिया था किंतु उसकी वह विजय स्थाई न रह सकी, आगे चलकर यही सम्यवादी विचारधारा ने विश्व को दो-दो विश्व युद्ध की विभिसीका में धकेलने का भी कार्य किया।