इस्लामिक समाज में गुलाम एक प्रमुख वर्ग माना गया है। इस्लाम समाज का निम्नतर वर्ग दासों का था। इस्लाम में दासता का अंत तो नहीं किया गया, परंतु इस व्यवस्था में कुछ सुधार अवश्य किए गए। गुलामों का व्यापार इस्लाम के उदय काल से ही होता था। यह् दास विभिन्न देशों में होने के कारण अपनी शारीरिक बनावट में भी भिन्नता रखते थे तथा इनका मूल्य भी अलग-अलग होता था।
इस्लाम धर्म में मुसलमानों को दास बनाने की आज्ञा नहीं दी है और यदि कोई दास इस्लाम स्वीकार कर लें तो उसे मुक्ति को आवश्यक भी नहीं दतलाया है। इसमें मालिक और दास के समागम से यदि कोई बच्चा होता था तो वह गुलामी से भी आजाद हो जाता था।
इस्लाम काल में दास लड़ाइयों में पराजित होने वाले पक्ष के लोग युद्धबंदी दास होते थे। इस काल में दासों को सुरक्षित करने के लिए कोई कानून नहीं था और उन्हें पूरी तरह अपने स्वामियों की मर्जी पर छोड़ दिया जाता था। इस्लाम धर्म दास प्रणाली को मान्यता तो देता था पर उसे विनियमित और सीमित कर दिया गया था। स्वामी पर दासों के स्वामित्व का अधिकार था किंतु उन्हें आदेश दिया गया कि उनके साथ दयालुता का बर्ताव करें और यदि संभव हो तो दासता से मुक्त हो अथवा धन देकर स्वयं अपनी स्वतंत्रता खरीद सकते थे।
कानूनी स्तर पर दांतों की स्थिति निम्न थी। दास कई प्रकार के होते थे पहले दास वैसे जो दास के यहाँ जन्म लेते थे, दूसरे जो युद्धबंदी के रूप में दास बनाए जाते थे, तीसरे दास वैसे होते थे जो कर्म के रूप में इसे अपना लेते थे और चौथे दास वैसे थे जो क्रिय गए दास होते थे। इन दासों का व्यापार साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ बढ़ता चला गया।
इस्लाम के साम्राज्य विस्तार के कारण इन्हें विभिन्न देशों द्वारा प्राप्त होते थे। स्त्री बच्चे भी गुलाम बनाए जाते थे, अरब मे स्त्री की देखभाल के लिए हिजड़े दास नियुक्त किए जाते थे जिन्हें 'खिसमान' कहा जाता था। हिजड़ों का एक अलग वर्ग भी होता था जिन्हें 'गिलमान' कहा जाता था। वे आकर्षक व्यक्तित्व के होते थे उन पर उनके स्वामियों की विशेष कृपा होती थी। इन श्वेत एवं अश्वेत दासों को कई परियोजनाओं अथवा कार्यों में लगाया जाता था। मुख्य रूप से दास घरेलू कार्यों और सैनिक परियोजनाओं में नियुक्त किए जाते थे। स्त्री दास बड़ी संख्या में रखैल एवं घरेलू कार्यों में रखी जाती थी। सुंदर और आकर्षक स्त्री दासों को लोकप्रियता अधिक थी। सामान्यतः स्त्रियाँ नाच-गान कर अपने स्वामियों का मनोरंजन करती थी, कभी-कभी सुंदर स्त्री (दास नर्तकियाँ) अपने स्वामियों को इस सीमा में मोह लेती थी कि वह उन्हें रखैल के रूप में रख लेते थे। ऐसे रखैलो को 'जवारी' कहा जाता था। कुछ सुंदर जवारी स्त्रियों ने खलीफ़ा को भी अपनी ओर आकर्षित किया।
कुछ जवारी ने विदुसी के रूप में भी प्रसिद्धि पाई। साधारण दासियाँ गृहकार्य में पारंगत होती थी। अत: लोग: इस उद्देश्य से उन्हें अपने घरों में सेविका के रूप में रखते थे। अरब समाज में दास-दासियों को रखना संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। उन दिनों ये प्रथा सी चल पड़ी थी कि प्रांत के गवर्नर तथा सेनापति अपने खलीफ़ा तथा वजीर को अपने उपहारों के साथ कुवारियों को प्रदान करते थे।
यद्यपि अरब समाज में गुलामों की संख्या काफी अधिक थी, किंतु उनकी स्थिति अपेक्षाकृत संतोषजनक थी। सामान्यत: उनका जीवन सुखी था और उनके साथ अच्छा बर्ताव किया जाता था। उनके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप उनके पैरों में पड़ी गुलामी की ज़ंजीर थी, अन्यथा उन्हें बहुत सारी सुविधाएँ प्राप्त थी। गुलामो को मुक्त करना एक पुण्य कार्य माना जाता था।
