वैदिक साहित्य क्या है

वैदिक साहित्य हिंदू धर्म के प्राचीनतम स्वरूप पर प्रकाश डालने वाला तथा विश्व का प्राचीनतम स्रोत है। वेद शब्द संस्कृत भाषा के "विद्" धातु से बना है, इसका अर्थ "ज्ञान होना" है। वेदों को "अपौरुषेय" (किसी पुरुष द्वारा न बनाया हुआ) या ईश्वर द्वारा रचित माना गया है। अर्थात वेदों की रचना ईश्वरीय प्रेरणा के आधार पर ऋषियों ने की है, इसलिए ये शाश्वत है। वैदिक साहित्य को श्रुति कहा जाता है, क्योंकि (सृष्टि/नियम) कर्ता ब्रह्मा ने विराटपुरुष भगवान् की वेदध्वनि को सुनकर ही प्राप्त किया है। अन्य ऋषियों एवं ऋषिकाओं ने भी इस साहित्य को श्रवण-परम्परा से ही ग्रहण किया था तथा आगे की पीढ़ियों में भी ये श्रवण परम्परा द्वारा ही स्थान्तरित किये गए। इस परम्परा को श्रुति परम्परा भी कहा जाता है तथा श्रुति परम्परा पर आधारित होने के कारण ही इसे श्रुति साहित्य भी कहा जाता है।

अध्ययन की सुविधा के लिए वैदिक साहित्य को तीन युगों में बांटा जा सकता है- प्रथम काल संहिताओं का युग, द्वितीय काल ब्राह्मण ग्रंथों का युग और तृतीय काल उपनिषदों, अरण्यको, विदांग और सूत्र साहित्य का युग।

प्रथम काल

संहिता

संहिता का अर्थ संग्रह होता हैं संहिताओं में विभिन्न देवताओं के स्तुतिपरक मंत्रों का संकलन है। संहिताएँ चार है- ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व। इन चारों संहिताओं अथवा वेदों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं-

ऋग्वेद

इसमें 10,627 मंत्र और 1020 सुक्त है, यह 10 मंडलों में विभक्त है। इसकी रचना 1500 से 1000 ईसा पूर्व में हुई थी, इसके उच्चारण करता को "होत्र" कहते हैं। इसके मंत्र में देवताओं की स्तुति की गई है, इनमें 33 देवताओं का उल्लेख है। इस वेद में सूर्य, उषा तथा अदित्य जैसी देवताओं का वर्णन किया गया है। इनमें 25 नदियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें सर्वाधिक नदी सिन्धु का वर्नर अधिक है। सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती को माना गया है, गंगा का एक बार तथा यमुना का तीन बार प्रयोग किया गया है। इसके द्वारा हमें ऋग्वेदकालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक दशा की जानकारी प्राप्त होती हैं।

सामवेद

इसमें 1550 मंत्र है। इसकी रचना 1000 से 500 ईसा पूर्व में हुई थी, इसके उच्चारणकर्ता को "उद्गात्री" कहते हैं। इसमें केवल 75 मंत्र नए हैं और इन मंत्रों को छोड़कर सभी मन्त्र ऋग्वेद से लिया गया है। यह गायन प्रधान वेद हैं। इसलिए इसे भारतीय संगीत का मूल्य माना जाता हैं।

यजुर्वेद

इसमें 40 अध्याय एवं 1975 मंत्र है। इसकी रचना काल भी 1000 से 500 ईसा पूर्व में हुई थी, इसकी उच्चारण करता को "अध्वार्यु" कहते हैं। इसमें यज्ञ विधियों एवं नियमों का उल्लेख मिलता है। इसकी दो शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। इस ग्रंथ से हमें आर्यों के सामाजिक व धार्मिक जीवन के बारे में ज्ञात होता हैं।

अथर्ववेद

इसमें 50 मण्डल, 73 गद्य एवं पद्य सुक्त तथा 5977 मंत्र हैं। इनमें लगभग 1200 ऋग्वेद से लिए गए हैं, इनकी रचना 1000 से 500 ईसा पूर्व में हुई थी। इसके उच्चारणकर्ता को "अथर्व" कहते हैं। इनमें चिकित्सा, धनुर्विद्या, जादू-टोना, भूत-प्रेत आदि से संबंधित मंत्र है इनमें से कुछ मंत्र देवताओं की प्रशंसा में लिखे गए हैं।

द्वितीय काल

B. ब्राह्मण ग्रंथ

चारों वेदों के संस्कृत भाषा में प्राचीन समय में जो अनुवाद थे, वे ब्राह्मण ग्रंथ कहे जाते हैं। वेद संहिताओं के बाद ब्राह्मण ग्रंथ का निर्माण हुआ। ब्राह्मण ग्रंथ को वेद का टीका भी कहा जाता है। इसमें यज्ञों के कर्मकाण्ड विस्तृत वर्णन है। साथ ही शब्दों की व्युत्पत्तियाँ तथा प्राचीन राजाओं और ऋषियों की कथाएँ तथा सृष्टि-सम्बन्धी विचार हैं।

ब्राह्मण ग्रंथ संसार के स्तुति के प्रथम उदाहरण हैं। वे वैदिक समाज के उत्तरकालीन ब्राह्मण समाज में परिवर्तन का बोध कराते हैं। वे यज्ञ का अर्थ बताते हुए उनके अनुष्ठान के रीति बताते हैं, जिन वेदों के साथ वे संबंधित हैं उनमें विभिन्न सूक्तों के वे भाष्य है। प्रत्येक ब्राह्मण ग्रंथ संहिता या वेद से संबंधित है। ये छ: प्रकार के होते हैं- ऐतरेय, कौषीतकी, शतपथ, पंचविंश, ताण्ड्य तथा गोपथ। ऐतरेय तथा कौषीतकी ब्राह्मण ग्रंथ ऋग्वेद से संबंधित है, शतपथ ब्राह्माण ग्रंथ का संबंध यजुर्वेद, पंचविंश ब्राह्मण ग्रंथ का संबंध सामवेद तथा गोपथ ब्राह्मण ग्रंथ का अथर्ववेद से संबंधित हैं।

तृतीय काल

अरण्यक

ब्राह्मणों के अन्त में कुछ ऐसे अध्याय मिलते हैं जो गाँवों या नगरों में नहीं पढ़े जाते थे। इनका अध्ययन-अध्यापन गाँवों से दूर (अरण्यों/वनों) में होता था, अतः इन्हें अरण्यक कहते हैं। इनमें दर्शन और ज्ञान की बातें लिखी हुई है। गृहस्थाश्रम में यज्ञविधि का निर्देश करने के लिए ब्राह्मण-ग्रन्थ उपयोगी थे और उसके बाद वानप्रस्थ आश्रम में संन्‍यासी आर्य यज्ञ के रहस्यों और दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन करने वाले अरण्यकों का अध्ययन करते थे। उपनिषदों का इन्हीं अरण्यकों से विकास हुआ। ये तीन प्रकार के होते थे ऐतरेय, तैतिरीय तथा मैत्रायणी।

उपनिषद

इसका शाब्दिक अर्थ है- "निकट बैठना"। इसका वास्तविक अर्थ है कि जिज्ञासु शिष्य अपने गुरु के पास बैठता है और रहस्य सिद्धांत पर विचार-विनिमय करता है। वह ब्रह्मा और जीव के संबंध पर विचार करता है। यह रहस्यमयी ज्ञान प्रत्योक व्यक्ति को नहीं दिया जाता, अपितु केवल सुयोग्य पात्रो को ही दिया जाता था। 800 से 500 ईसा पूर्व के मध्य विभिन्न ऋषियों ने 108 उपनिषद् लिखे हैं।

उपनिषदों में कोई एक ही दार्शनिक धारा नहीं है इनमें कई ऐसे विद्वानों के मत हैं जो दर्शन और धर्म के ज्ञाता थे। एक आधारभूत सिद्धांत समान रूप से प्रत्योक उपनिषद में पाया जाता है। और उस सिद्धांत को इसप्रकार कहा जा सकता है- "विश्व ब्रम्हा है किन्तु ब्रह्मा आत्मा है अथवा ब्राम्हाण्ड ईश्वर है तथा ईश्वर मेरी आत्मा है।" ब्रह्मा तथा आत्मा की ये कल्पनाओ का उपनिषदों में समावेश किया गया हैं।

दरअसल उपनिषदों में मानव जीवन और विश्व के गुढ़तम प्रश्नों को सुलझाने का प्रयत्न किया गया है। उपनिषद् भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। वैदिक साहित्य के सबसे अंत में होने के कारण ये "वेदांत" भी कहलाते हैं। मनुष्य जीवन-मूत्यू के इस वास्तविक चक्र को समझ सके, इसी उद्देश्य से उपनिषदों की रचना हुई हैं।

सूत्र साहित्य

वैदिक साहित्य के विशाल एवं जटिल होने पर कर्मकाण्ड से सम्बद्ध सिद्धान्तों को एक नवीन रूप दिया गया। कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक अर्थ-प्रतिपादन करने वाले छोटे-छोटे वाक्यों में सब महत्त्वपूर्ण विधि-विधान प्रकट किये जाने लगे। इन सारगर्भित वाक्यों को सूत्र कहा जाता था। कर्मकाण्ड-सम्बन्धी सूत्र-साहित्य को चार भागों में बाँटा गया- श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र, धर्म सूत्र और शुल्ब सूत्र।

वेदांग

काफी समय बीतने के बाद वैदिक साहित्य जटिल एवं कठिन प्रतीत होने लगा। उस समय वेद के अर्थ तथा विषयों का स्पष्टीकरण करने के लिए अनेक सूत्र-ग्रन्थ लिखे जाने लगे। इसलिए इन्हें वेदाङ्ग कहा गया। वेदाङ्ग छः हैं- शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, कल्प और ज्योतिष।

पहले चार वेदांग, मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और अर्थ समझने के लिए तथा अन्तिम दो वेदांग धार्मिक कर्मकाण्ड और यज्ञों का समय जानने के लिए आवश्यक हैं। व्याकरण को वेद का मुख कहा जाता है, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को श्रोत्र, कल्प को हाथ, शिक्षा को नासिका तथा छन्द को दोनों पैर।

निष्कर्ष

इस प्रकार उपरोक्त अध्ययनों से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वैदिक साहित्य का प्रारंभ साहित्यों अर्थात वेदो से प्रारंभ हुआ। इससे पश्चयत ब्राह्मण ग्रंथों की रचना हुई ब्राह्मण ग्रंथों का अंतिम भाग अरण्यक कहा गया, जिससे दार्शनिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ। इसके पश्चात उपनिषदों का उदय अरण्यकों से हुआ। तत्पश्चात वैदिक साहित्य के जटिल स्वरूप को सरल भाषा में समझने के लिए सूत्र साहित्य का रचना हुई। वेद को और सरल तरीकों से समझने के लिए वेदांत का सृजन हुआ। इसप्रकार हम पाते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण स्रोत वैदिक साहित्य हैं।