लोगों का ऐसा विश्वास था कि गुलामों को मुक्त कर देने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी। अतः बड़ी संख्या में लोग गुलामों को मुक्त भी कर देते थे। इस्लाम के इतिहास में इस प्रकार के अनेक उदाहरण मिले हैं, जब अपनी योग्यता से गुलामों ने अपने स्वामी को प्रसन्न कर लिया तथा स्वतंत्र हो गए। लोग स्वतंत्र गुलामों के साथ शादी ब्याह भी करते थे, भारत में तो कुतुबुद्दीन के द्वारा गुलाम राजवंश की स्थापना की गई।
कुरान की शिक्षाओं और हदीस में दिए गए हजरत मोहम्मद के आदेशों के अनुसार दासो के प्रति दया का व्यवहार होना चाहिए। मुस्लिम देशों में दासों के साथ अच्छा बर्ताव किया जाता था। हजरत मोहम्मद ने अपनी शिक्षाओं में दासों के प्रति दया का बर्ताव का आदेश दिया है। हजरत मोहम्मद ने कहा है कि- "अपने दासों को वही भोजन दो जो तुम स्वयं खाते हो, और वैसे ही काम करने का आदेश दो जिसे करने की शक्ति उनमें हो।"
इन आदेशों का सामान्यत: पूरी तरह या फिर कुछ हद तक पालन होना आवश्यक था। दासों को कोई नागरिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी, स्वामी का दासों पर पूरा अधिकार रहता था। दासों का अपनी कोई संपत्ति नहीं होती थी और वह कोई भी संपत्ति बिना मालिक की अनुमति के नहीं रख सकता था।
इस्लामी कानून के अनुरूप एक गुलाम स्त्री एक गुलाम पुरुष अथवा पति को छोड़कर अन्य पुरुष के साहयता से बच्चा पैदा करती थी तो उसका बच्चा गुलाम हो जाता था। किंतु अगर एक गुलाम पुरुष के सहयोग से कोई स्वतंत्र स्त्री से बच्चा होता तो वह गुलाम नहीं माना जाता था।
स्वामी अपने दास को किसी को भी दे सकता था अथवा किसी के हाथ बेच सकता था। स्वामी दास या दासी का विवाह भी अपनी इच्छानुसार कर सकता था। इस्लाम विधिवेत्ताओं के अनुसार दास एक ही साथ दो पत्नी नहीं रख सकते थे। अपने स्वामी की मृत्यु के पश्चात दास उसके उत्तराधिकारी की संपत्ति बन जाते थे।
चुंकी दास को स्वतंत्र व्यक्ति से कम अधिकार प्राप्त थे, इसलिए उनके द्वारा अपराध किए जाने पर स्वतंत्र व्यक्ति की तुलना में आधा दंड ही दिए जाते थे। यदि दास को अपराध के लिए जुर्माना या अधिक दंड देना आवश्यक होता था तो उसका भुगतान स्वामी ही करता था।
एक प्रसिद्ध इस्लामी पुस्तक 'अखलाक-इज-जिलाली' जो मुस्लिमों के बीच व्यावहारिक दर्शन किए एक लोकप्रिय प्रबंध है उसमें कहा गया है कि- "एक स्वतंत्र व्यक्ति के मुकाबले दासों से सेवा लेना अच्छा है दास को अपने स्वामी की आदतों और कार्यों के साथ सामंजस्य के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। उनकी आज्ञा माननी चाहिए और अपने को उनकी इच्छाओं के अनुरूप ढालना चाहिए।"
गुलाम विभिन्न विजित देशों के होने के कारण उनकी शारीरिक बनावट और रंग रूप में काफी भिन्नता थी। उदाहरणस्वरूप मध्य अफ्रीका के गुलाम काले, फरगना तथा चीनी तुर्किस्तान के पीले और निकटपूर्व तथा दक्षिण पूर्वी यूरोपीय देशों के गुलाम गोरे होते थे। गुलामों की कीमतें उनकी शारीरिक बनावट, लिंग, रंगरूप आदि के आधार पर भिन्न-भिन्न होती थी।
गुलामों के विषय पर कुछ आधुनिक मुस्लिम लेखक कहते हैं कि हजरत मोहम्मद ने दास प्रथा को अस्थायी रूप से स्वीकार किया वे लोग कहते हैं कि मुस्लिम विचारों की प्रगति या परिस्थितियों में बदलाव से दास प्रथा का उन्मूलन निश्चित है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस्लाम में दाश प्रथा उनके विवाह, बिक्री और उत्तराधिकार संबंधी कानूनों के साथ घनिष्ठ रूप से संबद्ध है। उनके उन्मूलन से मुस्लिम धर्म की नींव पर कुठाराघात होगा।
निष्कर्ष: इस प्रकार उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दास प्रथा इस्लाम की भावना के साथ पूरा सामंजस्य रखता है। इसमें कोई संदेह नहीं है की अरबों में गैर-इस्लाम कानून के अधीन दासों की जो स्थिति थी उसमें हजरत मोहम्मद साहब ने सुधार किए। परंतु इसके साथ ही यह भी निश्चित है कि अरब विधि विशेषज्ञों ने दास प्रथा को स्थायी संस्था का रूप देने की कोशिश की।
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